
- चैनराज भाटी
यूं तो मारवाड़ की सांगरी प्रसिद्ध है, लेकिन यह सांगरी वह नहीं है, जो आप समझ रहे हैं। टोपी वाले महकमे में सांगरी का मतलब जेब गरम करने वाली मलाई से हैं। जब मलाई मिले तो किसे अच्छी नहीं लगती। हर ठिकानेदार को सांगरी पंसद है, लेकिन मेहंदी नगरी के ठिकाने वाले साहब को इसका कुछ ज्यादा ही शौक है। सीधे तो मलाई कैसे मांगे, फिर सांगरी का ही नाम लेकर बात कच्ची-पक्की कर लेते हैं। अब सांगरी लेने वालों पर बादल भी मंडराने लगे हैं। अब आप कहेंगे यह बादल क्या है, बादल का मतलब सांगरी लेने वालों को पकडऩे वाले। जब भी बादल उडऩा शुरू होते है तो उससे पहले खबर चल जाती है कि आज बादल मंडरा रहे हैं, सामान अंदर रख देना। सभी सावधान भी हो जाते हैं। अब सांगरी पर बादल कब बरसेंगे, यह तो समय ही बताएगा।
आचार संहिता लगी, आफत मिटी
आचार संहिता क्या लगी, सभी ठिकाने के कुर्सी मालिकों की सांस में सांस आ गई। आए भी क्यों नहीं, कुर्सी छिन जाने की आफत जो थी। सभी को कुर्सी की चिंता थी, बचेगी या जाएगी। इस बीच आचार संहिता लग गई तो चिंता दूर हो गई। अब दो-तीन माह की तो गई, कोई नहीं हिला सकता। तीन महीने बाद देखेंगे तब तक तो आनंद लो। सबसे बड़ी चिंता तो शहर के सबसे बड़े ठिकाने के साहब को थी, खैर जिसकी कुर्सी बची, उन सबको बधाई। लेकिन एक बात है, टाइगर की नजर में कई जने चढ़े हुए हैं। नहीं संभले तो कुछ भी हो सकता है।
बीमारी तो बहाना है
टोपी वाले महकमे की बातें ही कुछ और है। हर माह के पांच से दस की तिथि के बीच ठिकानेदारों का कोई न कोई बीमार हो ही जाता है, उन्हें संभालने जाना सबके लिए जरूरी हो जाता है। अब कैसे बताए कि बीमारी तो बहाना है, मलाई रखने जाना है। मलाई तो साथ कैसे रखे। कई साहब लोग तो पास की सूर्यनगरी में ही रहते है। रात को गए और सुबह आ जाते हैं, मलाई भी रख आते हैं और बीमारी-सीमारी भी देख आते हैं। टाइगर साहब भी यह चक्कर समझ नहीं पा रहे हैं। समझ में किसी के आएगा भी नहीं, यह चक्कर है ही ऐसा ही है। लेकिन अब कोई पांच से दस के बीच गया तो नजरें जरूर टेढ़ी होगी।