पाली

राजस्थान में अनोखा विदाई समारोह: शिक्षक ने 12वीं कक्षा तक के सभी छात्रों को दी पार्टी, हर कोई हुआ भावुक

शिक्षा और शिक्षक के रिश्ते की एक ऐसी भावुक कहानी राजस्थान के पाली जिले से सामने आई है, जिसने गुरु-शिष्य परंपरा की आधुनिक मिसाल पेश की है। अक्सर विदाई के वक्त छात्र अपने शिक्षक को पार्टी देते हैं, लेकिन यहाँ गुरु ने अपने शिष्यों के प्रति प्रेम दिखाते हुए पूरे स्कूल के लिए दावत का आयोजन किया।

3 min read
Feb 10, 2026

राजस्थान की माटी में गुरु-शिष्य के आदर और स्नेह की जड़ें बहुत गहरी हैं। इसका जीवंत उदाहरण पाली जिले के बासना गांव में देखने को मिला। यहाँ राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में इतिहास के वरिष्ठ अध्यापक भेराराम प्रजापत ने अपने सेवानिवृत्ति (Retirement) के जश्न को किसी होटल या भव्य समारोह के बजाय अपने 300 विद्यार्थियों के बीच मनाना पसंद किया। विदाई के इस मौके पर स्कूल परिसर में हलवाई बैठाए गए और पारंपरिक राजस्थानी भोजन की खुशबू से पूरा स्कूल महक उठा।

ये भी पढ़ें

अब ‘क्रिश्चियन’ गंज नहीं… ‘कृष्ण’ गंज कहिए, राजस्थान में क्यों बदल दिया गया इस महत्वपूर्ण इलाके का नाम?

10 साल का रिश्ता, विदाई का अनोखा अंदाज

टीचर भेराराम प्रजापत पिछले एक दशक से इसी विद्यालय में इतिहास पढ़ा रहे हैं। उनका रिटायरमेंट 31 मई 2026 को निर्धारित है, लेकिन उन्होंने अपनी पार्टी 9 फरवरी को ही दे दी। इसके पीछे की वजह भी उतनी ही भावनात्मक है।

उन्होंने बताया, "मई में छुट्टियां होने के कारण बच्चे स्कूल में नहीं रहेंगे। जिनके साथ मैंने पिछले 10 साल बिताए, जो मेरे परिवार का हिस्सा बन चुके हैं, उनके बिना मेरी रिटायरमेंट की खुशी अधूरी रहती।"

स्टूडेंट्स को अपने हाथों से परोसा भोजन

सोमवार को स्कूल का नजारा किसी उत्सव जैसा था। भेराराम जी ने स्कूल के पहली कक्षा से लेकर 12वीं तक के सभी 300 छात्र-छात्राओं के लिए विशेष रूप से दाल-बाटी-चूरमा तैयार करवाया।

खास बात यह रही कि वे केवल आयोजन करके नहीं रुके, बल्कि खुद अपने हाथों से बच्चों को भोजन परोसा। यह दृश्य देख हर कोई भावुक हो गया कि एक शिक्षक अपने अंतिम दिनों में भी शिष्यों की सेवा में लगा है।

स्टूडेंट्स को अपने हाथों से परोसा भोजन

'इतिहास' के पन्नों में दर्ज हुआ शिक्षक का ये समर्पण

भेराराम प्रजापत का शैक्षणिक करियर करीब 41 वर्षों का रहा है।

  • शुरुआत: उन्होंने 25 अक्टूबर 1985 को थर्ड ग्रेड टीचर के रूप में पहली जॉइनिंग बेड़ कलां (जैतारण) में की थी।
  • संघर्ष और प्रगति: नौकरी के दौरान ही उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी, बीए किया और 1994 में बीएड की डिग्री हासिल की।
  • बासना स्कूल का दौर: 23 मई 2016 से वे बासना स्कूल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जहाँ उन्होंने न केवल इतिहास पढ़ाया बल्कि बच्चों के दिलों में अपनी जगह बनाई।

पॉकेट मनी बचाकर दिया 'सरप्राइज'

जब गुरु ने इतना स्नेह दिखाया, तो शिष्य भी पीछे नहीं रहे। स्कूल के बच्चों ने अपनी पॉकेट मनी से पैसे जमा किए और अपने पसंदीदा शिक्षक को सम्मान के साथ माला और साफा पहनाया। छात्रों ने उन्हें विदाई उपहार के रूप में एक ट्रॉली बैग भेंट किया। छात्रों का यह निस्वार्थ प्रेम देखकर भेराराम जी की आंखें भर आईं। उन्होंने रुंधे हुए गले से बच्चों को गले लगाया और वादा किया कि भले ही वे सरकारी रिकॉर्ड में रिटायर हो रहे हैं, लेकिन बच्चों की पढ़ाई के लिए वे हमेशा उपलब्ध रहेंगे।

छात्रों ने विदाई उपहार के रूप में एक ट्रॉली बैग भेंट किया

गुरु-शिष्य परंपरा की नई मिसाल

आज के दौर में जहाँ शिक्षा को व्यवसाय के रूप में देखा जाता है, वहीं भेराराम प्रजापत जैसे शिक्षक यह याद दिलाते हैं कि एक शिक्षक का सबसे बड़ा पुरस्कार उसके छात्रों का प्रेम और सम्मान है। सोशल मीडिया पर इस घटना की तस्वीरें और वीडियो खूब शेयर किए जा रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि "इतिहास के टीचर ने खुद एक नया इतिहास रच दिया है।"

ये भी पढ़ें

दिग्गज उद्योगपति अनिल अग्रवाल के ‘मैसेज’ ने हिला डाला, जानें भरतपुर का क्यों दिया उदाहरण?

Updated on:
10 Feb 2026 02:56 pm
Published on:
10 Feb 2026 02:07 pm
Also Read
View All

अगली खबर