नादानी से बढ़ रहा धरती का बुखार
पाली. 12 हजार 387 वर्ग किमी में फैला पाली जिला। एक छोटा जिला, जिसकी सरहदों में बढ़ोतरी नहीं हो पाई। आबादी के लगातार बढ़ते बोझ और उसी के अनुपात में बढ़ रही वाहनों की तादाद ने इस जिले की धरती पर मानो बोझ सा बढ़ा दिया है। बोझ इन मायनों में कि आबादी के साथ वाहन तो बढ़ते गए, लेकिन इन वाहनों के साइलेंसर से निकलने वाले कार्बन और सीओ-2 को सोखने के लिए पेड़ घटते गए। बीते एक दशक में रही 11.90 प्रतिशत की वृद्धि दर को ही आधार मानें तो इस समय जिले की आबादी 22 लाख 80 हजार 44 लोगों के पार है। कहने को हम रंगाई-छपाई के कारखानों की वजह से देश के औद्योगिक मानचित्र में मिनी मैनचेस्टर का खिताब पा चुके हैं, लेकिन कारखानों की चिमनियों से निकलने वाले धुएं को सोखकर जीवनदायिनी प्राणवायु का संचार करने वाले पेड़ों को कहां बढ़ा पाए?
हमने अपनी सुविधा के लिए वाहनों की फौज तो घर के आंगन में खड़ी कर ली, लेकिन वाहनों से निकलने वाले जहरीले धुएं से आमजन के फेफड़ों को सुरक्षित बचाने की जद्दोजहद कहां कर पाए? जिस रफ्तार के साथ आबादी बढ़ रही हैं, उसी रफ्तार से हमारी शान-औ-शौकत भी, लेकिन इन सुविधाओं के साथ पर्यावरण को हो रहे नुकसान का आंकलन कर उसकी भरपाई कहां कर पाएं? कंकरीट का जंगल बसाने की ख्वाहिश में जितने पेड़ों की बलि दी गई, उसके अनुपात में पेड़ कहां लगा पाएं? वन विभाग और कुछेक सामाजिक संस्थाएं हर साल मानसून में पौधरोपण की रस्म अदायगी करती है, लेकिन पर्यावरण दिवस गुजरने के बाद रोपे गए पौधों का हश्र देखने की जहमत कोई नहीं उठाता। ऐसे में ये पौधे न सिर्फ तेज धूप की तपिश का शिकार होकर मर जाते हैं, बल्कि हमें उस कुदरती औषधि से भी विमुख कर देते हैं, जिसकी आज हमें सबसे ज्यादा जरूरत महसूस हो रही है।
शहरी इलाकों में तो हरियाली देखने को ही नहीं मिलती। विकास के नाम पर काटे जा रहे पेड़ों के बदले पेड़ लगाने की रवायत अब पुरानी हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में फिर भी हरियाली देखने को मिल जाती है, लेकिन वहां भी अब विकास के नशे में हरे-भरे पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलने लगी है। इस पर्यावरण दिवस संकल्प लें कि आज हम एक पौधा जरूर लगाएंगे, ताकि हमें तो नहीं लेकिन हमारी पीढिय़ों को तो इसका फायदा मिले।