पाली

हजारों किमी की यात्रा कर राजस्थान के इस गांव में ‘पावणा’ का डेरा

-पाली शहर के निकटवर्ती गिरादड़ा के तालाब पर पेलिकन का डेरा
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Feb 05, 2019
हजारों किमी की यात्रा कर राजस्थान के इस गांव में ‘पावणा’ का डेरा
हजारों किमी की यात्रा कर राजस्थान के इस गांव में ‘पावणा’ का डेरा

दिनेश शर्मा

गिरादड़ा (पाली)। पिछले कुछ समय से विदेशी ‘पावणा’ को मारवाड़-गोडवाड़ की आबोहवा कुछ ज्यादा ही रास आने लगी है। पाली जिले के जवाईबांध का क्षेत्र, पाली का लाखोटिया तालाब हो या फिर रोहट क्षेत्र के तलैया। यहां विदेशी परिंदों ने डेरा डाल रखा है। विदेशी परिंदों की अठखेलियां ग्रामीणों को भी खूब आकर्षित कर रही है।

इन्हीं विदेशी मेहमानों में से एक है पेलिकन, जो मुख्यत: पूर्वी यूरोप तथा दक्षिण एशियाई क्षेत्रों में पाए जाते हैं। शीत ऋतु की दस्तक के साथ ही ये पक्षी भारत के लिए उड़ान भर लेते हैं। यहां ये जयपुर के मानसरोवर, अलवर के सिलीसेढ़, राजस्थान में जवाई बांध व पाली के तालाबों तथा गुजरात के कच्छ व आसपास के क्षेत्रों में डेरा डाल देते हैं। कुछ समय तक यहां प्रवास करने के बाद फिर से ये हजारों किलोमीटर की उड़ान भर देते हैं।

ज्यादा वजनी, फिर भी उड़ान में महारथी
यह एक वजनी व बड़े आकार का उडऩे वाला पक्षी है। इसका वजन 8 से 10 किलोग्राम तक होता है। इतना वजन होने के बावजूद यह तेज उड़ान भरने में माहिर है। साइबेरिया व पूर्वी यूरोप में जब बर्फबारी होने लगती है तो ये हजारों किलोमीटर उड़ान भरकर प्रजनन व भोजन के लिए भारत में आते हैं। इसे रोजी पेलिकन तथा ग्रीट व्हाइट पेलिकन के नाम से भी जाना जाता है।

साफ पानी ही पसंद
खास बात ये भी है कि पेलिकन प्रजाति के ये परिंदे साफ-सुथरे जलाशयों के किनारे ही डेरा डालते हैं। इन्हें प्रदूषित जलाशय पसंद नहीं आते हैं। ये ही कारण है कि इन दिनों विदेशी परिंदों ने पाली जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित तालाबों के इर्द-गिर्द डेरा डाल रखा है।

लम्बी चोंच से शिकार करने में माहिर
पेलिकन की चोंच शिकार के लिए काफी मुफिद साबित होती है। चोंच जहां ल बी होने के साथ ही इसका निचला हिस्सा थैलीनुमा होता है, जिससे ये मछली का आसानी से शिकार कर लेते हैं। पक्षी विशेषज्ञों की मानें तो ये सांस भी चोंच से ही लेते हैं।

Published on:
05 Feb 2019 03:20 pm