
खानापूर्ति का इससे ज्यादा शर्मनाक उदाहरण और क्या हो सकता है कि राजस्थान के उदयपुर जिले के जिस सरकारी प्राथमिक स्कूल की कक्षा कक्ष की जर्जर छत का प्लास्टर गिरने से तीन मासूम छात्र घायल हो गए उसे शिक्षा विभाग के ही जांच दल ने सुरक्षित माना था। यह तो गनीमत थी कि इस हादसे में कोई जनहानि नहीं हुई वरना शिक्षा महकमे के कर्ता-धर्ताओं के चेहरे पर कालिख पुतने में देर नहीं लगती। सवाल सिर्फ निरीक्षण में खानापूर्ति का ही नहीं है, चिंता इस बात की है कि सरकारी इमारतों के रखरखाव में भी गुणवत्ता की अनदेखी की जा रही है।
भीण्डर के समीप नारदा के इस सरकारी स्कूल में भी मरम्मत के नाम पर ऐसी ही लीपापोती हुई थी, तभी तो प्लास्टर उखड़ते ही छत का सरिया नजर आने लगा। हादसा, जांच का ऐलान व कार्रवाई के नाम पर एक दो कार्मिकों को इधर-उधर भले ही कर दिया जाए, लेकिन जिम्मेदारों की अनदेखी बताती है कि इस स्कूल के निरीक्षण का काम भी कार्यालयों में बैठकर ही होता रहा। तभी तो मौका मुआयना करने पहुंचे शिक्षा अधिकारी खुद स्कूल का रास्ता तलाश करते नजर आए। चिंता की बात यह है कि सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों के कारण खासी बदनामी झेल रहे इस महकमे में इनकी दशा सुधारने का काम भी कछुआ चाल से ही हो रहा है।
सरकारी स्कूलों में जब भवन व पढ़ाई दोनों की गुणवत्ता की बजाय सिर्फ शिक्षकों को एडजस्ट करने की मंशा से काम होगा तो शिक्षक भी भला बच्चों की परवाह क्यों करने लगे? नारदा के इस स्कूल में महज 37 बच्चों का नामांकन था और दो स्थायी व एक संविदा पर शिक्षक लगाया हुआ था। ऐसे हादसों का सीधा समाधान जर्जर इमारत को बंद करना तो हो सकता है लेकिन यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि फिर कभी ऐसे हादसे न हों। करोड़ों रुपए का बजट प्रावधान करने के बावजूद हमारे सरकारी स्कूल ऐसे ही हादसों को न्योता देने वाले रहे तो फिर इन स्कूलों में दाखिला कराने में तो अभिभावक हिचकेंगे ही।