
Panna Chita Andolan 14th Day:मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना(Ken Betwa Link Project) के विस्थापितों का सत्याग्रह शनिवार को भी जारी रहा। आदिवासी ग्रामीणों के इस सत्याग्रह को 14 दिन यानी दो हफ्ते हो चुके है। मझगांय बांध सहित केन-बेतवा, रूंझ और ललितपुर-सिंगरौली रेल मार्ग से प्रभावित परिवारों का आंदोलन अब अलग-अलग तरीकों से विरोध दर्ज कराने तक पहुंच गया है। आंदोलनकारी अपने घर, गांव, जमीन और भविष्य पर मंडरा रहे संकट को सामने रखने के लिए चिता पर लेटकर, सूली के सामने खड़े होकर और अपने हाथ-पैरों को बेड़ियों लगाकर विरोध जता रहे हैं। वहीं जल और मिट्टी सत्याग्रह के जरिए प्रभावित परिवार अपनी जमीन और गांव से जुड़ाव का संदेश दे रहे हैं।
आंदोलनकारियों का कहना है कि उनके घर और गांव बांध के पानी में डूब रहे हैं, लेकिन उनकी समस्याओं का निराकरण नहीं हो रहा है। आंदोलन के दौरान लगातार बारिश और पानी में खड़े रहकर सत्याग्रह करने से कई आंदोलनकारियों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ा है। आंदोलनकारियों के अनुसार पानी में लंबे समय तक रहने से पैरों में घाव, निशान, खुजली और त्वचा संबंधी समस्याएं सामने आई हैं। महिला आंदोलनकारी रंभा ने बताया कि पानी में ज्यादा देर तक खड़े होने के कारण उनके पैर गलना शुरू हो गए है।
वहीं, कई लोगों की तबीयत बिगड़ने की बात भी कही गई है। प्रदर्शन के दौरान कुछ आंदोलनकारियों के गिरने के दृश्य भी सामने आए हैं। इसके बावजूद प्रभावित परिवार अपनी मांगों को लेकर आंदोलन जारी रखे हुए हैं।
मझगांय और रूंझ प्रभावितों का कहना है कि विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हुए लंबा समय बीत चुका है। धारा 11 की अधिसूचना जारी हुए आठ साल से अधिक समय हो गया है। इस दौरान सर्वे के साथ कई बार पूरक सूचियां भी तैयार की गईं, लेकिन इसके बावजूद अनेक प्रभावित परिवार अब तक सूची से बाहर हैं। प्रभावितों का सवाल है कि वर्षों तक सर्वे और सूचियों की प्रक्रिया चलने के बाद भी पात्र परिवारों की पहचान पूरी तरह क्यों नहीं हो सकी।
आदोलनकारियों का आरोप है कि कई परिवारों के मकान, कुएं, पेड़, भूमि और अन्य परिसंपत्तियों का उचित आकलन नहीं किया गया। कुछ परिवारों को मकान का मुआवजा नहीं मिलने की बात कही जा रही है, जबकि कुछ प्रभावितों का दावा है कि जमीन और परिसंपत्तियों का पूरा हक उन्हें नहीं मिला। कई परिवार घोषित सहायता राशि पूरी मिलने का भी इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में विस्थापन के साथ मुआवजा और पुनर्वास को लेकर बनी अनिश्चितता उनकी परेशानी बढ़ा रही है।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रदर्शन स्थल पर महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं की स्थिति बिगड़ने के बावजूद प्रशासन की ओर से अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है। चिता पर लेटी महिलाओं, सूली पर लटके युवाओं और पानी में खड़े होकर सत्याग्रह कर रहे लोगों के जरिए प्रभावित अपनी पीड़ा सामने रख रहे हैं।
जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने कहा कि यह केवल मुआवजे की मांग नहीं, बल्कि आदिवासी और किसान परिवारों के जीवन, सम्मान, अधिकार और भविष्य से जुड़ा सवाल है। उनका कहना है कि जब परिवारों की दुनिया उनकी आंखों के सामने उजड़ रही हो और लोग अपनी पीड़ा व्यक्त करने के लिए इस तरह के विरोध का सहारा लेने को मजबूर हों, तब उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।