पूरे विश्व में सिख परंपरा को मानने वाले श्रद्धालु प्रत्येक वर्ष 13 या 14 अप्रेल को वैसाखी का पर्व उत्साह से मनाते हैं जिस दिन खालसा पंथ का आज से 327 वर्ष पूर्व सृजन हुआ था।
जसबीर सिंह, पूर्व अध्यक्ष राजस्थान अल्प संख्यक आयोग
पूरे विश्व में सिख परंपरा को मानने वाले श्रद्धालु प्रत्येक वर्ष 13 या 14 अप्रेल को वैसाखी का पर्व उत्साह से मनाते हैं जिस दिन खालसा पंथ का आज से 327 वर्ष पूर्व सृजन हुआ था। 1756 विक्रम संवत के पहले वैशाख 29 मार्च, 1699 सी.ई. पंजाब के आनन्दपुर साहिब में एक भव्य, पवित्र व शौर्य के वातावरण में खालसा पंथ का सृजन साहिबे कमाल, सर्वशंदानी गुरू गोबिन्द सिंह जी द्वारा किया गया था।
गुरू गोबिन्द सिंह जी ने वैसाखी के दिन संत सिपाही के रूप में ‘‘खालसा का सृजन कर भारतीय चिंतन और युद्ध कौशल में अपूर्व योगदान दिया और भारत में पुनः पुरजोर तरीके से भक्ति और शक्ति का, शास्त्र और शस्त्र का तथा पीरी और मीरी का अद्भुत मेल प्रस्तुत किया। दस सिक्ख गुरुओं ने भारतीय जनता में ‘खालसा’ सृजन करने में लगभग 250 वर्षों का समय लिया और गुरू नानक (जन्म 1469) से लेकर वैसाखी 1699 गुरु गोबिन्द सिंह जी तक पूरे भारतीय जनमानस का मंथन कर शताब्दियों से अलग चली आ रही भक्ति और शक्ति की महान् भारतीय परंपरा को एक दूसरे के साथ संलग्न कर इसे संत सिपाही के रूप में खालसा की अवधारणा देकर और संपुष्ट किया। इस प्रकार समयानुसार भारतीय जनता के युग की गति को देखते हुए 1699 की वैसाखी पर गुरू गोबिन्द सिंह जी ने एक हाथ में माला और दूसरे हाथ में तलवार लेकर चलने वाले खालसा पंथ का निर्माण किया।
गुरू गोबिन्द सिंह जी ने 1699 की वैसाखी पर खालसा का सृजन कर समाज के पतितों और दलितों को ऊपर उठाया, अनाथों को सहारा दिया व उनमें अपार प्राण शक्ति, आत्मविश्वास व आत्मसम्मान संचारित किया। अत्याचार और अनाचार को भाग्य का दोष कहकर स्वीकार करने वाले लोगों में से उन्होंने महान शूरवीर पैदा कर दिए। मृत्यु के भय को मानो उन्होंने मंत्र के बल से उड़ा दिया। सिर हथेली पर रखकर उनके सिंहों ने अन्याय व जबरन धर्मान्तरण को ललकारा व देश में नई इतिहास गाथा रच डाली। दुर्बल को बल, हताश को आशा तथा भयग्रस्त को अभय मंत्र देने का पावन कार्य 1699 की वैसाखी पर किया गया।
गुरु गोबिन्द सिंह जी ने 1699 की बैसाखी के दिन एक बर्तन (बाटे) में लाहौर निवासी दयाराम ‘खत्री’, हस्तिनापुर निवासी धर्मदास ‘जाट’, द्वारिका निवासी मुहकमचंद ‘छीपा’, बीदर ‘कर्नाटक’ निवासी साहबचन्द ‘नाई’ और जगन्नाथपुरी निवासी हिम्मत राय ‘कहार’ को अमृतपान कराकर जातिवाद के खंडहर को ध्वस्त कर इनको क्रमशः दयासिंह, धर्मसिंह, मोहकम सिंह, साहिब सिंह और हिम्मत सिंह बनाकर इन्हें पंज प्यारे संज्ञा से आभूषित कर दिया और खालसा पंथ की स्थापना कर डाली। अब खालसा की लड़ाई और विजय व्यक्तिगत न होकर सामूहिक हो गई और इस सामूहिकता को भी प्रभु ‘वाहेगुरू’ की जीत माना जाने लगा। खालसा वाहेगुरू अर्थात् ‘परमात्मा’ के कार्य को आगे बढ़ाने वाला और चक्रचिन्हों के भेदभाव से दूर ईश्वर की फतह के लिये कार्य करने वाला। बोले सो निहाल सतश्री अकाल जयघोष बन गया। गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा 1699 की बैसाखी के पहले ही दिन बीस हजार चिड़िया बाज बन गई और हजारों गीदड़ बने शेरों ने फिर गर्जन प्रारम्भ कर दिया। इसलिए गुरु गोबिन्द सिंह जी ने वैसाखी पर उद्घोष कर डाला
