
बड़ी मुश्किलों के बाद अमरीका और ईरान के बीच हुआ 'संघर्ष विराम' अपनी 60 दिन की मियाद पूरी करने से पहले ही दम तोड़ता नजर आ रहा है। अमरीकी अड्डों पर ताजा ईरानी हमलों और जवाब में ईरान के सैन्य ठिकानों पर अमरीका की भीषण बमबारी ने शांति की उम्मीदों को करारा झटका दे दिया है। हमले में भारतीय सहयोग से बना रणनीतिक महत्त्व वाला 'चाबहार बंदरगाह' प्रोजेक्ट भी क्षतिग्रस्त हुआ है। फिर से शुरू हुई यह सैन्य जंग साफ करती है कि कूटनीति की मेज पर आने के बाद भी अभी काफी कड़वाहट बाकी है और वार्ता की कोशिशों को गुप्त एजेंडे इसी तरह आगे भी बेपटरी करते रहेंगे। समझौता खटाई में पडऩे का तात्कालिक कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की स्वतंत्र आवाजाही को लेकर उपजा विवाद है। जून के समझौते के तहत इस मार्ग को कथित रूप से पूरी तरह खोलने पर सहमति बनी थी।
अमरीका का आरोप है कि ईरान ने इसका उल्लंघन किया है। यह सच है कि ईरान होर्मुज जलमार्ग पर अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहता है। ईरान ने यहां से गुजरने वाले जहाजों के लिए नया मार्ग तय किया जो उसके तट के करीब से होकर गुजरता है। दूसरी तरफ, अमरीका अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को अलग मार्ग बनाने के लिए प्रेरित कर रहा है। इसी के तहत ओमान अपने तट के करीब अन्य वैकल्पिक मार्ग से जहाजों की आवाजाही सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहा था। दोनों प्रयासों का उद्देश्य अंतररराष्ट्रीय जलमार्ग को असुरक्षित और उपेक्षित छोड़ देना प्रतीत होता है। अमरीका के इस गुप्त एजेंडे ने ईरान को फिर से भड़का दिया और उसने 6-7 जुलाई को ओमान तट के करीब से गुजरते जहाजों को निशाना बना दिया। जवाब में अमरीका ने संघर्ष विराम खत्म होने की घोषणा कर दी। हालांकि, 'इनसाइडर ट्रेडिंग' का आरोप झेल रहे 'क्षणे तुष्टा, क्षणे रुष्टा' राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने और हमले न करने व वार्ता जारी रखने की प्रतिबद्धता जताकर दुनियाभर के शेयर बाजारों पर असर डालने की एक और कोशिश जरूर की है।
अमरीका और ईरान के 'संघर्ष विराम' का समुद्र में कभी डूबना कभी उतराना, साबित करता है कि आधी-अधूरी कूटनीति और अत्यधिक सैन्य आक्रामकता कभी स्थायी शांति नहीं ला सकती। सुपरपावर होने के नाते अमरीका को अपनी 'प्रतिबंध और हमले' की नीति की सीमाओं को समझना होगा। ईरान को भी यह स्वीकार करना होगा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को बंधक बनाकर वह अपनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता। दुनिया का लगभग 20 फीसदी कच्चा तेल होर्मुज से गुजरता है। इस मार्ग के बाधित होने से कच्चे तेल की फिर से कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई की एक नई लहर आएगी, जो बड़ी मुश्किल से फिर पटरी पर लौट रही थी। बात सिर्फ ईंधन और ऊर्जा जरूरतों की ही नहीं है बल्कि, अन्य आपूर्ति शृंखलाओं पर भी इसका निश्चित ही असर पड़ेगा।