जीवन विकास की दौड़ में शामिल हो गया है और विकास को हम केवल आर्थिक वृद्धि, उपभोग और प्रदर्शन से मापने लगे हैं। सकल घरेलू उत्पाद बढ़ रहा है, पर क्या सकल घरेलू शांति भी बढ़ रही है?
- सुखवीर सिंह, लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं
आज का भारतीय समाज एक विचित्र द्वंद्व में जी रहा है। एक ओर वह स्वयं को प्राचीन सभ्यता, गहन दर्शन, सहिष्णुता और आध्यात्मिक चेतना का उत्तराधिकारी मानता है, तो दूसरी ओर वह बिना ठहरे, बिना प्रश्न किए, पश्चिमी जीवनशैली की अंधी नकल में अपनी ही जड़ों को काटता चला जा रहा है। यह नकल केवल पहनावे, खान-पान या भाषा तक सीमित नहीं रही, यह हमारे सोचने, जीने, सफल होने और सुखी होने की परिभाषा तक में समा चुकी है। प्रश्न यह नहीं है कि पश्चिम से सीखना गलत है- प्रश्न यह है कि क्या सीखते-सीखते हम स्वयं को भूल चुके हैं?
पूर्व की सभ्यताओं, विशेषकर भारत ने जीवन को केवल 'प्रगति' की सीधी रेखा नहीं माना। यहां जीवन एक चक्र था- पुरुषार्थों का संतुलन- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। अर्थ साधन था, साध्य नहीं। आनंद जीवन का उप-उत्पाद नहीं बल्कि जीवन का स्वभाव था। आज स्थिति उलट चुकी है। जीवन विकास की दौड़ में शामिल हो गया है और विकास को हम केवल आर्थिक वृद्धि, उपभोग और प्रदर्शन से मापने लगे हैं। सकल घरेलू उत्पाद बढ़ रहा है, पर क्या सकल घरेलू शांति भी बढ़ रही है? हम उस समाज की ओर बढ़ रहे हैं, जहां सफलता का अर्थ है अधिक धन, अधिक पद, अधिक दृश्यता। जो दिखाई नहीं देता- संतोष, संयम, करुणा, मौन- वह मूल्यहीन समझा जाने लगा है। हैप्पीनेस इंडेक्स पर चर्चाएं तो होती हैं, पर जीवन की संरचना ही ऐसी बना दी गई है, जिसमें आनंद के लिए न समय बचता है, न ऊर्जा। विडंबना यह है कि जिस पश्चिमी समाज की नकल में हम यह सब कर रहे हैं, वही समाज आज मानसिक अवसाद, अकेलेपन और अर्थहीनता के संकट से जूझ रहा है। फिर भी हम उसी रास्ते को 'आधुनिकता' मानकर अपनाए जा रहे हैं। सबसे गंभीर परिवर्तन यह है कि जीवन के जो कभी उद्देश्य नहीं थे, वे आज मनुष्य पर हावी हो गए हैं।
प्रतिस्पर्धा जीवन का साधन नहीं, जीवन का स्वभाव बन गई है। तुलना हमारी आदत बन चुकी है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीव्र किया है- हम दूसरों के जीवन के संपादित संस्करण देखकर अपने असंपादित यथार्थ से घृणा करने लगे हैं। हम भरोसा और घृणा दोनों दूर बैठे लोगों पर कर लेते हैं। पर किसी से पूछकर देखिए- जब तुम दूसरों के बारे में इतना जानते हो, क्या तुम अपने बारे में कुछ जानते हो? यही आत्म-विस्मृति आज की सबसे बड़ी समस्या है। पूर्व की परंपरा में आत्म-ज्ञान को सर्वोच्च माना गया- 'स्वयं को जानो' केवल दार्शनिक कथन नहीं, बल्कि जीवन की दिशा तय करने वाला सूत्र था। आज हम स्वयं से बचते हैं। मौन हमें असहज करता है, अकेलापन हमें डराता है और प्रश्न हमें विचलित करते हैं। इसलिए हम लगातार व्यस्त रहते हैं- काम, मनोरंजन व सूचना में। व्यस्तता आज सम्मान का प्रतीक बन गई है, मानो खाली होना अपराध हो। पर क्या निरंतर व्यस्त रहना वास्तव में सार्थक जीवन का प्रमाण है या यह केवल अपने भीतर झांकने से बचने का तरीका है? यह लेख पश्चिम बनाम पूर्व की सरल बहस नहीं है। यह आधुनिकता बनाम परंपरा का भी सीधा टकराव नहीं है। प्रश्न कहीं अधिक गहरा है- क्या हम विकास की अपनी परिभाषा स्वयं गढ़ रहे हैं या उधार ली हुई परिभाषाओं पर जी रहे हैं? आज आवश्यकता है संतुलन की। पश्चिम से विज्ञान, तकनीक, संस्थागत दक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता सीखना आवश्यक है। पर पूर्व से जीवन-बोध, संयम, सामूहिकता और आंतरिक शांति सीखना भी उतना ही आवश्यक है। समस्या तब होती है जब हम एक से सब कुछ और दूसरे से कुछ भी नहीं लेते।
भारत की शक्ति हमेशा समन्वय में रही है- विरोध में नहीं, समावेशन में। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर विकास प्रगति नहीं होता। अगर विकास पर्यावरण को नष्ट करे, संबंधों को खोखला करे और मनुष्य को भीतर से खाली कर दे, तो उस विकास पर प्रश्न उठाना अनिवार्य है। आर्थिक समृद्धि आवश्यक है, पर वह जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकती। अब समय है जीवन की चर्चा करने का। यह पूछने का कि हम किस दिशा में जा रहे हैं, और क्यों। हम अपने बच्चों को क्या सिखा रहे हैं- केवल जीतना या सही ढंग से जीना भी? हम अपने समाज को क्या दे रहे हैं- केवल सुविधाएं या अर्थ भी? अंतत: प्रश्न वही है जो हर व्यक्ति से, हर समाज से पूछा जाना चाहिए: कैसा जीवन जीना चाहते हो? केवल तेज या गहरा भी? केवल समृद्ध या संतुलित भी? केवल दिखाई देने वाला या भीतर से सार्थक भी? इस प्रश्न से बचा नहीं जा सकता। क्योंकि हम चाहें या नहीं, हम जो जीवन जी रहे हैं, वही हमारी सबसे बड़ी विचारधारा है।