ओपिनियन

धर्मों के बारे में शिक्षा दीजिए, धार्मिक शिक्षा से बचिए

धर्मों के बारे में शिक्षा देने की आड़ में, धार्मिक शिक्षा देने से बचने के लिए खास सावधानी बरतने की जरूरत है। धर्मों के बारे में शिक्षा का पाठ्यक्रम बनाते समय धार्मिक शिक्षा और धर्मों के बारे में शिक्षा के बीच फर्क को बनाए रखना जरूरी है।

2 min read
Jul 19, 2022
धर्मों के बारे में शिक्षा दीजिए, धार्मिक शिक्षा से बचिए

बीरेंद्र सिंह रावत
रिसर्च एसोसिएट, शिक्षा विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय


हाल ही उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री डॉ. धनसिंह रावत ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति और समृद्ध ज्ञान परंपरा के बारे में जानकारी होनी चाहिए। इसलिए धार्मिक ग्रंथों की सामग्री को शैक्षिक पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने पर विचार हो रहा है। इससे पहले गुजरात के शिक्षा मंत्री जीतू वघानी कह चुके हैं कि भागवत गीता में निहित मूल्यों और सिद्धांतों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा। सवाल यह है कि शैक्षिक संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा (रिलीजियस इंस्ट्रक्शन) देने के बारे में भारत का संविधान और सर्वोच्च न्यायालय क्या कहता है?
संविधान का अनुच्छेद 28 कहता है कि 'राज्य-निधि से पूर्णत: पोषित किसी शिक्षा संस्थान में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।' यह अनुच्छेद सरकारी स्कूलों में किसी भी तरह की धार्मिक शिक्षा पर रोक लगाता है। धार्मिक शिक्षा (रिलीजियस इंस्ट्रक्शन) उस संस्थान में दी जा सकती है, 'जिसका प्रशासन राज्य करता है, किंतु जो किसी ऐसे विन्यास या न्यास के अधीन स्थापित हुई है, जिसके अनुसार उस संस्था में धार्मिक शिक्षा देना आवश्यक है।Ó लेकिन, संविधान का अनुच्छेद 28 विभिन्न धर्मों के बारे में शिक्षा देने पर रोक नहीं लगाता। 12 सितंबर, 2002 को अनुच्छेद 28 के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 28 धार्मिक शिक्षा पर रोक लगाता है, लेकिन धर्मों के बारे में शिक्षा देने पर रोक नहीं लगाता। धर्मों के बारे में शिक्षा का मतलब यह है कि वह धर्मों के धार्मिक संस्कार, अनुष्ठान, पूजा पद्धति आदि से रहित हो। धार्मिक शिक्षा और धर्मों के बारे में शिक्षा या धर्मों के बारे में अध्ययन के बीच विभाजक रेखा बहुत ही महीन है। इसलिए धर्मों के बारे में शिक्षा देने की आड़ में, धार्मिक शिक्षा देने से बचने के लिए खास सावधानी बरतने की जरूरत है। धर्मों के बारे में शिक्षा का पाठ्यक्रम बनाते समय धार्मिक शिक्षा और धर्मों के बारे में शिक्षा के बीच फर्क को बनाए रखना जरूरी है।
न्यायालय ने कहा कि धर्मों के बारे में शिक्षा का पाठ्यक्रम 'धार्मिक बहुलतावाद' (रिलीजियस प्लूरलिज्म) के सिद्धान्त पर टिका हुआ होना चाहिए। धार्मिक बहुलतावाद, विशेषतावाद का विरोध करता है और समावेशवाद को प्रोत्साहित करता है। विद्यार्थियों को धर्मों के बारे में शिक्षा बिना मतारोपण के और उनके मुक्त चिंतन को बाधित किए बिना दी जानी चाहिए। धर्मों के बारे में शिक्षा देने का मतलब यह है कि विद्यार्थी अपने और दूसरों के धर्मों को समझ सकें।
धार्मिक शिक्षा अपने धर्म के बारे में अभिमान का भाव और व्यवहार विकसित कर सकती है, लेकिन धर्मों के बारे में शिक्षा, धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में व्यवहार को विकसित करने का एक महत्त्वपूर्ण जरिया हो सकती है। जनवरी 2000 में यूनेस्को ने कहा कि ऐसे समय में जब विभिन्न धर्मों में और विभिन्न धर्मों के भीतर संघर्ष बढ़ रहा है, तब विभिन्न धर्मों के बीच संवाद को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जो भी सरकार अपने स्कूली पाठ्यक्रम में धर्म से जुड़ी शिक्षा देना चाहती है, उसे दो जरूरी बातों को मानना चाहिए। एक धार्मिक शिक्षा और धर्मों के बारे में शिक्षा
के बीच के संवैधानिक अंतर को मानते हुए पाठ्यक्रम तैयार करवाना और दूसरी 'धार्मिक बहुलतावाद' के सिद्धांत के अनुसार विभिन्न धर्मों के बारे में शिक्षा को पाठ्यक्रम में जगह देना। यदि ये दो संवैधानिक शर्तें पूरी नहीं होती हैं, तो इससे एक ओर जहां विभिन्न धर्मों के बारे में अज्ञानता के कारण कट्टरता और असहिष्णुता बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर अपने धर्म के प्रति आलोचनात्मक समझ का अभाव भी रहेगा।

Published on:
19 Jul 2022 08:18 pm
Also Read
View All