
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कैप्टन स्मित मच्छार के बीच हुई बातचीत में स्मित ने बताया कि संकट की घड़ी में वह विमान के कॉकपिट में घायल पड़े हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे। फिर उन्होंने खुद को संभाला, उठे और कॉकपिट का दरवाजा खोल दिया, जिससे दूसरे लोग भीतर आकर हस्तक्षेप कर सके । यह घटना केवल साहस की कहानी नहीं है। यह उस बिंदु पर ले जाती है, जहां धर्म, मनोविज्ञान, मस्तिष्क-विज्ञान और दर्शन एक-दूसरे से मिलते हैं। सवाल है- क्या कोई आध्यात्मिक साधना संकट में फंसे व्यक्ति की चेतना बदलकर घटनाओं की दिशा बदल सकती है? इसका उत्तर केवल चमत्कार या विज्ञान में तलाशना शायद उचित नहीं होगा। जब कैप्टन स्मित लहुलूहान पड़े थे, क्षणभर की निष्क्रियता भी घातक हो सकती थी। ऐसे समय भय मनुष्य की सोच और निर्णय लेने की क्षमता को जकड़ सकता है। लेकिन स्मित ने उठने का निर्णय लिया, दरवाजे को खोल दिया। इसी क्षण घटना की दिशा बदल गई।
एक आस्तिक कह सकता है कि हनुमान ने उन्हें साहस दिया। मनोवैज्ञानिक लगातार मंत्रोच्चार को भय नियंत्रित करने और ध्यान केंद्रित रखने में सहायक बता सकता है। तंत्रिका-विज्ञानी कह सकता है कि लयबद्ध शब्द, स्मृति और वर्षों से मन में बसी धार्मिक छवियां तनाव के बीच मस्तिष्क को स्थिर रखने में भूमिका निभाती हैं। इनमें से कोई एक व्याख्या संपूर्ण नहीं। संभव है, ये एक ही घटना के अलग-अलग पहलू हों। जीवन में ऐसे अनेक क्षण आते हैं, जब भावी घटनाएं एकाधिक दिशाओं में जा सकती हैं। छोटे निर्णयों का परिणाम बहुत बड़ा हो सकता है। कॉकपिट में भी यही हुआ। स्मित फर्श पर पड़े रह सकते थे, बेहोश हो सकते थे या उठ ही नहीं पाते। लेकिन उन्होंने उठने का फैसला किया। चेतना केवल घटनाओं की दर्शक नहीं है। वह घटनाओं की शृंखला का हिस्सा भी बन सकती है। विचार से इच्छा, इच्छा से निर्णय और निर्णय से शरीर में गति पैदा होती है। फिर वह गति बाहरी दुनिया को बदलती है और बदली हुई दुनिया भावी घटनाओं को जन्म देती है। इसलिए चेतना का भौतिक संसार से कोई संबंध नहीं है, ऐसा कहना कठिन है। हनुमान चालीसा की एक पंक्ति है- 'संकट ते हनुमान छुड़ावै, मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।' अर्थात जो मन, कर्म, वचन और ध्यान को हनुमान में लगाता है, वह संकट से मुक्ति पाता है। इस पंक्ति में गहरी मनोवैज्ञानिक बात है। यहां केवल प्रार्थना नहीं है। मन है, वचन है, ध्यान है और कर्म है।
