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छाया युद्ध से वैश्विक संकट तक: भारत के लिए चुनौती

इजरायल और ईरान के पड़ोसी देशों की स्थिति भी जटिल है, लेबनान पहले से आर्थिक संकट में है और वहां हिजबुल्लाह की सक्रियता उसे सीधे युद्ध में खींच सकती है, सीरिया लंबे समय से बाहरी शक्तियों के टकराव का मैदान बना हुआ है। इराक में ईरान समर्थित गुट सक्रिय हैं, जबकि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देश संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 06, 2026

सुखवीर सिंह - भारतीय प्रशासनिक अधिकारी,

अमरीका मध्य-पूर्व की राजनीति में ईरान और इजरायल के बीच तनाव नया नहीं है। यह दशकों पुराना वैचारिक, सामरिक और भू-राजनीतिक संघर्ष है, जो सीधे युद्ध से अधिक 'छाया युद्ध' के रूप में सामने आता रहा है। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद तेहरान की नई सत्ता ने इजरायल को वैध राज्य के रूप में स्वीकार नहीं किया और तभी से दोनों देशों के रिश्ते टकराव में बदल गए। यह टकराव प्रॉक्सी संगठनों, साइबर हमलों, खुफिया अभियानों और सीमित सैन्य कार्रवाइयों के रूप में दिखाई देता रहा है। लेबनान में हिजबुल्ला और गाजा में हमास को ईरान का समर्थक माना जाता है, जबकि इजरायल ने सीरिया में ईरानी ठिकानों पर कई बार हवाई हमले किए हैं। हाल के वर्षों में क्षेत्रीय हिंसा और जवाबी कार्रवाइयों ने आशंका बढ़ाई है कि कहीं यह सीमित संघर्ष व्यापक युद्ध में न बदल जाए और यही आशंका वैश्विक राजनीति को भी प्रभावित कर रही है।

ईरान- इजरायल तनाव ने दुनिया को और अधिक ध्रुवीकृत कर दिया है। अमरीका खुलकर इजरायल के साथ खड़ा दिखता है, जबकि रूस और चीन कूटनीतिक स्तर पर ईरान के साथ संतुलन बनाते दिखाई देते हैं। यह ध्रुवीकरण केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि शतरंज की चालों जैसा है, जिसका प्रभाव प्रतिबंधों, हथियारों की आपूर्ति, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा मार्गों की रणनीति तक फैला हुआ है। संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर सहमति बनाना कठिन होता जा रहा है और विश्व राजनीति 'खेमों' में बंटती प्रतीत होती है। अमरीका की भूमिका यहां केंद्रीय है, उसका इजरायल से पुराना गहरा सैन्य-सुरक्षा सहयोग है और वह मध्य-पूर्व को अपने रणनीतिक हित का हिस्सा मानता है, लेकिन साथ ही वह व्यापक युद्ध से भी बचता रहा है क्योंकि इससे वैश्विक तेल बाजार, महंगाई और उसकी अपनी घरेलू राजनीति प्रभावित हो सकती है। परंतु इस बार अमरीका की भूमिका राष्ट्रपति ट्रंप के मनमौजी रवैये के कारण स्पष्ट नहीं है। ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है, पर उसकी क्षेत्रीय अहमियत पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

इस पूरे समीकरण में सबसे बड़ा दांव तेल और व्यापार का है। हॉर्मुज स्ट्रेट से विश्व का लगभग पांचवें हिस्से का तेल गुजरता है, यदि यह मार्ग बाधित होता है तो तेल की कीमतों में तेज उछाल संभव है, जिसका असर वैश्विक महंगाई, परिवहन लागत, खाद्य मूल्य और औद्योगिक उत्पादन पर पड़ेगा। यूरोप, एशिया और अफ्रीका के कई देश खाड़ी क्षेत्र पर ऊर्जा के लिए निर्भर हैं, इसलिए यह संघर्ष स्थानीय न रहकर वैश्विक आर्थिक संकट का कारण बन सकता है। इजरायल और ईरान के पड़ोसी देशों की स्थिति भी जटिल है, लेबनान पहले से आर्थिक संकट में है और वहां हिजबुल्लाह की सक्रियता उसे सीधे युद्ध में खींच सकती है, सीरिया लंबे समय से बाहरी शक्तियों के टकराव का मैदान बना हुआ है। इराक में ईरान समर्थित गुट सक्रिय हैं, जबकि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देश संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं, वे न तो ईरान से खुला टकराव चाहते हैं और न ही अमरीका एवं इजरायल से रिश्ते बिगाडऩा चाहते हैं। उनकी प्राथमिकता स्थिरता और आर्थिक विकास है, इसलिए वे किसी बड़े युद्ध से बचना चाहते हैं।

भारत के लिए यह स्थिति बहुस्तरीय चुनौती प्रस्तुत करती है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी से आयात करता है, यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो महंगाई, चालू खाता घाटा और आर्थिक दबाव बढ़ सकते हैं। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं, इसलिए क्षेत्रीय अस्थिरता उनके रोजगार और सुरक्षा पर सीधा असर डाल सकती है। कूटनीतिक स्तर पर भारत के इजरायल के साथ रक्षा, कृषि और तकनीकी सहयोग मजबूत हैं, वहीं ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध और चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएं रणनीतिक महत्व रखती हैं, ऐसे में भारत को सावधानीपूर्वक संतुलन बनाए रखना होगा। वैश्विक मंचों पर भारत 'रणनीतिक स्वायत्तता' की नीति अपनाता है और किसी एक खेमे में खुलकर शामिल होने से बचता है, पर बढ़ता वैश्विक ध्रुवीकरण इस नीति को और जटिल बना देता है। कुल मिलाकर, ईरान-इजरायल संघर्ष केवल दो देशों का विवाद नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता का प्रश्न है। अधिकांश बड़ी शक्तियां व्यापक युद्ध से बचना चाहती हैं क्योंकि आर्थिक और राजनीतिक नुकसान बहुत बड़ा है, इसलिए संभावना यही है कि टकराव सीमित या प्रॉक्सी रूप में चलता रहे, फिर भी उसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई देती रहेगी।