भारत के इस रहस्यमयी किले में है असीमित खजाना, निकालने वाले की हो जाती है मौत!
सतना। दुनिया में कई ऐसे राज छिपे हुए है जिन्हे आम इंसान सोच भी नहीं सकता। ऐसे राजों से जब भी कभी पर्दा उठता है, तब हमेशा ही इंसान हैरान हुआ है। खासतौर पर हमारे भारत देश की धरती में ही कई ऐसे राज दफन हैं। ऐसा ही एक राज विंध्याचल पर्वत श्रंखला के समतल पर्वत पर स्थित अजयगढ़ का किला आज भी लोगों के लिए रहस्यमय व आकर्षण का केंद्र बिंदु बना हुआ है। किले के मुख्य द्वार में किसी भाषा में लिखा एक शिलालेख मौजूद है। जो आज तक किसी भी बुद्घिमान ने नहीं पढ़ सका। इस दरबाजे में एक विशाल ताला चांबी की आकृति बनी हुई है जो मूलत: एक बीजक है जिसमें लोगों का मानना है कि किसी खजाने का रहस्य छिपा है।
गौरतलब है कि, मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक पन्ना जिले से 40 किमी. दूर बसा अजयगढ़ 250 साल पुराने दुर्ग , प्राकृतिक सुषमा और वन्य-सम्पदा के लिए प्रसिद्ध है। यह नगर पंचायत क्षेत्र है। ब्रिटिश राज के दौरान अजयगढ़, राजसी-राज्य अजयगढ़ की राजधानी था। बुन्देलखंड राज्य के वीर महाराजा छत्रसाल (1649-1731) के वंशज बुंदेला राजपूत जैतपुर के महाराजा कीरत सिंह के पौत्र (दत्तक पुत्र गुमान सिंह के पुत्र) बखत सिंह ने सन् 1765 में इस राज्य की स्थापना की थी। सन 1809 में रियासती अजयगढ़-राज पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया था और तब यह 'सेंट्रल इंडिया एजेंसीÓ की 'बुंदेलखंड एजेंसीÓ का भाग बनाया गया।
ये है रहस्य
बदा दें कि, अजयगढ़ किले में प्रवेश करते ही दो द्वार मिलते हैं जो एक दरवाजा उत्तर की ओर दूसरा दरवाजा तरोनी गांव को जाता है जो पर्वत की तलहटी में स्थित है। पहाड़ी में चढऩे पर सर्वप्रथम किले का मुख्य दरवाजा आता है। दरवाजे के दाई ओर दो जलकुंड स्थित है जो चंदेलशासक राजवीर वर्मन देव की राज महिषी कल्याणी देवी द्वारा करवाए गए कुंडों का निर्माण आज भी उल्लेखनीय है।
विचित्र भाषा में शिलालेख
किला के ऊपर चढऩे पर दाईं ओर चट्टानपर शिवलिंग की मूर्ति है। वहीं पर किसी विचित्र भाषा में शिलालेख लिखा गया है। लेकिन आज तक कोई भी बुद्घिमान नहीं पढ़ पाया है। मान्यता है कि एक ताला चांबी बनी हुई है जो लिखे हुए शब्दों को पढ़कर ताला खोलेगा तो खजाने का रास्ता मिल जाएगा। हालांकि कुछ वर्षों पहले एक अग्रेज आकर खोलने की कोशिश की लेकिन नहीं कामयाब हो पाया।
आज भी रहस्य वर्करार
लोगों का मानना है कि अजयगढ़ किले में किसी बड़े खजाने का रहस्य छिपा है। हजारों वर्ष बीत गए लेकिन दुर्ग के खजाने का रहस्य आज भी बरकरार है। किले के दक्षिण दिशा की ओर स्थित चार प्रमुख मंदिर आकर्षण के केंद्र है जो चंदेलों महलों के नाम से जाने जाते हैं जो धराशायी होने की कगार पर हैं। ये मंदिर देखने में ऐसा प्रतीत होता है कि खजुराहों व अजयगढ़ का किला एक ही वास्तुकारों की कृति है।
बहुत पहले हुई थी नसबंदी की कल्पना
इस दुर्लभ किले में अनेक शैलोत्कीर्ण मूर्तियां मिलती हैं जिनमें कार्तिकेय, गणेश, जैन तीर्थकारों की आसान, मूर्तियां, नंदी, दुग्धपान कराती मां एवं शिशु आदि मुख्य है। कहते है कि इन कलाकृतियों को देखने पर अहसास होता है कि आज से ३०० साल पहले ही नसबंदी की कल्पना की गई थी। मां के द्वारा बच्चे को दुग्धपान कराकर छोटा परिवार खुशी परिवार का आशय दिया गया था।
गुफा के अंदर शिवलिंग की मूति
अजयपाल मंदिर से होकर एक भूतेश्वर नामक स्थान है जहां गुफा के अंदर शिवलिंग की मूर्ति विराजमान है। चंदेलकाल के समय कालिंजर एवं अजयगढ़ के इतिहास का स्वर्णिम युग कहा जाता है। उसी समय इन दुर्गो की राजनीतिक सामरिक एवं सांस्कृतिक गरिमा प्राप्त हुई। चंदेलों के आठ ऐतिहासिक किलों में अजयगढ़ भी एक है।