
शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून का उद्देश्य हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करना है लेकिन इस कानून के तहत दाखिला लेने वाले बच्चों से भेदभाव वाला बर्ताव होने लगे तो चिंता होना स्वाभाविक है। छत्तीसगढ़ के सूरजपुर में डीएवी पब्लिक स्कूल में आरटीई के तहत दाखिला लेने वाले बच्चों से मजदूरी और सफेदी कराने की खबर सचमुच झकझोरने वाली और इसी चिंता को बढ़ाने वाली है। इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्कूल शिक्षा सचिव से जवाब मांगा है।
बात सिर्फ छत्तीसगढ़ की ही नहीं, इससे पहले भी देश के विभिन्न हिस्सों में निजी स्कूलों में विद्यार्थियों से भेदभाव के ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। गुजरात के अहमदाबाद में पिछले दो वर्षों में चार स्कूलों पर ऐसे भेदभाव की शिकायतें दर्ज हुईं, जहां आरटीई में प्रवेश पाने वाले बच्चों को अन्य विद्यार्थियों के साथ बैठने, खाने या खेलने की अनुमति नहीं दी जाती थी। हरियाणा में निजी स्कूलों को दाखिला न देने पर मान्यता रद्द करने तक की चेतावनी दी गई, जबकि कर्नाटक में विज्ञान प्रयोगशालाओं और कम्यूटर लैब में आरटीई विद्यार्थियों को अलग रखे जाने की भी जानकारी सामने आई। दिल्ली, आंध्रप्रदेश और पंजाब में भी प्रवेश से इनकार, फीस मांगने या दस्तावेजों का खामियों को लेकर बहानेबाजी के मामले सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही आरटीई में 25 प्रतिशत आरक्षण को अनिवार्य बताते हुए दिशानिर्देश जारी किए, लेकिन इस दिशा में राज्य सरकारों के स्तर पर क्या कार्रवाई हुई, यह बड़ा सवाल है।
ज्यादातर मामलों में सिर्फ चेतावनी या कारण बताओ नोटिस तक सीमित रही, जबकि कहीं स्कूलों की मान्यता नियमों के अवहेलना को लेकर रद्द हुई हो, ऐसे सख्त कदम शायद ही कहीं नजर आते हैं। निजी स्कूल सरकार के दबाव में अपने यहां दाखिला तो दे देते हैं, लेकिन वे इन बच्चों को दूसरे दर्जे का मानते हैं, क्योंकि वे फीस नहीं देते। इतना ही नहीं, कभी-कभी तो ऐसे बच्चों के साथ टीचर भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर बर्ताव करते हैं। सच तो यह है कि आरटीई जैसे कानून के मजबूत प्रावधान भी स्कूल संगठनों की लॉबिंग के चलते पूरी तरह लागू नहीं हो पाते। चूंकि भारत में आरटीई की कई कमजोरियां उजागर हो चुकी हैं, इसलिए इस दिशा में आ रही परेशानियों का समाधान जरूरी है।
सरकार को सख्त मॉनिटरिंग सिस्टम बनाना चाहिए जैसे नियमित निरीक्षण और शिकायत पोर्टल। नियमों की पालना नहीं करने वाले स्कूलों पर जुर्माना और मान्यता रद्द करने की नीति का कड़ाई से पालन किया जाना भी जरूरी है। जरूरत इस बात की भी है कि शिक्षण संस्थान अपने यहां शिक्षकों को भी संवेदनशीलता का प्रशिक्षण दें और अभिभावकों को जागरूक बनाएं। ऐसा तब ही संभव होगा जब जरूरतमंद बच्चों के साथ आर्थिक व सामाजिक आधार पर कम से कम शिक्षण संस्थानों में तो भेदभाव खत्म हो।
Published on:
06 Mar 2026 01:34 pm
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