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क्लच वायर के फंदे से बाघिन का शिकार, टाइगर रिजर्व प्रबंधन की सुरक्षा पर सवाल

मॉनीटरिंग व्यवस्था की खुली पोल: बाघिन को रेडियो कॉलर लगे होने के बाद भी मॉनीटरिंग नहीं, टाइगर रिजर्व के कोर जोन के अंदर शिकार की वारदात
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पन्ना

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Suresh Mishra

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Updated: 21 Dec 2017, 3:02 PM IST

young tigers dead in panna tiger reserve

young tigers dead in panna tiger reserve

पन्ना. टाइगर रिजर्व के गहरीघाट के कोनी बीट में तीन साल की बाघिन का शिकार हुआ है। अज्ञात शिकारियों ने क्लच वायर के फंदे में फंसाकर उसे मौत के घाट उतार दिया। बाघिन को रेडियो कॉलर लगा था। उसका डेड सिग्नल मिलने पर पार्क प्रबंधन ने हाथियों की मदद से बाघिन की तलाश की। मौके पर पेड़ में क्लच वायर के फंदे में बाघिन को मृत पाया गया। एनटीसीए के प्रतिनिधि की मौजूदगी में बाघिन का पीएम और फिर अंतिम संस्कार किया गया।

फील्ड डायरेक्टर विवेक जैन ने बताया, बाघिन पी-521 के डेड सिग्नल मिलने सघन सर्चिंग की गई। इस दौरान कोनी बीट में 19 दिसंबर को बाघिन का शव पाया गया। बाघिन के गले में तार का फंदा था। मंगलवार को शाम हो जाने के कारण पीएम उसी दिन नहीं हो सका। दूसरे दिन टाइगर रिजर्व के डॉ.संजीव कुमार गुप्ता द्वारा पीएम कराया गया। इस दौरान एनटीसीए के प्रतिनिधि राजेश दीक्षित भी रहे। पीएम के बाद शव को पार्क परिसर में ही जला दिया गया। शिकार करने वालों को पकडऩे के लिए पार्क में मौजूद डॉग स्क्वाड की मदद ली जा रही है। विशेष टीम का गठन कर आरोपियों को पकडऩे की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

तेंदुए का भी शिकार
दक्षिण वन मंडल के पवई वीट अंतर्गत सुरकहाई हार में अज्ञात शिकारियों द्वारा ऐसे ही तार का फंदा लगाकर तेंदुए का भी शिकार किया गया है। वन अमले ने तेंदुए के शिकार स्थल का परीक्षण और, पंचनामा के बाद शव का पीएम कराया। डीएफओ मीना मिश्रा सहित जिले और छतरपुर के वन अधिकारी भी मौके पर पहुंचे। जानकारी के अनुसार, सुरकहाईहार में ९ साल के प्रौढ़ तेंदुए के शिकार की जानकारी विभाग को मंगलवार को लगी। मैदानी अमले ने डीएफओ मीना मिश्रा और सीसीएफ छतरपुर को जानकारी दी। बुधवार सुबह निरीक्षण में तेंदुए का फंदा लगाकर शिकार किए जाने की पुष्टि हुई। पवई में ही पीएम के बाद अंतिम संस्कार हुआ।

कहीं फिर न उजड़ जाए बाघों का संसार
पन्ना टाइगर रिजर्व और वन्यजीव पे्रमियों के लिए बुधवार दो दु:खद खबरें लेकर आया। शिकारियों ने टाइगर रिजर्व क्षेत्र में बाघिन को मार डाला। पवई रेंज में भी तेंदुए का शिकार किया गया है। दोनों शिकार कुछ घंटे के भीतर हुए। हालांकि, पार्क प्रबंधन और वन विभाग को जानकारी देर से हुई। अक्सर, पन्ना से उमरिया तक फैले टाइगर रिजर्व में बाघ-बाघिनों, तेंदुए और दूसरे वन्य जीवों की सुरक्षा को लेकर सवाल होते रहे हैं। बाघ-बाघिनों की मौत शिकार के अलाव भी दूसरे कारणों से होती रही है। बमुश्किल, पन्ना टाइगर रिजर्व फारेस्ट बाघों की संख्या को लेकर समृद्ध हुआ है। वर्ना, 2008 में उसे बाघ शून्य घोषित किया जा चुका था। चिंतित पार्क प्रबंधन ने २००९ में बाघ पुर्नस्थापन योजना के तहत बाघ-बाघिनों को दूसरे रिजर्व फारेस्ट से लाकर उनका संरक्षण किया। जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए। बाघों के अलावा अन्य जीवों का भी संरक्षण किया गया। विगत ९ वर्षों में पन्ना के जंगल बाघों के मामले में चॢचत हुए। मौजूदा समय में 40 बाघों के होने की पुष्टि की जा रही है। जिसमें नर बाघ, बाघिन और शावक शामिल हैं। तकरीबन 16 सौ वर्ग किमी क्षेत्र के जंगल में बाघों की संख्या अधिक होने से अक्सर बाहर दिखाई देते हैं। जिससे शिकारियों को अनुकूल परिस्थितियां आसानी से मिल जाती है। बाघ वयस्क होने पर वर्चस्व क्षेत्र की लड़ाई में भी मरते हैं। पार्क प्रबंधन और विशेषज्ञों के अनुसार, एक वयस्क बाघ को 10 किमी का क्षेत्र चाहिए। पन्ना में एक बाघ ऐसी ही लड़ाई में बीते वर्ष मारा गया। दो बाघों की मौत स्वाभाविक तौर पर हुई।
बाघों के शिकार का सिलसिला उमरिया जिले के बांधवगढ़ नेशनल पार्क में अधिक गंभीर है। वहां सालभर के भीतर पांच शिकार हुए। जिसमें दो बाघ, एक बाघिन, शावक और तेंदुआ शामिल है। बीते वर्श की गणना में बाघों के कुनबे में ६८ सदस्य पाए गए थे। विंध्य का दूसरा टाइगर रिजर्व सीधी जिले में संजय गांधी नेशनल पार्क है। यहां भी हालात ठीक नहीं है। इसीसाल जनवरी में बाघिन का करंट लगाकर शिकार किया गया। उसके तीन शावक थे। जिन्हें बांधवगढ़ भेजा गया था। पर, देख-रेख के अभाव में तीनों की मौत हो गई। तीन साल पहले टेरिटोरियल फाइट में भी पार्क का पहला बाघ मारा जा चुका है। कुछ महीने पहले अप्रैल में बाघिन की मौत बीमारी के चलते हुई। टाइगर रिजर्व के जंगलों में शिकारियों की घुसपैठ, बाघ-बाघिनों के कुनबे के प्रति लापरवाही से इस आशंका को बल मिलता है कि, कहीं फिर से बाघों का बसा बसाया संसार उजड़ न जाए।