ओपिनियन

रेजिडेंसी का सवाल: हम डॉक्टर बना किस तरह रहे हैं?

अस्पताल की सेवा क्षमता और ट्रेनिंग की क्षमता एक ही बात नहीं है। ये चीजें साथ न बढ़ें तो ट्रेनिंग की सीट अतिरिक्त सेवा-जनशक्ति में बदल सकती है।
3 min read
• •
Sep 30, 2026
doctor
doctor

एम्स जोधपुर में 22 सितंबर को एनेस्थीसिया विभाग के प्रथम वर्ष के एक रेजिडेंट डॉक्टर की अस्पताल परिसर में मृत्यु हो गई। वे ओटी में ड्यूटी पर थे और बाद में डॉक्टरों के वॉशरूम में अचेत पाए गए। पुलिस ने घटनास्थल से सिरिंज मिलने और दवा के स्वयं इस्तेमाल की आशंका जताई है, लेकिन मृत्यु की परिस्थितियां और कारण जांच, पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक निष्कर्षों से ही साफ होंगे। हालांकि यहां रेजिडेंट डॉक्टरों ने आंदोलन कर कार्य-स्थितियों, ड्यूटी घंटे और संस्थागत जवाबदेही से जुड़े सवाल उठाए। केंद्रीय स्तर पर हस्तक्षेप के बाद संस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था बदली गई और कार्यकारी निदेशक को स्वास्थ्य मंत्रालय में रिपोर्ट करने तथा एम्स जम्मू के कार्यकारी निदेशक को अगले आदेश तक जोधपुर का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया।

सवाल यह है कि हमारे मेडिकल संस्थानों में रेजिडेंट डॉक्टर किस तरह काम करते हैं, किस तरह सीखते हैं और संकट में कैसे मदद मांगते हैं? रेजिडेंट डॉक्टर आखिर है क्या? विद्यार्थी, डॉक्टर, प्रशिक्षु या अस्पताल की चौबीस घंटे चलने वाली सेवा-व्यवस्था का हिस्सा? सच यह है कि वह चारों है। जरूरत पडऩे पर उससे डॉक्टर की तरह सेवा ली जाती है, ट्रेनिंग के नाम पर अतिरिक्त समय स्वीकार किया जाता है और अधिकारों की बात आने पर उसे अक्सर केवल प्रशिक्षु की तरह देखा जाता है। हालिया भारतीय व्यवस्थित समीक्षा में दस अध्ययनों और 3,062 पोस्टग्रेजुएट रेजिडेंट डॉक्टरों में बर्नआउट की संयुक्त दर 50.9 प्रतिशत मिली। किसी अस्पताल की असली तस्वीर मरीजों की संख्या, बेड, स्टाफ, फैकल्टी और रात में वास्तविक पर्यवेक्षण से बनती है। ड्यूटी घटाने के लिए अतिरिक्त डॉक्टर-स्टाफ चाहिए, साथ ही मरीजों की निरंतर देखभाल और सुरक्षित हैंडओवर भी। प्रशासन की यह मुश्किल वास्तविक है। लेकिन सिर्फ पीजी सीट बढ़ा देना ट्रेनिंग बढ़ा देना नहीं है। उसके साथ फैकल्टी, बेड, ओटी, स्टाफ और वरिष्ठ डॉक्टर का शिक्षण-समय भी चाहिए। अस्पताल की सेवा क्षमता और ट्रेनिंग की क्षमता एक ही बात नहीं है। ये चीजें साथ न बढ़ें तो ट्रेनिंग की सीट अतिरिक्त सेवा-जनशक्ति में बदल सकती है। सवाल यह है कि हम पीजी सीटें विशेषज्ञ डॉक्टर बनाने के लिए बढ़ा रहे हैं या अस्पताल चलाने के लिए अतिरिक्त हाथ भी पैदा कर रहे हैं? काम के घंटे सिर्फ वर्क-लाइफ बैलेंस नहीं, पेशेंट सेफ्टी का भी सवाल हैं। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग उचित काम के घंटे और विश्राम की बात करता है। एम्स दिल्ली ने अगस्त 2025 के एक आधिकारिक ज्ञापन में रेजिडेंट डॉक्टरों की लगातार सक्रिय ड्यूटी सामान्यत: 12 घंटे से अधिक न रखने और जूनियर रेजिडेंटों के लिए 48 घंटे साप्ताहिक कार्य का प्रावधान दोहराते हुए ड्यूटी रिकॉर्ड रखने को कहा था। इसके बावजूद 24 घंटे या उससे अधिक की लगातार ड्यूटी की शिकायतें आती रहती हैं। अदालत बोल चुकी है, संसद बोल चुकी है, नियम कागज पर मौजूद है। फिर भी हर कुछ महीनों में किसी न किसी संस्थान से यही शिकायत लौट आती है। सवाल नीति का नहीं, निगरानी का है। कौन जांचता है कि रोस्टर वास्तव में कितने घंटे का बना, कितनी बार टूटा और किसने तोड़ा? वास्तविक ड्यूटी घंटे दर्ज हों, आराम सुनिश्चित हो और नियम टूटने पर जवाबदेही तय हो, तभी नियम जमीन पर उतरेंगे। मेडिकल शिक्षा की संस्कृति पर भी सवाल है। मेहनत इस पेशे की बुनियाद है, लेकिन क्या हमने कभी-कभी थकान को समर्पण और चुप रहने को मजबूती मान लिया है? थकान को समर्पण का प्रमाण मान लेना और सीखने को केवल घंटों से मापना, दोनों में फर्क है। किसी रेजिडेंट को छुट्टी मिलना और उसका छुट्टी ले पाना भी अलग बातें हैं।

