
जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियाई खेल 2026 में भारत ने 21 स्वर्ण सहित कुल 85 पदक जीतकर तालिका में चौथा स्थान हासिल किया। हांगझोऊ एशियाई खेलों में भारत ने 28 स्वर्ण सहित 107 पदक जीतकर इतिहास रचा था। इस दृष्टि से देखें तो 85 पदक निश्चित रूप से पिछले संस्करण से पीछे हैं, लेकिन 21 स्वर्ण के साथ भारत ने एशियाई खेलों के इतिहास में दूसरा सर्वश्रेष्ठ स्वर्ण प्रदर्शन किया है। यही आंकड़े भारत के प्रदर्शन को दिलचस्प, पर गंभीर विश्लेषण की मांग करने वाला विषय बनाते हैं। 107 से 85 पदक पर आना हमें आत्ममंथन के लिए बाध्य करता है, वहीं 21 स्वर्ण और चौथा स्थान यह भी बताता है कि भारतीय खेलों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बनी हुई है। इसलिए इसे न तो केवल असाधारण सफलता बताना उचित होगा व न ही पदकों की कमी के आधार पर निराशाजनक कहना।
सही मूल्यांकन यह है कि भारत की खेल व्यवस्था ने अपनी क्षमता का विस्तार किया है, लेकिन निरंतरता अब भी हमारी सबसे बड़ी चुनौती है। भारत का खेल मानचित्र कुछ चुनिंदा खेलों से आगे बढ़ रहा है। अब चुनौती इस विस्तार को स्थायी पदक क्षमता में बदलने की है। भारत के प्रदर्शन का सबसे बड़ा श्रेय निस्संदेह खिलाडिय़ों, प्रशिक्षकों और सहयोगी स्टाफ को जाता है। लेकिन पिछले एक दशक में तैयार हुए संस्थागत ढांचे की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खेलो इंडिया, टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम, राष्ट्रीय खेल महासंघों को सहायता, बेहतर प्रशिक्षण सुविधाएं, खेल विज्ञान, और विदेशी प्रशिक्षण ने भारतीय खिलाडिय़ों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की तैयारी के अधिक अवसर दिए हैं। सबसे सकारात्मक परिवर्तन यह है कि आज भारतीय खिलाड़ी सिर्फ भागीदारी के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में नहीं उतरते। खेलों में वे पदक के वास्तविक दावेदार के रूप में मैदान में उतर रहे हैं।
खेलों को लेकर सरकार, कॉर्पोरेट क्षेत्र और समाज में बढ़ी गंभीरता ने भी खिलाडिय़ों के लिए बेहतर वातावरण बनाया है। लेकिन एशियाई खेलों के नतीजे यह भी बताते हैं कि किसी एक सरकारी योजना या कुछ उत्कृष्ट खिलाडिय़ों के भरोसे वैश्विक खेल शक्ति नहीं बना जा सकता। प्रतिभा पहचान से लेकर विश्वस्तरीय खिलाड़ी बनने तक एक लंबी शृंखला है। प्रशिक्षित कोच, खेल विज्ञान, पोषण, मानसिक प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण उपकरण, नियमित प्रतियोगिता, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और पारदर्शी चयन- इन सभी कडिय़ों को एक साथ मजबूत करना होगा। अगला चरण योजनाओं की संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि उनके परिणामों को मापने का होना चाहिए। यह जानना जरूरी है कि जिला स्तर पर पहचानी गई कितनी प्रतिभाएं राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचीं, राष्ट्रीय शिविरों में शामिल खिलाडिय़ों में कितना प्रदर्शन सुधार हुआ और सार्वजनिक निवेश अंतत: अंतरराष्ट्रीय