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नारी जीवन की श्रेष्ठता एवं सार्थकता मातृत्व से ही

भारतीय समाज में जन्म से मृत्यु तक जितनी भी अवस्थाएं हैं सभी में स्त्री का पूज्य व महत्वपूर्ण स्थान है। प्रति वर्ष 8 मार्च को मनाए जाने वाले महिला दिवस का उद्देश्य भी महिलाओं की समाज में भूमिका व उनके स्थान को लेकर जागरूकता बढ़ाने का रहा है। कुलिश जी ने तीस वर्ष पूर्व लिखे आलेख में भारत में स्त्री की महत्ता का जिक्र करते हुए कहा था कि हमारे यहां परिवार की धुरी स्त्री को ही कहा जाता है और देश की अर्थव्यवस्था व समाज-संगठन में स्त्रियों की हमारे यहां जैसी भागीदारी अन्यत्र नहीं देखी जाती। स्त्री की महत्ता बताते इस आलेख के प्रमुख अंश:

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Mar 06, 2026

इस देश की एक महत्ती शक्ति स्त्री है। इस देश का जो भी सुसंगठित स्वरूप आज देखने में आ रहा है, वह उसकी परिवार पद्धति है और परिवार की धुरी स्त्री है। देश की अर्थव्यवस्था और समाज-संगठन में स्त्री की जो भागीदारी है, वह प्रभूत मात्रा में हैं और कहीं नहीं देखी जाती। पर्व-त्योहारों-शादी-ब्याहों और रीति-रिवाजों की पालना में स्त्री की भागीदारी पुरुषों से अधिक हो जाती है। पुरुष और स्त्री की यह भागीदारी सहज रूप से हो रही है और सदियों से चल रही है। शहरों में जीवन खेती-बाड़ी और दस्तकारी पर आधारित न होने के कारण आर्थिक क्रियाकलापों में भी स्त्री-पुरुष की भागीदारी का तारतम्य बिगड़ गया। हमारे देश में स्त्री की जो प्रतिष्ठा है वह वैदिक व्यवस्था का मूल यज्ञ है। इस व्यवस्था में निहित है कि स्त्री की सहभागिता के बिना कोई भी यज्ञ नहीं कर सकता। भगवान राम भी नहीं कर पाए। हमारे यहां पुरुष के लिए यह अनिवार्य बंधन है कि जीवन का कोई भी मांगलिक व महत्वपूर्ण कार्य स्त्री की भागीदारी किए बिना नहीं कर सकता। संसार भर में यह बंधन किसी देश के पुरुष पर लागू नहीं है। इस भागीदारी का प्रत्यक्ष प्रभाव यह है कि स्त्री को आजीवन साथ रखना अनिवार्य है।

स्त्री का श्रेष्ठ स्वरूप इस देश में माता के रूप में माना गया है। मातृत्व को ही हमारे यहां नारी जीवन की श्रेष्ठता और सार्थकता माना है। स्त्री के अन्य जितने भी रूप हैं, वे मातृत्व के रूप के समान नहीं रखे गए। मातृत्व को हमने तात्विक रूप में, पारमार्थिक रूप में ग्रहण किया है। इसका प्रमाण हम प्रत्यक्ष व्यवहार में देख सकते हैं। हम अपनी मां के लिए तरह-तरह के सम्बोधन काम में लेते हैं। भाभी, बाई, चाची, अन्नी, धाय, भाभू वगैरह। हमारी मां लौकिक हैं ही नहीं। अगर मां कोई है, तो वह जगन्माता ही है। जगज्जननी है, जगदम्बा ही है। मां का यह स्वरूप संसार के किस देश में है? कैसे यह स्वरूप हमने अपनी मां को दिया? इस पर विचार करें, तो हम पाएंगे कि हमने स्त्री को सृष्टि ही माना है और उसके साथ दैनिक जीवन में वैसा ही व्यवहार करते हैं।

पुरुष के नाम में भी स्त्री का नाम पहले

मातृत्व ही स्त्री का श्रेष्ठ रूप है। विदेशों में भले ही 'लेडीज फस्र्ट' का दिखावटी नारा देकर अपने को सभ्य बताने का प्रदर्शन किया जाता हो लेकिन हमारे यहां तो पुरुष के नाम में भी देवी का या स्त्री का नाम ही पहले लिया जाता है। जैसे सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर आदि। जिस समाज में माता को इस तरह से आराध्यदेव का दर्जा दिया जाता हो उसकी दुर्दशा भला कैसे हो सकती है? अपने देश में स्त्री का एक अन्य रूप देखते हैं कन्या के रूप में। हमारे देश में कन्या की पूजा होती है। हमारे परिवारों में कन्या से कोई पैर नहीं छुआता, क्योंकि वह पूजा की पात्र है। घरों में पलने वाली तुलसी को कन्या रूप में पूजते हैं। देश भर में कन्याओं की पूजा होती है। गुवाहाटी में भगवती कामाख्या देवी के यात्री कन्याओं की पूजा किए बिना नहीं आते। नवरात्रों में कन्याओं की विशेषत: पूजा-आवभगत-सरबरा सर्वत्र होती है।

भारत की नारी

भारत की नारी जसी,
दुनियाँ भर में नाँहि।
कोई मंगल काम हो,
नारी बिना हो नाँहि।।

'सात सैंकड़ा' से

..और अमरीका में स्त्रित्व पीछे छूटा

अमरीका में जीवन के सभी क्षेत्रों में व पहलुओं में स्त्री का स्थान बराबरी का है लेकिन सक्रिय राजनीति में भारत की अपेक्षा बहुत कम है। इसका कारण अवसरों की कमी नहीं है लेकिन यहां की स्त्री राजनीति को आम तौर पर ज्यादा आकर्षक क्षेत्र नहीं मानती। औद्योगिक सभ्यता की अतिशयता ने अमरीकी स्त्री को बदला भी खूब है। वह पुरुषों की बराबरी में अपना स्त्रीत्व भी पीछे छोड़ आई है। भारत के काव्य साहित्य में स्त्रियों के लिए जो उपमाएं हैं उन्हें किसी अमरीकी स्त्री पर लागू किया जाए तो ऊंचे दर्जे का कार्टून बन जाए।

(कुलिश जी की पुस्तक 'अमरीका एक विहंगम दृष्टि' से )

(जारी… कुलिश जी का सृजन संसार पढ़ें आगामी गुरुवार को भी)

Published on:
06 Mar 2026 01:25 pm
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