किसी छुट्टी का अधिकार तभी वास्तविक है जब उसे लेने के लिए रेजिडेंट को अपने विभाग से लडऩा न पड़े। शिकायत की व्यवस्था तभी भरोसेमंद होगी जब अपने मूल्यांकन, थीसिस, ड्यूटी या कॅरियर पर असर का डर न हो। जिस व्यक्ति के पास आपकी ड्यूटी, आपकी छुट्टी, आपकी थीसिस और कभी-कभी आपके भविष्य के मूल्यांकन की ताकत हो, उसी से शिकायत करने की व्यवस्था को हम कितना स्वतंत्र कह सकते हैं? संवेदनशील शिकायत के लिए गोपनीय और स्वतंत्र रास्ता जरूरी है। मानसिक स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ काउंसलिंग कक्ष खोल देना नहीं है। अगर कोई रेजिडेंट ड्यूटी संभालने की हालत में न हो, तो क्या वह बिना कॅरियर रिस्क के मदद मांग सकता है? तीन बजे रात को काउंसलिंग हेल्पलाइन का नंबर होना और तीन बजे रात को बिना कॅरियर रिस्क के मदद मांग पाना, दो अलग बातें हैं। आत्महत्या की रोकथाम को मानसिक मजबूती की कार्यशाला तक सीमित नहीं किया जा सकता। मानसिक मजबूती जरूरी है, लेकिन खराब स्टाफिंग या लगातार नींद की कमी का विकल्प नहीं।

अब जरूरत एक और घोषणा की नहीं, यह देखने की है कि अस्पताल में वास्तव में क्या बदला। पीजी सीटों को फैकल्टी, स्टाफ, बेड और पर्यवेक्षण की क्षमता से जोडऩा होगा। वास्तविक ड्यूटी घंटे दर्ज हों, स्वतंत्र ऑडिट हो, लंबे काम के बाद संरक्षित विश्राम मिले और शिकायतकर्ता को प्रतिशोध से सुरक्षा मिले। मेडिकल कॉलेजों की मान्यता में रेजिडेंट सेफ्टी को ट्रेनिंग क्वालिटी का मानक माना जाए।
देश को रेजिडेंट डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या से जुड़े मामलों का भरोसेमंद राष्ट्रीय आंकड़ा भी चाहिए। हर सुधार के साथ यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसे लागू कौन करेगा, अनुपालन कैसे मापा जाएगा और न मानने पर क्या होगा। जोधपुर की जांच अपना रास्ता तय करेगी। उससे बड़ा सवाल हमारे सामने रहेगा- हम डॉक्टर बना किस तरह रहे हैं? यदि उद्देश्य सक्षम, संवेदनशील और सुरक्षित डॉक्टर तैयार करना है, तो रेजिडेंसी ऐसी व्यवस्था हो, जिसमें मरीज की देखभाल और डॉक्टर की गरिमा, दोनों साथ बचें।

वरिष्ठ चिकित्सक

Updated on:
30 Sept 2026 06:06 pm
Published on:
30 Sept 2026 06:06 pm