
विनय कौड़ा, (अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार)
अमरीका और ईरान के बीच प्रस्तावित 60 दिवसीय शांति वार्ता की रूपरेखा पहली नजर में आश्वस्त करती है, किंतु उसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि युद्ध ने ईरान की आंतरिक सत्ता-संरचना को किस सीमा तक बदल दिया है। जब तक इस परिवर्तन को नहीं समझा जाएगा, किसी भी शांति-संधि की स्थिरता संदेह के घेरे में रहेगी। इतिहास का एक कठोर नियम है। बाहरी आक्रमण प्राय: उन सत्ताओं को नहीं गिराता जिनके विरुद्ध युद्ध छेड़ा जाता है। वह उनके भीतर छिपी सबसे कठोर शक्तियों को जन्म देता है। तलवार जब किसी राष्ट्र की सीमाओं पर नहीं, उसके आत्मसम्मान पर चलती है, तब लोकतंत्र की धीमी आवाजें अक्सर तोपों की गर्जना में दब जाती हैं। यही विडंबना आज ईरान के सामने खड़ी है।
अमरीका और इजराइल ने जिस युद्ध की कल्पना ईरान की सामरिक क्षमता को सीमित करने और उसकी राजनीतिक व्यवस्था बदलने के लिए की थी, उसका सबसे बड़ा परिणाम इसके ठीक विपरीत निकला है। युद्ध ने ईरान को अधिक उदार नहीं, बल्कि अधिक सैन्यीकृत बना दिया है। जिस इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्र्स (आइआरजीसी) को कभी सत्ता के अनेक स्तंभों में से एक माना जाता था, वह आज लगभग संपूर्ण शक्ति का केंद्र बनकर उभर चुका है। यह परिवर्तन केवल सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक भी है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संवाद होती है और युद्ध की सबसे बड़ी शक्ति आदेश। जब राष्ट्र युद्ध में उतरता है, तब संसदों की जगह सेनाध्यक्षों की आवाज बुलंद होने लगती है। ईरान में भी यही हुआ है। वास्तविक सत्ता अब युद्धकालीन आवश्यकता से जन्मी एक जटिल सैन्य-राजनीतिक नेटवर्क में स्थानांतरित हो चुकी है, जहां नागरिक संस्थाएं हाशिए पर आ चुकी हैं और आइआरजीसी का प्रभाव लगातार गहरा होता जा रहा है। निर्वाचित सरकार, सुधारवादी राजनीति और नागरिक संस्थाओं की जो थोड़ी-बहुत गुंजाइश बची थी, वह राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर प्रश्नों के समक्ष सिकुड़ती चली गई।
विदेश नीति से लेकर परमाणु वार्ताओं तक निर्णायक भूमिका आइआरजीसी के हाथों में सिमट रही है। यही शायद इस पूरे संघर्ष की सबसे बड़ी त्रासदी भी है। यदि उद्देश्य ईरान के सैन्य प्रभाव को कम करना था, तो परिणाम उसके विपरीत हैं। युद्ध ने आइआरजीसी को केवल हथियार नहीं दिए, उसने उसे वैधता भी दी। बाहरी खतरे ने आंतरिक असहमतियों को पीछे धकेल दिया। राष्ट्रवाद ने सुधारवाद को निगल लिया। यह इतिहास की वही पुरानी कहानी है जिसे वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान अनेक बार दोहरा चुके हैं। डॉनल्ड ट्रंप की विदेश नीति का मूल विश्वास यह रहा है कि अधिकतम दबाव अंतत: विरोधी को झुका देगा। किंतु अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल आर्थिक प्रतिबंधों और सैन्य शक्ति की गणित नहीं है। वह राजनीतिक मनोविज्ञान और राष्ट्रीय अस्मिता का भी विज्ञान है। जिस व्यवस्था को कमजोर करने के लिए युद्ध किया गया, वही व्यवस्था अब पहले से अधिक संगठित और अधिक केंद्रीकृत होकर सामने खड़ी है। इस जंग ने ईरान के भीतर शक्ति-संतुलन बदल दिया है।
पहले जहां निर्वाचित राष्ट्रपति, संसद और धार्मिक नेतृत्व के बीच किसी सीमा तक संतुलन बना रहता था, वहीं अब सैन्य प्रतिष्ठान निर्णायक शक्ति के रूप में उभर चुका है। आगामी दिनों में किसी भी परमाणु वार्ता में यदि आइआरजीसी सीधे नेतृत्वकारी भूमिका निभाती है, तो समझौतों की संभावना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन होगी। क्योंकि सैन्य संस्थाएं प्राय: समझौते को विजय की भाषा में देखती हैं, संवाद की भाषा में नहीं। सबसे चिंताजनक प्रश्न लोकतंत्र का है। यह सही है कि ईरान पूर्ण उदारवादी लोकतांत्रिक राष्ट्र कभी नहीं रहा, लेकिन उसके भीतर चुनाव, संसद, सार्वजनिक बहस और सुधारवादी राजनीति की सीमित परंपरा अवश्य मौजूद रही है। युद्धों का स्वभाव इन संस्थाओं को मजबूत करना नहीं, उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर पीछे धकेलना होता है। यदि नेतन्याहू अपनी खतरनाक नीतियों के अनुरूप शांति प्रक्रिया में लगातार बाधाएं उत्पन्न करते हैं, तो ऐसी स्थिति में संवाद और समझौते की संभावनाएं कमजोर पड़ेंगी जबकि ईरान में प्रतिशोध की राजनीति को बल मिलेगा।
यही प्रवृत्ति आगे बढ़ती है, तो ईरान का राजनीतिक भविष्य और अधिक सैन्य-प्रधान होगा। तब बंदूक केवल सीमा की रक्षा नहीं करेगी बल्कि राजनीति की दिशा भी तय करेगी। इतिहास में ऐसी भूलें नई नहीं हैं। 2003 में इराक पर आक्रमण का उद्देश्य लोकतंत्र स्थापित करना बताया गया था। परिणाम वर्षों की अराजकता और नए आतंकवादी संगठनों के रूप में सामने आया। अफगानिस्तान में दो दशक की लड़ाई के बाद वही ताकत फिर सत्ता में लौट आई जिसे हटाने के लिए युद्ध शुरू हुआ था। इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या ईरान के मामले में भी सैन्य समाधान ने राजनीतिक समस्या को और अधिक जटिल बना दिया है? किसी भी युद्ध की सबसे बड़ी त्रासदी केवल टूटे हुए भवन नहीं बल्कि खोखली हुई संस्थाएं होती हैं। भवन दोबारा बन सकते हैं, लेकिन संस्थाएं आसानी से नहीं बनती। इस युद्ध का अंतिम परिणाम यह हुआ कि ईरान में नागरिक राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का बचा-खुचा स्थान भी सिकुड़ गया तथा आइआरजीसी निर्विवाद शक्ति-केंद्र बन गया, तो यह केवल तेहरान की कहानी नहीं होगी। यह उन सभी महाशक्तियों के लिए चेतावनी होगी जो मानती हैं कि मिसाइलें राजनीति का विकल्प हो सकती हैं। यदि इस संघर्ष ने ईरान को और अधिक सैन्यीकृत बना दिया है, तो यह पूरी विश्व-राजनीति की नैतिक पराजय है जिसके लिए इतिहास ट्रंप और नेतन्याहू को कभी माफ नहीं करेगा।