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कैंसर की लड़ाई: बीमारी से ज्यादा घातक है असमानता

कैंसर तेजी से बढ़ती वैश्विक चुनौती है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या बीमारी नहीं बल्कि इलाज में मौजूद असमानता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए कैंसर अक्सर गरीबी का कारण बन जाता है। भारत में तंबाकू नियंत्रण, समय पर स्क्रीनिंग, एचपीवी टीकाकरण, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का विस्तार कैंसर से होने वाली मौतों और आर्थिक बोझ को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। बीमारी से लड़ने के लिए सरकार, समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था के साझा प्रयास जरूरी हैं।
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Aug 06, 2026
PublicHealthPolicy
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हरचंद राम, सहायक प्रोफेसर, विकास अध्ययन संस्थान, जयपुर

विश्व स्वास्थ्य संगठन की हाल ही में जारी ‘ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट ऑन कैंसर 2026- द फ्यूचर वी चूज टुगेदर’ एक चेतावनी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट के अनुसार हर पांचवां व्यक्ति अपने जीवनकाल में कैंसर का सामना करेगा और यदि परिवार के सदस्यों को भी जोड़ लिया जाए तो दुनिया की करीब 92 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में इस बीमारी से प्रभावित होगी।
वर्ष 2024 में विश्वभर में करीब 2.06 करोड़ नए कैंसर के मामले दर्ज किए गए और यह आंकड़ा 2050 तक बढकऱ हर साल 3.5 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर (16 लाख मामले) और प्रोस्टेट कैंसर (15 लाख मामले) सबसे अधिक पाए गए। वहीं महिलाओं में स्तन कैंसर (24 लाख मामले) और फेफड़ों का कैंसर (10 लाख मामले) प्रमुख रहे। इसके अलावा कोलोरेक्टल (आंत) कैंसर भी दोनों लिंगों को प्रभावित करने वाले बड़े संकट के रूप में सामने आया है।
लेकिन इन आंकड़ों से भी बड़ी चिंता यह है कि कैंसर से बचने की संभावना अब केवल बीमारी की प्रकृति से तय नहीं हो रही, बल्कि व्यक्ति के भौगोलिक क्षेत्र, पर्यावरणीय परिस्थितियों और आर्थिक स्थिति पर भी निर्भर हो रही है। रिपोर्ट बताती है कि विकसित देशों में कैंसर का पता लगने के बाद पांच साल तक जीवित रहने की दर सबसे कम विकसित देशों की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत अधिक है। यानी एक ही बीमारी, लेकिन जीवन की संभावना भूगोल और आर्थिक क्षमता से प्रभावित हो रही है। यही असमानता कैंसर की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुकी है।

इलाज मौजूद, लेकिन पहुंच अब भी चुनौती
रिपोर्ट में शामिल एक भारतीय स्वास्थ्यकर्मी का अनुभव इस हकीकत को सामने लाता है। किशोरावस्था में कैंसर से जूझ रही एक लडक़ी के बारे में वे लिखते हैं कि उसने इलाज नहीं छोड़ा, बल्कि सच यह है कि ‘इलाज ने कई मायनों में उसे छोड़ दिया।’ यह स्थिति भारत सहित दुनिया के अनेक निम्न और मध्यम आय वाले देशों की वास्तविकता है, जहां इलाज की सुविधा तो उपलब्ध है, लेकिन वह हर व्यक्ति की पहुंच में नहीं है।
आर्थिक बोझ की तस्वीर भी उतनी ही चिंताजनक है। रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में करीब आधे कैंसर मरीज और उनके परिवार इलाज के दौरान विनाशकारी स्वास्थ्य खर्च की चपेट में आते हैं। वर्ष 2020 से 2050 के बीच कैंसर का कुल आर्थिक बोझ वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद पर लगभग 0.55 प्रतिशत के वार्षिक ‘कर’ के बराबर रहने का अनुमान है। दुनिया के केवल 28 प्रतिशत देशों ने अपनी सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज योजनाओं में कैंसर देखभाल का न्यूनतम पैकेज शामिल किया है।

एक बीमारी, और परिवार गरीबी में
कैंसर का आर्थिक प्रभाव सभी वर्गों पर समान नहीं पड़ता। प्रोफेसर अनिरुद्ध कृष्णा के शोध से निकली बात भारत में बार-बार सच साबित होती है,‘एक बीमारी, और परिवार गरीबी में।’ आर्थिक रूप से कमजोर, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति परिवारों के लिए यह संकट और गहरा है। ऐसे परिवारों की आजीविका अक्सर किसी सदस्य की शारीरिक श्रम क्षमता पर निर्भर होती है। चाहे वह खेत-मजदूरी हो, निर्माण कार्य या दिहाड़ी का कोई अन्य काम।
जब कमाने वाला सदस्य इलाज के कारण काम करने में असमर्थ हो जाता है, तो परिवार की आय रुक जाती है और इलाज का खर्च बढ़ जाता है। नतीजतन जमीन गिरवी रखना, गहने बेचना या साहूकारों से कर्ज लेना आम हो जाता है। जिन परिवारों के पास बीमा, संपत्ति या नियमित आय का सहारा होता है, वे इस झटके को कुछ हद तक झेल लेते हैं, लेकिन कमजोर परिवारों के लिए कैंसर अक्सर आर्थिक तबाही की शुरुआत बन जाता है।

