
भारत का निर्वाचन आयोग टी. एन. शेषन के दौर के बाद अपनी विश्वसनीयता की गंभीर परीक्षा से गुजर रहा है। यह धारणा चिंता बढ़ा रही है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने एसआइआर को लेकर उठी आशंकाओं को पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं किया है। मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने को लेकर विपक्ष के सवालों ने विवाद को और तीखा कर दिया है। टी. एन. शेषन ने 1990 से 1996 के बीच आयोग की सार्वजनिक छवि बदल दी थी। वे राजनीतिक सत्ता का सामना करते हुए चुनावी नियम लागू करने के लिए तैयार थे व उन्होंने संस्था को असाधारण प्रतिष्ठा दिलाई। लेकिन अब आगे की सात चुनौतियां हैं।
पहली, मतदाता सूचियों पर विश्वास बहाल करना। पुनरीक्षण वैध है, लेकिन नाम हटाना सामान्य प्रशासनिक सुधार नहीं है। प्रत्येक प्रभावित मतदाता को कारण, अपील और पर्याप्त समय मिलना चाहिए। शुद्धता और समावेशन साथ-साथ चलने चाहिए। दूसरी, संवाद में सुधार। आयोग को जटिल फैसलों को भाषा में समझाना, संभव हो तो सत्यापन योग्य आंकड़े सार्वजनिक करना और सवालों का शीघ्र उत्तर देना चाहिए। तीसरी, राजनीतिक दलों के साथ विश्वास बहाल करना। विपक्ष आयोग की जवाबदेही पर सवाल उठाता है, जबकि सत्तारूढ़ पक्ष इसे राजनीतिक बताता है। सर्वदलीय विचार-विमर्श, शिकायत व्यवस्था और समय पर आंकड़े अविश्वास घटा सकते हैं। संस्था तब मजबूत होती है जब सभी पक्ष समान नियमों पर भरोसा करें। चौथी, नियुक्ति विवाद। 2023 के कानून ने चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया। सुप्रीम कोर्ट इस व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार कर रहा है। इससे संस्थागत स्वतंत्रता का महत्व सामने आता है। पांचवीं, तकनीक का जिम्मेदार उपयोग करना। डिजिटल प्रणालियां शुद्धता बढ़ा सकती हैं, लेकिन पारदर्शिता, ऑडिट और स्वतंत्र जांच जरूरी हैं। छठी, संवैधानिक शक्ति के साथ जवाबदेही। अनुच्छेद 324 आयोग को व्यापक अधिकार देता है, लेकिन महत्वपूर्ण फैसलों के लिए ठोस कारण जरूरी हैं। प्रक्रियागत एकरूपता, तर्कपूर्ण आदेश और न्यायिक जांच के लिए खुलापन संस्था को मजबूत कर सकते हैं। सातवीं, आयोग को राजनीतिक रणक्षेत्र बनने से रोकना। वह दलों के बयानों को नियंत्रित नहीं कर सकता, लेकिन अपने आचरण को नियंत्रित कर सकता है।
निर्वाचन आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) को लेकर उठे सवालों पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि देशभर में एसआइआर कराने का निर्णय 24 जून, 2025 को आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिया गया था। आयोग के अनुसार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दोनों निर्वाचन आयुक्तों की सहमति से जारी आदेशों को सर्वोच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा है। आयोग ने स्पष्ट किया कि आंतरिक विचार-विमर्श के दौरान सदस्यों के बीच मतभेद या सुझाव सामने आना सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन इन्हें अंतिम निर्णयों में असहमति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि, आरटीआइ के जवाब में आयोग द्वारा 2025 में देशव्यापी एसआइआर शुरू करने का निर्णय लिए जाने से इनकार के बाद यह सवाल उठ रहा है कि निर्णय प्रक्रिया से संबंधित मूल फाइलें और दस्तावेज उपलब्ध क्यों नहीं हैं? चुनाव केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं, नागरिकों की लोकतांत्रिक सहमति का माध्यम हैं।
यदि मतदाताओं को लगे कि मतदाता सूचियां या संस्थागत फैसले किसी ओर झुके हैं, तो परिणाम की वैधता पर विश्वास कमजोर हो सकता है। हर आरोप स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए और आलोचना अपने आप चुनावी हेरफेर का प्रमाण नहीं है। आयोग का दायित्व शुद्ध मतदाता सूचियां और चुनाव सुनिश्चित करना है, दलों को गंभीर आरोप प्रमाणों के साथ रखने चाहिए। फिर भी विश्वसनीयता का बोझ आयोग पर अधिक होता है। राजनीतिक दल चुनाव हारकर फिर मतदाताओं के पास लौटते हैं। निर्वाचन आयोग न चुनाव प्रचार कर सकता है, न जनादेश मांग सकता है। उसका अधिकार निष्पक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीय फैसलों पर टिका है। आयोग को पर्याप्त संस्थागत पूंजी मिली है। शेषन ने इसका दृढ़ इस्तेमाल दिखाया। आज की चुनौती अलग है- संवैधानिक अधिकार और जनविश्वास एक-दूसरे को मजबूत करें, न कि विपरीत दिशाओं में जाएं। तीखा टकराव विपक्ष और निर्वाचन आयोग, एनडीए सरकार तथा भाजपा के बीच है। विपक्ष ने एसआइआर के समय और प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, जबकि आयोग इसे जरूरी बताता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में बिहार एसआइआर को अनुमति दी, लेकिन सुरक्षा उपायों पर जोर दिया। पश्चिम बंगाल में आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि समावेशन या बहिष्करण संबंधी फैसलों के खिलाफ 38.31 लाख अपीलें दायर हुईं। लगभग 1.26 लाख मामलों का निपटारा हुआ और 37 लाख से अधिक मामले लंबित रहे। पश्चिम बंगाल विस चुनाव 23 और 29 अप्रेल 2026 को हुए। आयोग के अनुसार केवल 1,607 हटाए गए मतदाताओं के नाम तुरंत बहाल हुए। गलत नाम हटने और अपील लंबित रहने पर बाद की बहाली खोया मतदान अवसर वापस नहीं कर सकती। यही निष्पक्षता का मूल सवाल भी है। पुनरीक्षण जरूरी है। प्रश्न प्रक्रिया का है- क्या मतदान का अधिकार इस बात पर निर्भर होना चाहिए कि अपील का फैसला मतदान से पहले हो? ऐसी प्रक्रियाएं बनानी होंगी जो असहमत लोगों की जांच का भी सामना कर सकें। संस्था तब मजबूत होती है जब उसके फैसले राजनीतिक विवाद से परे भी विश्वसनीय रहें। भविष्य की चुनौती केवल चुनाव कुशलता से कराना नहीं है। यह सुनिश्चित करना भी है कि दल और मतदाता विश्वास कर सकें कि संस्था निष्पक्ष थी।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक