पाली

यहां इलाज नहीं होने पर पीडि़त की कम उम्र में हो जाती है मौत, आयोग ने सरकार से मांगा जवाब

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Apr 09, 2019
Human Rights Commission asks government to respond
यहां इलाज नहीं होने पर पीडि़त की कम उम्र में हो जाती है मौत, आयोग ने सरकार से मांगा जवाब

- राज्य के कई बच्चों ने परिजनों के साथ मानवाधिकार आयोग अध्यक्ष के समक्ष रखी थी पीड़ा

पाली। मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (पेशीय दुर्विकास) एक ऐसी बीमारी है, जिसकी चपेट में आने वाला बच्चा सामान्य बच्चों की तरह अपना जीवन नहीं जी सकता। इस बीमारी में पीडि़त की मांशपेशियां कमजोर होकर सिकुडऩे लगती है और कुछ समय बाद टूटने लग जाती है। आखिरकार पीडि़त की कम उम्र में ही मौत हो जाती है।

राज्यभर में इस बीमारी से पीडि़त करीब दो लाख व पाली जिले में 20 हजार लोग है। सरकार ने इस गंभीर बीमारी के पीडि़त बच्चों को नए दिव्यांगजन व्यक्ति अधिकार अधिनियम में शामिल तो कर लिया, लेकिन बीमारों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा। तीन अप्रेल को राज्य के कई जिलों से इस बीमारी से पीडि़त बच्चे अपने परिजनों के साथ जयपुर पहुंचे। जहां उन्होंने अधिवक्ता व सामाजिक कार्यकर्ता वैभव भंडारी के नेतृत्व में राजस्थान राज्य मानव अधिकार आयोग अध्यक्ष प्रकाश टाटिया को परिवाद सौंपा। इस पर उन्होंने राज्य सरकार व स्वास्थ्य विभाग से जवाब तलब किया कि इस गंभीर बीमारी के निवारण के लिए सरकारी स्तर पर किया प्रयास किए जा रहे हैं।

इसके साथ ही उन्होंने जवाब मांगा कि इस बीमारी से पीडि़त मरीज के इलाज के लिए क्या व्यवस्था है। राज्य भर में इस बीमार से कितने लोग पीडि़त है, इसके आंकड़ों का संकलन किया जाता है या नहीं। वर्तमान में मस्कुलर डिस्ट्रॉफी बीमारी से क्षेत्रवार कितने मरीज पीडि़त है। इसकी तथ्यात्मक रिपोर्ट भी मांगी।

सरकार लाइलाज बीमारी को लेकर गंभीर नहीं
मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के इलाज को लेकर राज्य व केंद्र सरकार अभी तक गंभीर नहीं है। पीडि़त व्यक्ति खुद का काम तक नहीं कर सकता। सरकार की ओर से उन्हें उचित सहायता नहीं दी जाती। साथ ही इलाज नहीं होने से कम उम्र में मरने को मजबूर है। जबकि सरकार की जिम्मेदारी है कि वे नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाएं। कई अन्य देशों में इस बीमारी के इलाज को लेकर काम चल रहा है। - वैभव भंडारी, सामाजिक कार्यकर्ता

Published on:
09 Apr 2019 01:06 pm