भारत के लिए सबक और उम्मीद
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट भारत के लिए चुनौती के साथ उम्मीद भी लेकर आई है। रिपोर्ट में कर्नाटक की आयुष्मान भारत आरोग्य योजना का उदाहरण दिया गया है, जहां राज्य स्वास्थ्य योजना के तहत कैंसर इलाज की सुविधाओं का विस्तार किया गया और करीब 60,000 नई मंजूरियों के जरिए मरीजों को उपचार तक पहुंच मिली। वहीं केरल में तंबाकू और गुटखा सेवन से जुड़े मुंह के कैंसर पर हुए शोध ने दिखाया कि सामान्य स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा किया गया सरल दृश्य परीक्षण भी कैंसर से होने वाली मौतों को कम कर सकता है। यह मॉडल राजस्थान जैसे राज्यों के लिए महत्वपूर्ण है, जहां तंबाकू और गुटखा सेवन मुंह के कैंसर का बड़ा कारण बना हुआ है।

महिलाओं में बढ़ता स्तन और सर्वाइकल कैंसर संकट
भारत में महिलाओं के बीच स्तन कैंसर और सर्वाइकल कैंसर तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य चुनौती बन रहे हैं। बीमारी की देर से पहचान, जागरूकता की कमी और आर्थिक संसाधनों का अभाव निम्न एवं मध्यम आय वर्ग के देशों के लिए बड़ी समस्या है। राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2019-21) के अनुसार भारत में स्तन और सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग कराने वाली महिलाओं का अनुपात बेहद कम रहा। स्तन कैंसर स्क्रीनिंग कराने वाली महिलाओं का अनुपात 0.9 प्रतिशत और सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग कराने वाली महिलाओं का अनुपात 1.9 प्रतिशत था। वहीं सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए भारत में करीब 52.10 लाख एचपीवी टीके लगाए जा चुके हैं। वैश्विक स्तर पर एचपीवी टीकाकरण को वर्ष 2030 तक 90 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।

रोकथाम ही सबसे प्रभावी रणनीति
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट का शीर्षक ‘द फ्यूचर वी चूज टुगेदर’ यानी ‘वह भविष्य जो हम मिलकर चुनते हैं’ अपने आप में संदेश देता है कि कैंसर की चुनौती को केवल चिकित्सा से नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयासों से नियंत्रित किया जा सकता है। भारत के लिए सबसे पहली प्राथमिकता तंबाकू और गुटखा नियंत्रण कानूनों का सख्ती से पालन होना चाहिए। तंबाकू मुंह और गले के कैंसर का प्रमुख कारण है। वैश्विक स्तर पर तंबाकूनियंत्रण नीतियों के कारण 2010 के बाद से इसके सेवन में करीब 27 प्रतिशत की कमी आई है। इसके अलावा फेफड़े, प्रोस्टेट, स्तन और कोलोरेक्टल कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने और शुरुआती पहचान की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है। समय पर निदान होने पर इलाज अधिक प्रभावी और कम खर्चीला हो सकता है।

स्क्रीनिंग, टीकाकरण और संवेदनशील स्वास्थ्य व्यवस्था जरूरी
भारत में बेटियों के लिए एचपीवी टीकाकरण अभियान को स्कूलों और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से और तेज करने की आवश्यकता है। साथ ही, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और उप-केंद्रों पर सामान्य स्क्रीनिंग व्यवस्था मजबूत करनी होगी। कैंसर की शुरुआती जांच के लिए मोबाइल स्वास्थ्य वैन, जिनमें अल्ट्रासाउंड, मेमोग्राफी और अन्य जरूरी जांच सुविधाएं उपलब्ध हों, दूरदराज क्षेत्रों तक पहुंचाने की जरूरत है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के अंतर्गत कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और पैलिएटिव केयर की सुविधाओं का विस्तार भी जरूरी है, ताकि परिवार इलाज के खर्च के बोझ तले न दबें।

साझा प्रयासों से ही बदलेगा भविष्य
कैंसर की लड़ाई केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं है। मरीजों और परिवारों के प्रति संवेदनशीलता, भावनात्मक सहयोग और सामाजिक समर्थन भी उतना ही जरूरी है। तंबाकू नियंत्रण से लेकर टीकाकरण, स्क्रीनिंग और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं तक हर क्षेत्र में प्रमाण मौजूद हैं कि प्रगति संभव है। जरूरत केवल इस बात की है कि इन उपायों को भारत के हर गांव और कस्बे तक समय पर पहुंचाया जाए। कैंसर से लड़ाई में सबसे बड़ी चुनौती बीमारी नहीं, बल्कि वह असमानता है जो किसी व्यक्ति के इलाज और जीवन की संभावना को उसकी आर्थिक स्थिति और स्थान से तय करती है। यही असमानता दूर करना भविष्य की सबसे बड़ी स्वास्थ्य प्राथमिकता होनी चाहिए।

Updated on:
06 Aug 2026 06:34 pm
Published on:
06 Aug 2026 06:34 pm