परिणामों में कितना परिवर्तित हुआ। भारतीय खेल नीति को अब खर्च और गतिविधियों से आगे बढ़कर परिणाम और जवाबदेही की ओर जाना होगा। भारतीय महिला हॉकी टीम की सफलता इस एशियाई खेल अभियान की सबसे प्रेरक उपलब्धियों में से एक है। भारतीय हॉकी की प्रगति की चर्चा ओडिशा के योगदान के बिना अधूरी है। ओडिशा ने हॉकी को केवल प्रायोजन या किसी बड़े आयोजन की मेजबानी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे दीर्घकालीन खेल विकास की नीति से जोड़ा। यह भारत के अन्य राज्यों के लिए महत्वपूर्ण संदेश देता है। स्थानीय प्रतिभा, परंपरा, भौगोलिक परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर राज्यों को कुछ प्राथमिक खेल चुनकर उनमें विश्वस्तरीय उत्कृष्टता केंद्र विकसित करने चाहिए। उत्कृष्टता केंद्र का अर्थ केवल नया स्टेडियम या भवन नहीं होना चाहिए। विश्वस्तरीय खेल व्यवस्था के लिए प्रशिक्षित कोच, फिजियोथेरेपिस्ट, स्पोट्र्स साइकोलॉजिस्ट, न्यूट्रिशन विशेषज्ञ, स्पोट्र्स मेडिसिन, डेटा विश्लेषण और वर्षभर उच्चस्तरीय प्रतियोगिता आवश्यक हैं।
भारत को भी यदि ओलंपिक पदक तालिका में बड़ी छलांग लगानी है तो 'कुछ खेलों में अधिक पदक' के साथ-साथ 'अधिक खेलों में पदक क्षमता' विकसित करनी होगी। ओलंपिक की दृष्टि से हमें ऐसे खिलाडिय़ों की संख्या बढ़ानी होगी जो केवल फाइनल या पोडियम के दावेदार नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने में सक्षम हों। विश्वविद्यालयों, सेना, रेलवे, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, राज्य संघों, निजी संस्थानों और खेल महासंघों को मिलकर एक मजबूत राष्ट्रीय प्रतियोगिता कैलेंडर तैयार करना चाहिए। हमें तैराकी, जिम्नास्टिक, साइक्लिंग, रोइंग, कैनोइंग, फेंसिंग, मॉडर्न पेंटाथलॉन और अन्य ओलंपिक खेलों में भी प्रतिभा का व्यापक आधार तैयार करना होगा। इसके लिए शुरुआत ओलंपिक शिविर से नहीं, स्कूल से करनी होगी। यहां फिजिकल एजुकेशन शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि फिजिकल एजुकेशन शिक्षकों को वैज्ञानिक टैलेंट आइडेंटिफिकेशन, बेसिक स्पोट्र्स साइंस और रैफरल मैकेनिज्म का प्रशिक्षण दिया जाए। एशियाई खेलों की उपलब्धियों के बीच यह भी स्पष्ट है कि भारत की अगली बड़ी छलांग केवल प्रतिभाशाली खिलाडिय़ों से नहीं, बल्कि पारदर्शी और जवाबदेह खेल व्यवस्था से आएगी। एशियाई पोडियम से ओलंपिक तक पहुंचने के लिए अब प्रत्येक संभावित खिलाड़ी की वैज्ञानिक, दीर्घकालीन और परिणाम-आधारित तैयारी जरूरी है। भारत को अंतिम समय के 'मिशन मोड' से आगे बढ़कर स्कूलों में मजबूत फिजिकल एजुकेशन, प्रारंभिक प्रतिभा पहचान, नियमित उच्चस्तरीय प्रतियोगिता, खेल विज्ञान और चार वर्षीय खिलाड़ी-केंद्रित योजना पर काम करना होगा। भारत का लक्ष्य एक ऐसी खेल व्यवस्था बनाना होना चाहिए, जिसमें सफलता अपवाद नहीं, निरंतरता बने और भारत एक उभरती शक्ति से आगे बढ़कर स्थायी वैश्विक स्पोर्टिंग नेशन बने।
पीयूष जैन,(राष्ट्रीय सचिव फिजिकल एजुकेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया)