
पाली. रामलीला केवल भगवान श्रीराम के जीवन पर आधारित मंचीय प्रस्तुति नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपराओं और आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है। पाली में रामलीला कमेटी की ओर से आयोजित रामलीला इसी सांस्कृतिक विरासत को पिछले पांच दशकों से अधिक समय से सहेज रही है। इस बार रामलीला 51वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। इसकी खास बात यह है कि यहां रामायण के प्रसंगों का मंचन केवल कलाकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई परिवारों की पीढ़ियां इससे जुड़ी हुई हैं। दादा-दादी से लेकर माता-पिता और अब उनके बच्चे भी मंच पर अलग-अलग भूमिकाएं निभाकर इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
दुदावत परिवार की तीन पीढ़ियां रामलीला से जुड़कर इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। मांगुसिंह दुदावत पिछले 28 वर्षों से रामलीला में अलग-अलग किरदार निभा रहे हैं। इस दौरान वे मेघनाद, श्रवणकुमार के पिता शांतनु और विश्वामित्र जैसे कई पात्रों को मंच पर जीवंत कर चुके हैं। आवश्यकता के अनुसार उन्हें जो भी भूमिका सौंपी जाती है, वे उसे पूरी दक्षता और समर्पण के साथ निभाते हैं। उनके पुत्र परमेश्वरसिंह दुदावत भी रामलीला में सक्रिय हैं और अक्षयकुमार व राजकुमार सहित विभिन्न किरदारों की भूमिका निभाते हैं। वहीं, परिवार की तीसरी पीढ़ी से पोती तृप्ति दुदावत इस बार बाल राम की भूमिका में नजर आई। इस तरह परिवार की तीन पीढ़ियां अलग-अलग भूमिकाओं के जरिए रामलीला से अपना जुड़ाव बनाए हुए हैं।
रामलीला शुरू होने के समय से जुड़े हरिचरण वैष्णव की पोती नियति भी दादा की विरासत को निभा रही है। उसने इस बार राम का बाल स्वरूप और हरिण का किरदार निभा रही है। नियति बताती हैं कि दादा के साथ रामलीला में आकर उन्हें नया अनुभव मिलता है। रामलीला सीखने, समझने और अपनी संस्कृति से जुड़ने का अवसर है। उनके दादा ने सालों तक भगवान राम का किरदार निभाया और अब निर्देशन की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
परिहार परिवार भी रामलीला की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। गणेश परिहार पहले महिला पात्रों की भूमिका निभा चुके हैं। इस बार उन्होंने परशुराम का किरदार निभाया। उनके बेटे नरेश परिहार पिछले करीब सात वर्षों से भरत की भूमिका निभा रहे हैं।