‘चिड़िया ते मैं बाज तुड़ाऊं, गिदड़ों से मैं शेर बनाऊं
सवा लाख से एक लड़ाऊं, तभै गोबिन्द सिंह नाम कहाऊं।’
उन्होंने वैसाखी पर संगठन शक्ति को अपराजेय करने के लिए ऊंच नीच व छुआछूत के भेद को समाप्त किया तथा स्वाभिमान युक्त विजयशील होने वाली संगठित कार्यशक्ति को खड़ा कर डाला। इसके लिए उन्होंने क्रान्तिकारी घोषणा कर डाली। ‘जिनकी जात और कुल मांही, सरदारी नंहि भई कदांही
उनंही को सरदार बणावों, तबै गोबिन्द सिंह नाम सदावों।’
वैसाखी पर उन्होंने तथाकथित निम्न जातियों के लोगों को ऐसी अभूतपूर्व गुणगरिमा देकर व नेतृत्वकर्ता बनाकर देश के इतिहास में अनोखा कार्य कर डाला। एक सिख से यह अपेक्षा की जाती है कि वो पांच क के नियमों का पालन करते हुए तम्बाकू, शराब व नशे का सेवन नहीं करेगा तथा हर स्त्री को, चाहे वह शत्रु की भी हो, उसकी रक्षा करेगा। गुरुजी ने कमजोर, दीन व हीन की रक्षा करने का संकल्प प्रत्येक सिख को दिया व कहा ‘‘सूरा सो पहिचानिये जो लरै दीन के हेत, पुरजा पुरजा कट मरे कबहूं न छाडे खेत’’ अर्थात् ‘‘शूरवीर उसे समझिए, जो कमजोर, निर्धन व हीन की रक्षा करता है तथा युद्ध के मैदान में हारने के बजाय वीरगति को प्राप्त होता है। 1699 में खालसा पंथ का सृजन 15वीं शताब्दी में गुरु नानक देव जी द्वारा व्यक्त की गई परिकल्पना की ही परिणति थी। मुगलों के आगमन के बाद ही भारतीयों को डराने, दबाने व अत्याचार का जो वातावरण बना उस पर गुरू नानक देव जी ने जनता की पीड़ा को अपनी वाणी में कहा ‘‘खुरासान खसमाना किया हिन्दुस्तान डराया, आपे दौस न देई करता जम कर मुगल चढ़ाइया ऐती मार पई कुरलाणे तै की दरद न आइआ’’। अर्थात् ‘‘खुरासान से आने वाले आक्रान्ताओं ने देश के लोगों में भय व अत्याचार का ऐसा माहौल बना रखा है और हे परमात्मा आपको जनता की इस पीड़ा का क्या कोई अहसास नहीं हो रहा’। गुरु नानक देव जी के बाद सिक्ख परंपरा के पांचवे गुरु अर्जुन देव जी व छठे गुरू हरगोबिन्द जी पर भी हुकुमत द्वारा अत्याचार व पीड़ा देने का क्रम जारी रहा। औरंगजेब के शासन काल में तो इस जुल्मो सितम और अत्याचार की पराकाष्ठा हो गई। नौंवे गुरु हिंद की चादर गुरु तेग बहादुर जी को चांदनी चौक में बादशाह के आदेश से 1675 में कश्मीर से आए ब्राह्मण भाई मतिदास जी, भाई सतीदास जी व भाई दयाला जी के साथ बर्बरता पूर्ण ढंग से शहीद कर दिया गया। पूरे देश को राज्य नीति के अन्तर्गत इस्लामी राज्य बना दिया गया। नवरोज, संगीत और नृत्य पर पाबंदिया लगा दी गई। ‘झरोखा दर्शन को व्यक्ति पूजा मानकर प्रतिबंधित कर दिया गया। बहुसंख्यक समाज के साथ राजकीय सेवाओं, निर्माण व अन्य कार्यों में भेदभाव किया जाने लगा। इस्लाम में धर्मान्तरण को बढ़ावा व संरक्षण दिया जाने लगा। बहुसंख्यक समाज द्वारा हाथी घोड़े पालकी की सवारी व हथियार रखने पर मार्च 1695 में राजकीय आदेश द्वारा रोक लगा दी गई। हुकुमत शियाओं, सूफी संतों व उदार मुस्लिमों के प्रति भी द्वेषपूर्ण इरादे रखने लगी। 