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हिमालय में बढ़ता बर्फ का ‘सूखा’, पानी पर गहराता संकट

केवल कार्बन उत्सर्जन कम करने से समस्या हल नहीं होगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन, वर्षा जल संचयन, ग्लेशियर मॉनिटरिंग और सतत विकास पर ध्यान देना होगा। हिमालयी क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण, वनों की कटाई और अनियंत्रित पर्यटन भी इस संकट को बढ़ा रहे हैं।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 06, 2026

लोकेश त्रिपाठी - वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार,

हिमालय को भारत ही नहीं, पूरे एशिया का जल टावर माना गया है। यह वही पर्वत शृंखला है जो करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। यहां की बर्फ और ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी ही देश की प्रमुख नदियों गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र को सालभर जीवित रखता है लेकिन हाल के वर्षों में हिमालय एक गंभीर संकट से गुजर रहा है। इसे ग्रेट हिमालयन स्नो ड्राउट कहा जा रहा है। इसका मतलब है कि सर्दियों में सामान्य से बहुत कम बर्फ गिर रही है और जो बर्फ गिरती भी है, वह जल्दी पिघल जाती है। गत वर्ष की रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव और कमजोर सर्दी ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। यह केवल पहाड़ों की समस्या नहीं है, बल्कि उत्तर भारत की जल, खाद्य और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा बड़ा खतरा बन चुका है। अगर यही स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में पानी की उपलब्धता पर गहरा असर पड़ सकता है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डवलपमेंट की वर्ष 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में स्नो पर्सेस्टेंस यानी बर्फ के टिके रहने की अवधि सामान्य से लगभग 23.6 प्रतिशत कम रही, जो पिछले 23 वर्षों में सबसे कम स्तर है। यह भी पाया गया कि पिछली पांच सर्दियों में से चार में सामान्य से कम बर्फबारी हुई है।

इसके अलावा, सर्दी 2025-26 के दौरान कई हिमालयी राज्यों में वर्षा और बर्फबारी में भारी कमी दर्ज की गई। उदाहरण के लिए, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में कुछ क्षेत्रों में 99-100 प्रतिशत तक की कमी देखी गई, जबकि जम्मू-कश्मीर में करीब 70-80 प्रतिशत और लद्दाख में 60 प्रतिशत से अधिक कमी दर्ज की गई। इंडिया मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट (आइएमडी) के आंकड़े भी बताते हैं कि इस दौरान पश्चिमी विक्षोभ कमजोर रहे, जिससे सर्दियों में अपेक्षित बर्फबारी नहीं हो सकी। ये आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि हिमालय में बर्फ का संकट अब एक गंभीर और लगातार बढ़ती समस्या बन चुका है। इस स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारी नीतियां और तैयारी इस संकट से निपटने के लिए पर्याप्त हैं? सरकार ने हाल के वर्षों में क्लाइमेट फंडिंग, ग्रीन एनर्जी और जल संरक्षण पर जोर जरूर दिया है लेकिन हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र के लिए विशेष रणनीति की जरूरत है। केवल कार्बन उत्सर्जन कम करने से समस्या हल नहीं होगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन, वर्षा जल संचयन, ग्लेशियर मॉनिटरिंग और सतत विकास पर ध्यान देना होगा। हिमालयी क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण, वनों की कटाई और अनियंत्रित पर्यटन भी इस संकट को बढ़ा रहे हैं। इसलिए विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। साथ ही, राज्यों के बीच जल प्रबंधन को लेकर बेहतर समन्वय होना चाहिए, क्योंकि नदियां कई राज्यों से होकर गुजरती हैं।