
बच्चों में कम होता आज्ञा पालन व कृतज्ञता का भाव, वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या और बुजुर्गों के प्रति घटते सम्मान के मामले विचलित करते हैं। बच्चों और युवाओं में कृतज्ञता बोध की कमी या 'लैक ऑफ ग्रेटिट्यूड' की समस्या की मूल वजह कहीं उनके अभिभावक और खराब पेरेंटिंग ही तो नहीं, इस पर विचार जरूरी है।कोई भी बच्चा अपनी मां के गर्भ से तो कृतज्ञता बोध की कमी सीखकर नहीं आता तो फिर आखिर समस्या का मूल क्या है? दरअसल इस समस्या के नेपथ्य में छिपा है अभिभावकों का अत्यधिक लाड़ प्यार, संतान की हर फरमाइश को दोगुना पूरा करने की प्रवृत्ति व पेरेंट्स द्वारा संतान का जीवन सरल से भी अधिक सरल बनाने की प्रवृत्ति। जब बच्चे को बेवजह आवश्यकता से अधिक मिलने लगता है तो ये धीरे-धीरे एक आदत बन जाती है कि उसे तो अधिक मिलेगा ही या उसका संघर्ष तो उसके माता- पिता का संघर्ष है। इस स्थिति में वह बच्चा या किशोर माता-पिता के संघर्ष, त्याग, अत्यधिक सुख और आनंद को अपना अधिकार मान बैठता है। उसके मन में यह बात घर करने लगती है कि माता-पिता का यह त्याग कोई बहुत बड़ी बात नहीं अपितु ऐसा तो उन्हें करना ही चाहिए था।
मनोविज्ञान और बाल व्यवहार के शोध के अनुसार, बालक या व्यक्ति को उसकी योग्यता, क्षमता और वास्तविक परिश्रम से कहीं अधिक प्रशंसा या परिणाम मिलने लगे तो वो उसे अपना अधिकार या बपौती मान लेता है। उनमें मनोवैज्ञानिक अधिकार भाव या 'साइकोलॉजिकल एनलाइटनमेंट' की भावना पनपने लगती है। यही आज के बच्चों में कृतज्ञता में कमी या 'लैक ऑफ ग्रेटिट्यूड' के लिए उत्तरदायी है। इसी दिशा में प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ग्रब्स द्वारा किए गए शोध के अनुसार, जो बच्चे या व्यक्ति इस भाव से ग्रसित होते हैं, उनकी उम्मीदें कभी खत्म ही नहीं होतीं और वे सदा असंतुष्ट से ही रहते हैं। बिना मेहनत के सब मिलते रहने पर उन बच्चों को अपने जीवन की छोटी-सी बाधा, कष्ट या माता-पिता की मजबूरी भी अन्याय लगने लगती है।
बिहेवियरल साइंस विशेषज्ञ कैंपबेल के शोध के अनुसार, जब व्यक्ति बिना मेहनत या योग्यता के पुरस्कार प्राप्त करता है तो उसका दिमाग उस अच्छी स्थिति को वास्तविकता मान लेता है और वह मिलने वाली सुविधाओं को अधिकार समझ लेता है। ये शोध सिद्धांत स्पष्ट करते हैं कि आज के समय में थैंकलैस किड्स को यह अहसास ही नहीं है कि जिस जीवन को, नौकरी को, वे आनंद और खुद का हक माने बैठे हैं, असल में उसके पीछे उनके माता- पिता सहित कितने लोगों का त्याग और बलिदान छिपा है? हर चीज को हल्के में लेना और खुद को बेवजह सर्वोत्तम मानने का भाव आज की पीढ़ी का नया कष्ट है। अधिकार तभी मिलने चाहिए जब बालक अपने संघर्ष और श्रम से इसे प्राप्त करे। पात्रता से अधिक मिलने पर कृतज्ञता कम हो जाती है और बच्चे की कार्यक्षमता और ऊर्जा में गिरावट आती है। आज बच्चों की इस कृतज्ञता बोध में कमी की प्रवृत्ति के कारण बड़े-बुजुर्गों के प्रति सम्मान, आंख की शर्म और लिहाज में कमी आई है।
जरा सोचिए कि जब एक किशोर कोई गलत काम चोरी छिपे करता है तो वह ये जान रहा होता है कि यदि इसकी भनक बुजुर्गों को लगी तो अच्छी बात नहीं होगी। यह लिहाज है, आंख की शर्म है। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज और कई अन्य समाजशास्त्रीय अध्ययन यह दर्शाते हैं कि आलस्य से भरपूर आधुनिक जीवनशैली के कारण संस्कारों में लगातार गिरावट देखी जा रही है। इसे देखते हुए माता-पिता को भी कर्मठ बनकर अपने बच्चों के आगे एक रोल मॉडल या उदाहरण बनना होगा, तभी संस्कार देने का चक्र कायम रह सकेगा। बुजुर्गों और पेरेंट्स के प्रति संवेदनशील होने का पाठ स्कूल पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनना जरूरी है। बच्चों को समझाना होगा कि संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और हेल्पएज इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, देश में बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ते हुए वर्ष 2050 तक आज से दोगुनी हो जाएगी इसलिए उनके प्रति संवेदना जागृत करें। बुजुर्गों का सम्मान राष्ट्र की परंपरा नहीं, बल्कि सभी का नैतिक दायित्व है। बुजुर्गों और माता- पिता के सम्मान से ही बुढ़ापा आनंदित होना संभव है। यह जीवन प्रबंध का गूढ़ सूत्र है।
जीवन प्रबंध प्रशिक्षक