1661 में मंसूर ए सानी सूफी मोहम्मद सरमद का सूफी सिद्धान्तों में विश्वास रखने के कारण कत्ल कर दिया गया। 1699 में जारी राज्य आदेश से मोहर्रम को मनाने पर भी पाबंदी लगा दी गई। कुल मिलाकर देश में बहुत ही डरावना व दमघोटू वातावरण निर्मित हो गया था। ऐसी विषम परिस्थितियों में गुरु गोबिन्द सिंह जी ने विक्रम संवत् 1756 के पहले वैशाख (29 मार्च 1699) को खालसा पंथ के सृजन की योजना बनाई। उन्होंने अपने अनुयायियों व आम जन को अपने पिता गुरू तेग बहादुर जी द्वारा स्थापित आनन्दपुर साहिब में वैसाखी पर्व को जोशो खरोश से मनाने के लिये आने का आमंत्रण भेजा। गुरुजी के आह्वान का जादुई असर हुआ। संचार व सूचना भेजने के सीमित साधन होने के बावजूद देश के दूर दराज के कोने-कोने से लगभग 80000 लोगों का जन समूह वहां एकत्रित हो गया। देश के पूर्व में स्थित जगनाथपुरी, दक्षिण के बीदर, उत्तर के लाहौर व दिल्ली तथा पश्चिम के द्वारका तक के लोग आनन्दपुर पहुंचे। गुरूजी ने उस दिन अमृत वेले में जगकर पाठ, जप व तप किया व उसके बाद संगत के दीवान में प्रस्तुत हुए। पूरा वातावरण ‘‘बोले सो निहाल सत श्री अकाल’’ के घोषों के साथ गूंज उठा। भाई मणी सिंह जी ने आदिग्रन्थ में से शबद वाणी पढ़कर उसकी व्याख्या की। तत्पश्चात् गुरुजी ने अपने कमरबंद में बंधी म्यान में से तलवार (कृपाण) को निकालकर हवा में लहराते हुए जनसमूह को कहा कि ‘‘क्या कोई है जो अपने गुरू व धर्म की रक्षा के लिए अपनी जान देने का तैयार हो’। पूरे जनसमूह में सन्नाटा छा गया। कोई भी गुरुजी की बात को समझ नहीं पाया। उन्होंने दूसरी बार ललकारपूर्ण आवाज में उसी आह्वान को फिर दोहराया। अब सन्नाटा भय में बदल चुका था। गुरुजी ने तीसरी बार उसी जोश के साथ फिर ललकार पूर्ण आह्वान किया। तब दया राम नाम का खत्री (खाती) खड़ा हुआ व विनम्रता से बोला ‘गुरुदेव मेरा शीश आपके सम्मुख हाजिर है। आपकी कृपाण से मेरी मृत्यु हो यह मेरा सौभाग्य होगा।’ गुरु जी दयाराम को पीछे शामियाने में ले गए। कुछ ही पलों बाद खून से सनी तलवार लेकर बाहर आए और उसे लहराते हुए बोले कि ‘एक सिर की और जरूरत है।’ कुछ लोग भयभीत होकर जाने लगे। तभी दिल्ली से आए धर्म दास जो जाट समुदाय से थे उठे और कुर्बानी के लिए अपने आप को प्रस्तुत किया। गुरुजी उन्हें भी पीछे शामियाने में ले गए। फिर खून से सनी तलवार लेकर बाहर आए। इस तरह गुरू जी ने तीन बार और तलवार लहराई। गुजरात के द्वारका से मोखम चन्द ‘छीबा’, उड़ीसा के जगन्नाथपुरी से हिम्मत ‘झींवर’ तथा दक्षिण के बीदर से साहिब चन्द ‘सैन’ उत्साहपूर्वक खड़े हुए और अपने शीश प्रस्तुत किये। गुरूजी इन तीनों को भी पीछे शामियाने