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ट्रम्प की चीन यात्रा: ‘कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट’ की राजनीति

बीजिंग में भव्य स्वागत और साझेदारी की बातें भले ही सौहार्दपूर्ण दिखीं, लेकिन वास्तव में यह 'कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट' की राजनीति थी।
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May 21, 2026
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सुखवीर सिंह, (लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं)

जब अमरीका में चुनाव चल रहे थे, तब घरों में बच्चों तक के बीच यह चर्चा होती थी कि चुनाव कौन जीतेगा। दिलचस्प बात यह थी कि बच्चे अक्सर डॉनल्ड ट्रम्प को पसंद करते थे। उनका कहना होता था 'ट्रम्प मजेदार हैं और उनके बयान हंसाते हैं।' लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रम्प का रवैया काफी कठोर और आक्रामक नजर आने लगा। 'अमरीका फस्र्ट' नीति के तहत उन्होंने वैश्विक व्यापार पर भारी टैरिफ लगाए, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हुईं।


तनाव कम करने की कूटनीतिक कोशिश
दुनिया के बड़े हिस्से का व्यापार डॉलर आधारित होने के कारण कई देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अमरीका पर निर्भर हैं। ऐसे में ट्रम्प की नीतियां और उनका अप्रत्याशित व्यवहार दुनिया के लिए चिंता का कारण बना। हालांकि हाल की चीन यात्रा में ट्रम्प का रवैया पहले से अलग और अधिक संयमित दिखाई दिया। इससे यह संकेत मिला कि अमरीका अब चीन को वास्तविक वैश्विक शक्ति के रूप में स्वीकार करने लगा है। डॉनल्ड ट्रम्प की चीन यात्रा केवल एक सामान्य कूटनीतिक दौरा नहीं थी, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव को नियंत्रित करना था। बीजिंग में भव्य स्वागत और साझेदारी की बातें भले ही सौहार्दपूर्ण दिखीं, लेकिन वास्तव में यह 'कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट' की राजनीति थी। अमरीका जानता है कि चीन को पूरी तरह रोकना संभव नहीं, जबकि चीन भी अमरीकी सैन्य और आर्थिक शक्ति को सीधे चुनौती देने से बचना चाहता है। इसलिए दोनों देशों के संबंध अब संतुलन और सावधानी पर आधारित हैं, जैसा शीत युद्ध के दौरान अमरीका और सोवियत संघ के बीच देखा गया था। ट्रम्प की इस यात्रा में व्यापार, टैरिफ, एआइ तकनीक, ताइवान और ईरान जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई, लेकिन कोई बड़ा समझौता सामने नहीं आया। यात्रा में ठोस नीतिगत उपलब्धियां सीमित रहीं। ताइवान के सवालों पर भी ट्रम्प ने बेहद संयमित रुख अपनाया। चीन का बढ़ता प्रभाव अमरीका के व्यवहार में बदलाव ला रहा है। अमरीका अब संरक्षणवाद की नीति अपना रहा है।

अवसर और चुनौती के बीच भारत की रणनीति
ट्रम्प प्रशासन ने चीन पर टैरिफ बढ़ाए, एआइ चिप्स और सेमीकंडक्टर तकनीक पर नियंत्रण लगाए तथा सप्लाई चेन को चीन से बाहर ले जाने की कोशिश की, लेकिन वह चीन की बढ़ती ताकत को पूरी तरह रोक नहीं सका। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है, क्योंकि अमरीका स्वीकार करने लगा है कि वह अकेली वैश्विक महाशक्ति नहीं रह गया है। यूरोप इस स्थिति को चिंता के साथ देख रहा है। उसे डर है कि कहीं अमरीका और चीन अपने हितों के अनुसार ऐसे समझौते न कर लें जिनमें यूरोप की भूमिका सीमित हो जाए। इसी कारण फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों ने चीन के साथ संवाद बढ़ाया है। हालांकि यूरोप चीन की आर्थिक पकड़ और 'रेयर अर्थ' संसाधनों पर उसके नियंत्रण को लेकर भी सतर्क है।
दुनिया अब ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां व्यावहारिक संतुलन और रणनीतिक हित अधिक महत्त्वपूर्ण बनते जा रहे हैं। चीन खुद को 'स्थिरता' और 'बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था' के समर्थक के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। भारत के लिए यह स्थिति अवसर और चुनौती दोनों है। अमरीका एशिया में चीन के संतुलन के रूप में भारत को महत्त्व दे रहा है, इसलिए रक्षा सहयोग, सेमीकंडक्टर निवेश, क्वाड और इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। हालांकि भारत और अमरीका के हित पूरी तरह समान नहीं हैं। अमरीका जहां वैश्विक नेतृत्व बनाए रखना चाहता है, वहीं भारत का लक्ष्य विकास, तकनीकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता है। भारत को समझना होगा कि चीन केवल वैश्विक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि उसकी भौगोलिक वास्तविकता भी है।

ट्रम्प की चीन यात्रा संकेत कि 21वीं सदी में वैश्वीकरण संघर्षों को समाप्त नहीं करता, बल्कि उन्हें और जटिल बनाता है। अमरीका और चीन प्रतिद्वंद्वी होने के बावजूद पूरी तरह अलग नहीं हो सकते। आज की विश्व राजनीति का सबसे बड़ा सच बिना विश्वास के सहअस्तित्व बन चुका है। भारत यदि इस बदलती विश्व व्यवस्था को सही ढंग से समझे, तो वह भविष्य के वैश्विकसंतुलन का महत्त्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।

Updated on:
21 May 2026 04:50 pm
Published on:
21 May 2026 04:50 pm