पी-521 का शिकार में अदतन अपराधियों के शामिल होने की आशंका
पन्ना। मप्र के पन्ना टाइगर रिजर्व में गहरी घाट स्थित कोनी बीट में बाघिन के शिकार में एक्सपर्ट शिकारियों के शामिल होने की आशंका है। मौके पर मौजूद लोगों का कहना है कि बाघिन के शिकार के लिए चार पहिया वाहनों के हैंड ब्रेक में उपयोग होने वाले मोटे क्लच वायर का उपयोग किया था। इससे बाघिन के मरने के बाद उसके पूरे चमड़े में कहीं खरोंच तक नहीं आई थी, जबकि दो पहिया पाहनों का क्लच वायर चमड़ी को काटकर मांस में धंस जाता है। इसके अलावा शिकारियों द्वारा ऐसे स्थान का चयन किया गया, जो वन्य प्राणियों का गलियारा होने के साथ ही कोहनी गांव से महज ढाई से तीन किमी की दूरी पर है।
गौरतलब है कि जिस तीन साल की युवा बाघिन पी-521 का शिकार हुआ वह क्षेत्र बीच पहाड़ में है। इसके काफी ऊंचाई पर होने के कारण वहां हाथियों से पहुंचने में भी आधे घंटे से अधिक का समय लग जाता है, जबकि इससे ढाई से तीन किमी की चढ़ाई पर ग्राम कोहनी पड़ता है। सूत्रों का कहना है कि जिस स्थान पर बाघिन फंदे में फंसने के कारण मरी थी वह क्षेत्र वन्य प्राणियों का गलियारा है। वन्य प्राणी अक्सर उस मार्ग का उपयोग अपने आने-जाने के लिए करते थे। इसके अलावा उसी गलियारे में पेड़ों पर कुछ और फंदे लगे मिले हैं।
शिकारियों ने बदला पैटर्न
पूर्व में वन्यप्राणियों का शिकार करने वाले लोग शिकार के लिए लोहे के बने साधारण उपकरणों का प्रयोग करते थे। इसके बाद एक-दो बार बाघ आदि मांसाहारी वन्य प्राणियों के शिकार में कीटनाशक व जहरीली दवा मिलाने के मामले भी सामने आए थे। बाद में करंट लगाने और शिकार के लिए पतले वायरों का उपयोग करने के मामले भी सामने आते रहे हैं। शिकार के लिए क्लच वायर का उपयोग शिकार के नए पैटर्न के रूप में शुरू हुआ है। पवई रेंज के तेंदुए के शिकार में भी क्लच वायर का उपयोग किए जाने की आशंका है, वहीं दूसरी ओर पन्ना टाइगर रिजर्व के कोनी बीट में जहां बाघिन का शिकार हुआ वहां चार पहिया वाहन के क्लच वायर का उपयोग इसलिए किया गया होगा, ताकि शिकार हुए बाघ के चमड़े में किसी प्रकार की खरोंच न आए। इसके अलावा आसपास पाया गया कि एक और फंदा भी मोटे क्लच वायर का ही बताया जा रहा है।
...तो एक-एक बाघ को तरसेगा पन्ना
नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) के प्रतिनिधि राजेश दीक्षित ने कहा, बाघिन पी-५२१ मरी नहीं है, बल्कि यहां के बाघों और अन्य वन्य प्राणियों को बचाने के लिए सतर्क किया है। बाघिन की मौत से मैसेज गया है कि, पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों और वन्य प्राणियों की सुरक्षा से समझौता किया जा रहा है। ड्रोन से बाघों की सुरक्षा की तैयारी कर रहा पार्क प्रबंधन रेडियो कॉलर लगी बाघिन को भी नहीं बचा सका। ऐसे हालात में बफर जोन, रेगुलर फारेस्ट और कॉरिडोर के माध्यम से दूसरे जिलों की सीमा में जाने वाले बाघों की सुरक्षा कैसे होगी। टाइगर रिजर्व और प्रदेश शासन को बाघिन की मौत को अलार्मिंग कॉल समझना चाहिए और बाघों की सुरक्षा के लिए नए सिरे से व्यवस्था की समीक्षा की जानी चाहिए। यदि समय रहते शिकार की वारदातों पर अंकुश नहीं लगाया गया तो वह दिन दूर नहीं जब बाघों के लिए विश्वभर में एक नई पहचान बनाने वाला पन्ना टाइगर रिजर्व एक-एक बाघ के लिए तरसेगा।
सुरक्षा में नि:संदेह बड़ी चूक
बाघिन पी-५२१ की मौत अलार्मिंग कॉल है। इस दुखद घटना के बाद पार्क प्रबंधन और मप्र सरकार को चेत जाना चाहिए एवं सुरक्षा व्यवस्था की फिर से समीक्षा करनी चाहिए। बाघिन के शिकार में एक्सपर्ट शिकारियों के शामिल होने की आशंका है। पन्ना में बाघों की सुरक्षा में नि:संदेह बड़ी चूक हुई है।
राजेश दीक्षित, प्रतिनिधि एनटीसीए
सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए
पन्ना टाइगर रिजर्व प्रबंधन बाघों की सुरक्षा को लेकर बिल्कुल भी संवेदनशील नहीं है। बाघों की सुरक्षा के लिए तय मानकों के साथ यहां समझौता किया जा रहा है। जिसका परिणाम बाघिन की मौत के रूप में हम सभी के सामने है। मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
अजय दुबे, वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट