व्यापक प्रश्न यह है कि भविष्य में यूएस टैरिफ नीति कैसे सामने आएगी। आइईईपीए के अलावा, कई संघीय कानून प्रशासन को राष्ट्रीय हित में व्यापार-प्रतिबंधात्मक उपाय करने का अधिकार देते हैं।
अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम (आइईईपीए) के तहत लगाए गए व्यापक वैश्विक शुल्कों को रद्द कर उन्हें शुरुआत से ही अवैध (एब इनिशियो) घोषित किया है। इस ऐतिहासिक निर्णय के कारण अमरीकी सरकार को अनुमानित 160 बिलियन डॉलर से 175 बिलियन डॉलर का राजस्व वापस करना पड़ सकता है। वाइट हाउस ने 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 का उपयोग करते हुए एक नया वैश्विक आयात शुल्क घोषित करके तेजी से बदलाव किया। अब सामने व्यापक प्रश्न यह है कि भविष्य में यूएस टैरिफ नीति कैसे सामने आएगी। आइईईपीए के अलावा, कई संघीय कानून प्रशासन को राष्ट्रीय हित में व्यापार-प्रतिबंधात्मक उपाय करने का अधिकार देते हैं।
1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122: 'मौलिक अंतरराष्ट्रीय भुगतान समस्याओं' को दूर करने के लिए अधिकतम 150 दिनों की अवधि के लिए 15 प्रतिशत तक अस्थायी आयात अधिभार (या कोटा) लगाने का अधिकार देती है। इन शुल्कों को भुगतान संतुलन घाटे के राष्ट्रपति के निर्धारण के आधार पर सीधे कार्यकारी आदेश द्वारा लगाया जा सकता है, जिसके लिए किसी औपचारिक पूर्व जांच की आवश्यकता नहीं होती है; प्रशासन ने पहले ही 10 प्रतिशत अधिभार के लिए इसका उपयोग किया है।
1962 के व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232: राष्ट्रपति को उन वस्तुओं पर असीमित टैरिफ लगाने की अनुमति देती है जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना गया है। ये शुल्क केवल कार्यकारी आदेश द्वारा नहीं लगाए जा सकते और इसके लिए वाणिज्य विभाग द्वारा संचालित एक औपचारिक राष्ट्रीय सुरक्षा जांच की आवश्यकता होती है।
1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301: यदि किसी विदेशी देश का व्यवहार 'अनुचित है और अमरीका के वाणिज्य पर बोझ डालता है या उसे प्रतिबंधित करता है,' तो यूएस व्यापार प्रतिनिधि को टैरिफ लगाने का अधिकार देती है। इन शुल्कों के लिए अनुचित या भेदभावपूर्ण व्यापार प्रथाओं की औपचारिक जांच की आवश्यकता होती है और इन्हें केवल कार्यकारी आदेश द्वारा नहीं लगाया जा सकता है; ऐतिहासिक रूप से, इन्हें चीन और कोरिया के खिलाफ सफलतापूर्वक लागू किया गया है।
1930 के टैरिफ अधिनियम की धारा 338: उन देशों से आयात पर टैरिफ लगाने का अधिकार देती है जो यूएस वाणिज्य के साथ भेदभाव करते हैं। इसके लिए भेदभाव के औपचारिक राष्ट्रपति निर्धारण और लंबी प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं की जरूरत होती है, जिससे यह कार्यकारी आदेश से तत्काल लागू करने के लिए अनुपयुक्त हो जाता है।
1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 201 (सेफगार्ड): आयात में वृद्धि से घायल घरेलू उद्योगों को राहत के लिए याचिका दायर करने की अनुमति देती है। इन शुल्कों के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग (आईटीसी) द्वारा यह निर्धारित करने के लिए एक व्यापक जांच की आवश्यकता होती है कि क्या आयात गंभीर चोट का एक 'महत्वपूर्ण कारण' है और इन्हें केवल कार्यकारी आदेश द्वारा नहीं लगाया जा सकता है।
आइईईपीए के विपरीत, ये तंत्र प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को शामिल करते हैं, जिसमें जांच प्रक्रियाएं और कांग्रेस की भागीदारी शामिल है। परिणामस्वरूप, इन प्रावधानों के तहत अपनाए गए टैरिफ उपाय हितधारकों को समायोजन का अवसर देते हैं। रातों-रात आइईईपीए टैरिफ के खतरे के कम होने के साथ, व्यापारिक भागीदार दबाव में झुकने के प्रति कम इच्छुक हो सकते हैं, जिससे देशों को मुख्य नीतिगत हितों से समझौता किए बिना उत्पाद-विशिष्ट रियायतों पर बातचीत के लिए अधिक स्थान मिल सकता है।
टैरिफ परिदृश्य में बदलावों से संकेत मिलता है कि भारत अब द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) के लिए फिर से बातचीत करने और पुनर्गठित करने के लिए मजबूत स्थिति में है। बातचीत के संभावित बिंदु भारतीय निर्यात के लिए धारा 301 के तहत जांच से बचने और धारा 232 के तहत उत्पादों के निर्यात के लिए कोटा निर्धारित करने पर हो सकते हैं।
जबकि आईईईपीए टैरिफ की मूल वैधता अब तय हो गई है, निषेधाज्ञा की प्रक्रियात्मक स्थिति जटिल बनी हुई है। 20 फरवरी, 2026 को राष्ट्रपति ने 'कुछ टैरिफ कार्रवाइयों को समाप्त करने' का कार्यकारी आदेश जारी किया, जो औपचारिक रूप से अमान्य शुल्कों को रद्द करता है और निर्देश देता है कि संग्रह 'जितनी जल्दी हो सके' बंद हो जाए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने धनवापसी के लिए एक विशिष्ट तंत्र स्थापित नहीं किया, जिससे इसके पीछे एक बड़ी वित्तीय और रसद चुनौती रह गई है।