खेलने-कूदने की उम्र में कुदरत ने दो मासूमों पर ऐसा कहर ढाया कि उनके सिर से माता-पिता का साया ही छिन गया।
पाली/धनला। खेलने-कूदने की उम्र में कुदरत ने दो मासूमों पर ऐसा कहर ढाया कि उनके सिर से माता-पिता का साया ही छिन गया। कहां तो मासूमों को पढ़ा-लिखाकर बड़ा अधिकारी बनने का ख्वाब संजोए थे, लेकिन एक ही साल में ख्वाब जमींदोज हो गए। कांटों की बाड़ से घिरे एक कमरे में जीवन की इस उठापटक का सामना कर रहे दोनों मासूम भाइयों का सहारा भी कोई है तो उनके एक चाचा, जो खुद मजदूरी कर अपने बच्चों के साथ ही जैसे-तैसे इनका पेट भरने की कोशिश कर रहे हैं। ना जाने कौन इनका रखवाला बनेगा, जिससे इनकी पढ़ाई का सपना पूरा हो सके और अंधियारे जीवन में रोशनी की कुछ किरणें आ सके।
मां चल बसी तो किशन नहीं दे पाया 9वीं की परीक्षा
जो बच्चे रोज स्कूल जाते थे, लेकिन पिता की मौत के बाद 14 वर्षीय किशन हर समय मां की देखरेख में रहता था। मां मंजूदेवी के निधन से किशन परीक्षा नहीं दे पाया। अब मां की मौत से किशन को अपने छोटे भाई का भी ध्यान रखना पड़ रहा है। किशन जाणुंदा की स्कूल में नौवीं कक्षा तथा छोटा भाई भावेश छठी कक्षा में पढ़ता है। दोनों बच्चों के चाचा वोराराम इनकी सारसंभाल कर रहे हैं, लेकिन उनकी भी आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं है।
मामावास के किशन (14 वर्ष) और भावेश (11 वर्ष) के जीवन में अंधियारे ने एक साल पहले ही दस्तक दी और सब कुछ छीन लिया। डेढ़ साल पहले ही समाराम एवं उसकी पत्नी मंजूदेवी ने बड़ी बेटी शारदा के पीले हाथ करवाकर ससुराल भेज दिया। बेटी की शादी के बाद दंपती मेहनत मजदूरी कर परिवार का भरण पोषण कर रहे थे। लेकिन, 29 अप्रेल 2022 को पिता की मौत के बाद परिवार की खुशियों को ग्रहण लग गया। जैसे-तैसे मृतक समाराम की पत्नी मंजू देवी अपने दोनों बच्चों को किसी प्रकार पाल रही थी, लेकिन पति की मौत का सदमा नहीं सह सकी और मानसिक संतुलन खो गया। वह ठीक होती, इससे पहले ही कुदरत ने 25 मार्च को मां को भी छीन लिया।