सम्राट कैबिनेट में जातीय संतुलन साधते हुए कई पुराने मंत्रियों को बाहर कर नए चेहरों को मौका दिया गया है। वहीं, सबसे ज्यादा चर्चा मंगल पांडे को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने को लेकर हो रही है।
सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल का आज विस्तार हो गया। नए मंत्रिमंडल में मंगल पांडे समेत तीन मंत्रियों का पत्ता कट गया है। मंगल पांडे के अलावा सुरेंद्र मेहता और नारायण प्रसाद को भी सम्राट मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिल सकी। वहीं, जदयू कोटे से अशोक चौधरी को भी नई कैबिनेट में शामिल नहीं किया गया है।
इसे लेकर बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, मंगल पांडे को बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है। चर्चा है कि उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव बनाया जा सकता है या फिर यूपी प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। बीजेपी सूत्रों का कहना है कि इस बार संगठन ने सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए कई नए चेहरों पर दांव लगाया है। इसी रणनीति के तहत तीन मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बाहर किया गया है।
सम्राट मंत्रिमंडल में मंगल पांडे को जगह नहीं मिली है। इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। मंगल पांडे 2017 से 2023 तक बिहार सरकार में स्वास्थ्य विभाग जैसे अहम मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। सम्राट सरकार से पहले नीतीश सरकार में भी वे स्वास्थ्य मंत्री के साथ-साथ कृषि मंत्री रहे थे।
मंत्रिमंडल से उनका नाम कटने के बाद कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर भी मंगल पांडे पर कई गंभीर आरोप लगा चुके हैं। इसके अलावा विधानसभा में मैथिली ठाकुर से जुड़े सवालों पर उनके जवाबों को लेकर भी विपक्ष ने निशाना साधा था। कोरोना काल में स्वास्थ्य विभाग के कामकाज पर भी कई सवाल उठे थे।
सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी ने इन सभी मुद्दों को गंभीरता से लेते हुए उन्हें सरकार की बजाय संगठन में जिम्मेदारी देने का फैसला किया है। वहीं, पिछली सरकार में पशु एवं मत्स्य पालन मंत्री रहे सुरेंद्र मेहता और आपदा प्रबंधन मंत्री नारायण प्रसाद को भी नई कैबिनेट में जगह नहीं मिली। उनकी जगह इस बार कुछ नए चेहरों को मौका दिया गया है।
सम्राट चौधरी की नई कैबिनेट में बीजेपी और जेडीयू दोनों ने जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश की है। नए मंत्रिमंडल में सवर्णों के साथ-साथ पिछड़ा, अति पिछड़ा और युवा चेहरों को भी प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया गया है। पार्टियां आगामी चुनाव को ध्यान में रखते हुए इस नई टीम के जरिए मजबूत राजनीतिक संदेश देना चाहती हैं। नई कैबिनेट में लंबे समय से संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले नेताओं को इनाम मिला है। यही वजह है कि इस बार कई पुराने चेहरों को बाहर रखा गया है, जबकि कुछ नए नेताओं को मौका दिया गया है।