भीतर की चेतना और बाहर की कार्रवाई अलग नहीं है। कैप्टन स्मित के अनुभव को इसी दृष्टि से देखें तो उनकी वाणी में चालीसा थी, मन में हनुमान की स्मृति, ध्यान सम्मुख संकट पर और शरीर कार्रवाई के लिए संघर्ष कर रहा था। प्रार्थना केवल शब्द मात्र नहीं थे। उसने उस मानसिक अवस्था को आकार दिया, जिसमें कार्रवाई संभव हुई। यहीं 'संकटमोचन' की अवधारणा का दूसरा अर्थ सामने आता है। संकट हमेशा बाहर से हटे, यह जरूरी नहीं। कभी-कभी संकट से लडऩे वाले मनुष्य के भीतर कुछ बदलता है। हनुमान भारतीय मानस में केवल शक्ति के प्रतीक नहीं हैं। वह साहस, बुद्धि, विनम्रता, निष्ठा और कर्तव्य के भी प्रतीक हैं। उनके साथ साहस, धैर्य, कर्तव्य और संकट में न झुकने की भावना जुड़ी है। सामान्य परिस्थिति में यह श्रद्धा हो सकती है, लेकिन संकट की घड़ी में यही श्रद्धा व्यवहार में बदल सकती है। मनुष्य संकट में खाली दिमाग लेकर नहीं उतरता। उसके भीतर वर्षों की स्मृतियां, विश्वास, प्रशिक्षण और संस्कार मौजूद रहते हैं।
जो व्यक्ति वर्षों तक हनुमान चालीसा पढ़ता है, वह नहीं जानता कि कभी ऐसा क्षण आएगा या नहीं, जब उसे उस पाठ से शक्ति लेनी पड़े। लेकिन लगातार किया गया स्मरण उसके भीतर संकट और साहस के बीच एक संबंध बना सकता है। इसलिए शायद प्रार्थना भविष्य बताने का माध्यम नहीं है।
वह भविष्य का सामना करने वाले मन को तैयार करने का माध्यम हो सकती है। यह कहना उचित नहीं होगा कि हनुमान चालीसा पाठ ने विमान की भौतिक परिस्थितियां बदल दीं या प्रकृति के नियमों को रोक दिया। किंतु यदि इसने कैप्टन स्मित की मानसिक अवस्था को बदला और उस अवस्था ने उन्हें उठने तथा कॉकपिट का दरवाजा खोलने में मदद की, तो चालीसा घटनाओं की शृंखला का हिस्सा अवश्य बन गई। विचार ने निर्णय को प्रभावित किया। निर्णय ने शरीर को गति दी। शरीर की गति ने दरवाजा खोला और दरवाजा खुलने से दूसरे लोगों के लिए हस्तक्षेप का रास्ता बना। हमारे रोजमर्रा के जीवन में भी हर शुरुआत किसी विचार, निर्णय या इरादे से होती है। प्रार्थना कोई जादुई सूत्र नहीं। केवल सोच लेने से चीजें इच्छा के अनुसार नहीं बदलती। पर चेतना घटनाओं को समझती है, निर्णय लेती है और शरीर को कार्रवाई के लिए प्रेरित करती है।
शायद कॉकपिट में हनुमान चालीसा की उपस्थिति का सबसे गहरा अर्थ यही है। संकट गायब नहीं हुआ था। लेकिन उस संकट के बीच एक घायल मनुष्य ने अपने भीतर से उठने की शक्ति खोजी। हनुमान साहस का स्रोत बने। भक्त इसे कृपा कह सकता है। मनोवैज्ञानिक इसे मानसिक दृढ़ता व वैज्ञानिक इसे मस्तिष्क तथा व्यवहार की प्रक्रिया बताएगा। लेकिन परिणाम एक था- चेतना ने कर्म का रूप लिया और कर्म ने घटनाओं की दिशा बदल दी। शायद यही 'संकटमोचन' का सबसे मानवीय अर्थ है। हनुमान हमेशा हमारे रास्ते से पहाड़ नहीं हटाते। कभी-कभी वे हमारे भीतर इतनी शक्ति जगा देते हैं कि हम उस पहाड़ को पार करने का साहस कर सकें। समुद्र अपनी जगह रहता है। बदलता है वह मनुष्य, जो पहली बार यह विश्वास करता है कि वह उसे पार कर सकता है।
(पाकिस्तान में जन्मे और अभी ब्रिटेन में रह रहे खालिद उमर की फेसबुक पोस्ट से लिए गए अंश)
खालिद उमर, (लेखक एवं चिंतक)