ओपिनियन

कुएं में भांग

मां सरस्वती! अगर कहीं है तो सबसे पहले इन भ्रष्टों का साथ छोड़कर हमारे जैसे फक्कड़ों पर दया कर। पर 'मां' भी निर्धन पुत्र से ज्यादा 'धनी' बेटे का ही पक्ष लेती है। यही कड़वा सच है।

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Apr 24, 2017

स्याणों के गांव में बुद्धिमानों ने फैसला किया कि सारे गांव को सम्पन्न बनाने का एक मात्र तरीका है कि सारे कुंओं में भांग डाल दी जाए। स्याणों में से एक स्याणा बोला- विचार तो ठीक है पर भांग का खर्चा कौन देगा?

पहले स्याणे की बात सुन दूसरा स्याणा मुस्कराया और बोला- अपने गांव में जो भी आदमी कोई भी काम कराने आएगा उससे कहा जाएगा कि पहले वह भांग लाकर कुएं में डाले। फिर उसका काम किया जाएगा।

दूसरे स्याणे की बात का समर्थन सारे स्याणों ने किया और इस तरह विश्व में पहली बार भ्रष्टाचार की शुरुआत हुई। जो कालान्तर में रिश्वत, घूसखोरी, भेंट, उपहार इत्यादि के नाम से प्रसिद्ध हुई। स्याणों के गांव से शुरू हुई यह प्रथा धीरे-धीरे कस्बों, शहरों, महानगरों में फैली।

बाद में इसने अपना प्रभाव सरकारी कार्यालयों में बढ़ाया, इनमें पीडब्ल्यूडी, आबकारी, थाना-कोतवाली, बिजली विभाग इत्यादि प्रमुख थे। परन्तु बाद में इसने अपना विस्तार शिक्षा से जुड़े महकमों में भी कर लिया।

आज तो आलम यह लग रहा है कि मानो किसी शायर ने यह मशहूर शेर विश्वविद्यालय के लिए ही लिखा है- हर शाख (विभाग) पे उल्लू (रिश्वतखोर प्रोफेसर) बैठा है, अंजामे गुलिस्तां (यूनिवर्सिटी) क्या होगा।

कसम से इतने सारे प्रोफेसरों, गोपनीय अधिकारियों, इतने सारे पेपर आउट होने के बाद उन बच्चों से सहानुभूति होने लगी है जो जी-जान से पढ़ाई करते हैं और मेहनत करने के बावजूद पिछड़ जाते हैं।

बहरहाल मजा आ रहा है। एक-एक करके सारे नकाब उलट रहे हैं। अपने को दुनिया के सबसे बड़े नैतिक, सिद्धान्तवादी, विचारक, विद्वान, बुद्धिजीवी कहने वाले ही किसी 'लड़की' को प्रेमपूर्वक पर्चा आउट कराते पकड़े जा रहे हैं।

मां सरस्वती! अगर कहीं है तो सबसे पहले इन भ्रष्टों का साथ छोड़कर हमारे जैसे फक्कड़ों पर दया कर। पर 'मां' भी निर्धन पुत्र से ज्यादा 'धनी' बेटे का ही पक्ष लेती है। यही कड़वा सच है।

व्यंग्य राही की कलम से

Published on:
24 Apr 2017 02:40 pm
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