ओपिनियन

देशभक्ति के गीत सुन लेना ही देशभक्ति नहीं, पूरा देश दे जवानों को सम्मान

बीते एक पखवाड़े में दो दर्जन जवान बर्फबारी में दबकर 'शहीद' हो गए। पचास डिग्री तापमान में भी जवान सीमा की सुरक्षा करने में गर्व महसूस करते हैं। फिर उनके साथ दिक्कतें क्यों आती हैं?

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Jan 30, 2017
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शुक्र है, सेना के जवानों को अपनी समस्याएं बताने का मौका तो मिला। भले ही वाट्सअप के जरिए ही सही। पिछले दिनों सोशल मीडिया के माध्यम से चंद वीडियो वायरल ना हुए होते तो सैनिकों की समस्याएं उजागर ही नहीं हो पातीं।

समूचा देश सैनिकों के जज्बे को सलाम करता है। प्रधानमंत्री भी कुछ मौकों पर सैनिकों के साथ सीमा पर समय बिताकर आए हैं। रक्षा मंत्री और दूसरे बड़े अधिकारी भी जवानों के बीच जाते रहते हैं। फिर ऐसे क्या कारण हैं कि जवानों को बेहतर खाना नहीं मिल पाता हो। जरूरी काम के लिए उन्हें छुट्टियों के लिए तरसना पड़ता हो। हालात इतने बदतर हो जाते हों कि जवानों को अपने साथियों की हत्या करने पर मजबूर होना पड़े।

दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सेना में शुमार भारतीय सेना अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाने के लिए पहचानी जाती है। सीमा पर या देश के भीतर, जब भी विपदा आई, सैनिकों ने अपने कर्तव्य को निभाने में कभी कोताही नहीं बरती।

बीते एक पखवाड़े में दो दर्जन जवान बर्फबारी में दबकर 'शहीद' हो गए। पचास डिग्री तापमान में भी जवान सीमा की सुरक्षा करने में गर्व महसूस करते हैं। फिर उनके साथ दिक्कतें क्यों आती हैं? ये सवाल देश के करोड़ों लोगों को कचोटता है। सिर्फ 15 अगस्त या 26 जनवरी पर जवानों की शौर्य गाथाएं या देशभक्ति के गीत सुन लेना ही देशभक्ति नहीं मानी जा सकती। देशभक्ति का मतलब है पूरा देश जवानों को सम्मान दे।

सरकार जिम्मेदारियों का निर्वहन करे तो आम नागरिक उनका मनोबल बढ़ाएं। जवानों को अपने हक के लिए संघर्ष करना पड़े तो सीधा मतलब व्यवस्था में खामी की तरफ इशारा करता है। सरकार किसी भी दल की हो, जवानों के मामले में न तो राजनीति होनी चाहिए और न उन्हें राजनीति में घसीटा जाना चाहिए।

जवानों की समस्याओं को दूर करने के लिए वाट्सअप के जरिए लागू व्यवस्था को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। कोशिश ऐसी हो कि भविष्य में फिर किसी जवान को अपनी समस्या के समाधान के लिए सोशल मीडिया का सहारा ना लेना पड़े।

Published on:
30 Jan 2017 11:06 am