
बच्चों का भविष्य गढऩे वाले स्कूल चाहे सरकारी हो या गैर सरकारी। सब जगह यही अपेक्षा की जाती है कि बच्चों से बर्ताव ऐसा न हो जो उन्हें मानसिक अथवा शारीरिक रूप से चोट पहुंचाने वाला हो। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि स्कूल जाने का वक्त ही ऐसा होता है जब बच्चे अपने अभिभावकों से दूर रहते हैं। अभिभावक बच्चों को संस्कारवान व गुणवान बनाने की उम्मीद में स्कूल भेजते हैं। लेकिन पिछले सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी दर्जनों घटनाएं हुई हैं, जिनसे अभिभावकों का यह भरोसा टूटता दिखता है।
हाल ही बेंगलूरु के एक निजी स्कूल में कक्षा से बाहर खड़े रहने की सजा मिलने से आहत तेरह वर्षीय छात्र ने खुदकुशी का प्रयास किया, वहीं राजस्थान के सरकारी स्कूल में किसी शिक्षक के पैसे गुम होने पर तलाशी के नाम पर छात्राओं के कपड़े उतरवा कर तलाशी लेने का शर्मनाक घटनाक्रम सामने आया है। ये दोनों ही घटनाएं न केवल अभिभावकों के भरोसे को तोडऩे वाली बल्कि बच्चों को प्रताडि़त करने वाली भी हैं। हैरत की बात यह है कि शिक्षा अधिकार कानून व बाल अधिकार संरक्षण आयोग की ओर से उठाए गए प्रतिबंधात्मक कदमों के बावजूद बच्चों को प्रताडि़त करने की घटनाएं थम नहीं रहीं। चोरी के मामले में सभी छात्राओं को शक की नजर से देखकर निर्लज्जतापूर्वक तलाशी लेने की बात सामने आने पर भले ही संबंधित शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई हो गई हो लेकिन उन बालिकाओं की मन:स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है जिन्हें कपड़े उतारने को मजबूर किया गया। चिंताजनक यह भी कि ऐसे कृत्य में सहभागी शिक्षक भी खुद महिला थीं। अभिभावकों, शिक्षकों और समूचे समाज के सम्मुख भी यह चुनौतीपूर्ण सवाल जरूर है कि आखिर बच्चे खुदकुशी करने या इसका प्रयास जैसे कदम उठाने को क्यों मजबूर होने लगे हैं। पढ़ाई के दबाव पर स्कूल में मिलने वाला प्रतिकूल माहौल तो अपनी जगह है ही, सहनशीलता की कमी भी इसकी वजह है। बात-बात में बच्चों के मन में दुनिया छोड़ देने जैसे विचार उठने लगे हैं।
चिंता इस बात पर भी करनी होगी कि शिक्षक के रूप में ऐसे लोग शिक्षा के मंदिरों में क्यों पहुंच रहे हैं जो बच्चों को सजा देने में हैवानियत और नैतिकता की हदें पार कर देते हैं। देश के किसी न किसी हिस्से से ऐसी खबरें जब सामने आती हैं तो सवाल भी उठता है कि क्या शिक्षकों की भर्ती के दौरान भर्ती परीक्षा व साक्षात्कार के साथ-साथ यह नहीं देखा जाना चाहिए कि शिक्षक की मानसिकता हिंसक तो नहीं है। हैवान बने ऐसे शिक्षक समूची शिक्षक बिरादरी को बदनाम करते हैं। ऐसे शिक्षकों की कमी नहीं जो देश की भावी पीढ़ी को गढऩे का काम मनोयोग से करते हैं। लेकिन बात-बात में गुस्सा हो जाने वाले और बाल मनोविज्ञान से बेपरवाह होकर बर्ताव करने वालों की तो शिक्षा के मंंदिरों में जगह नहीं होनी चाहिए।