में ले गये। कुछ समय बाद गुरूजी इन पांचों को वापिस नये केसरिया वस्त्रों, पूरी साजसज्जा पगड़ी, दस्तार के साथ जनसमूह के समक्ष लाए । इन पांचों सिखों को जिंदा सामने देख जनता में हर्ष की लहर दौड़ गई। गुरुजी ने लोहे के बर्तन में जल लेकर उनकी पत्नी जीतो जी द्वारा लाये मीठे पतासों को जल में डालकर खंडे (दो धारी खंजर) से हिलाया व इन पांच सिखों को छकाया व इनका नया नामकरण किया। गुरुजी ने बुलन्द आवाज में कहा कि गुरू की भेंट पूरी हो चुकी। अमृत छककर यह सिख सिंह बन गए हैं। यह मेरे पंज प्यारे हैं। अब इनकी आज्ञा मेरी इच्छा होगी। गुरुजी ने सिखों (अब सिंहों) को विशिष्ट पहचान देने के लिए 5-क-कड़ा, केश, कृपाण, कंघा व कच्छ को धारण करने के नियम बनाए। उन्हें मर्यादा, संयम, स्वच्छता, अनुशासन व भाईचारे, ऊंच नीच के भेद को मिटाकर जातियों से ऊपर उठकर रहने की शिक्षा दी। यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि 1699 की वैसाखी पर खालसा पंथ की सृजना देश के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने भारत के इतिहास की धारा को मोड़ दिया। इस देश की जिस सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व आध्यात्मिक एकता को रेखांकित व सशक्त करने का कार्य गुरुनानक देव जी द्वारा प्रारम्भ किया गया था उसकी सम्पूर्णता व परिणीति 1699 में वैसाखी के अवसर पर खालसापंथ के सृजन के साथ हुई। किंतु यह स्मरण रखना चाहिए कि उनका संघर्ष किसी धर्म व मजहब के खिलाफ ना होकर अत्याचार तथा जबरन धर्मान्तरण के विरूद्ध था। गुरु ग्रन्थ साहिब में 6 सिख गुरूओं के साथ-साथ देश के उस समय तक के 30 अन्य महान् संतों यथा कबीर, धन्ना, पीपा, मीरा के गुरू रैदास , त्रिलोचन, नामदेव, फरीद आदि देश की विभिन्न जातियों, क्षेत्रों, परम्पराओं व सम्प्रदायों के महापुरूषों की वाणी शामिल है। हम सभी को यह सदैव याद रखना चाहिए कि सिख गुरूओं ने विभिन्न जातियों, पंथों, क्षेत्रों के भारत को सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और धार्मिक स्तर पर एक सूत्र में पिरोने का अद्भुत कार्य किया था। गुरु गोबिन्द सिंह जी ने जिन पांच प्यारों को अमृत छकाकर खालसा पंथ का सृजन किया वो देश के विभिन्न क्षेत्रों व दिशाओं से यथा लाहौर, बीदर, द्वारका, जगन्नाथपुरी व हस्तिनापुर (वर्तमान दिल्ली) के रहने वाले थे। गुरु गोबिन्द सिंह जी का प्रकाश (जन्म) पटना साहिब (बिहार) में हुआ, उन्होंने खालसा पंथ का सृजन आनन्दपुर साहिब (पंजाब) में किया, महान कवि दरबार पांवटा साहिब यमुना नगर (हरियाणा) में लगाते थे तथा वह परमज्योति में विलीन नांदेड़ (महाराष्ट्र) में हुए। सिख गुरुओं ने अपने प्राणों सहित अपना सब कुछ इस महान राष्ट्र और धर्म के लिए बलिदान कर दिया। गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा वैसाखी पर सृजित सिख राष्ट्र व धर्म की रक्षा के लिए सदैव आगे रहे हैं। उनका योगदान देश की आजादी की लड़़ाई से लेकर वर्तमान राष्ट्र निर्माण के कार्यों में भी वंदनीय है।