बिहार कैडर के वरिष्ठ IAS अधिकारी संजीव हंस एक बार फिर विवादों के घेरे में हैं। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों और जेल की सजा काटने के बाद वे प्रशासनिक सेवा में वापस लौटे थे। लेकिन अब CBI ने उन पर एक करोड़ रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में मामला दर्ज किया है।
बिहार के सबसे चर्चित और प्रभावशाली नौकरशाहों में गिने जाने वाले IAS संजीव हंस एक बार फिर केंद्रीय जांच एजेंसियों के निशाने पर आ गए हैं। आय से अधिक संपत्ति और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच के कारण जेल भेजे जाने के बाद, अब CBI ने उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का एक नया मामला खोल दिया है। यह ताजा मामला मुंबई के एक बिल्डर को फायदा पहुंचाने के बदले 1 करोड़ रुपये की रिश्वत लेने से जुड़ा है।
19 अक्टूबर, 1973 को पंजाब में जन्मे संजीव हंस बिहार कैडर के 1997 बैच के IAS अधिकारी हैं। सिविल इंजीनियरिंग में बिटेक संजीव हंस के पिता भी भारतीय प्रशासनिक सेवा में थे। बिहार के बांका जिले में उन्हें पहली पोस्टिंग मिली थी, इसके बाद वो कई जिलों के डीएम भी रहे। उन्होंने बिहार के ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव और बिहार राज्य विद्युत होल्डिंग कंपनी के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक (CMD) जैसे प्रभावशाली पदों पर लंबे समय तक सेवाएं दी हैं।
एक महिला ने संजीव हंस पर शादी का झूठा वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया था। जब इस आरोप की जांच शुरू हुई, तो आय से अधिक संपत्ति सहित अन्य मामले भी सामने आए। इसके बाद, अक्टूबर 2024 में, ED ने भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में संजीव हंस को गिरफ्तार कर लिया। इस दौरान उन्हें सेवा से निलंबित कर दिया गया था। उन्होंने लगभग 10 महीने न्यायिक हिरासत (बेउर जेल में) में बिताए।
एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, अक्टूबर 2025 में पटना उच्च न्यायालय ने बलात्कार के मामले को खारिज कर दिया और भ्रष्टाचार के मामले में उन्हें सशर्त जमानत दे दी। भ्रष्टाचार के मामले में अभी जांच चल रही है। ज़मानत पर रिहा होने के बाद भी, संजीव हंस काफी समय तक बिना किसी पोस्टिंग के रहे। हालांकि, जनवरी 2026 में बिहार सरकार ने उन्हें सेवा पर बहाल कर दिया। हाल ही में, उन्हें राजस्व बोर्ड के अतिरिक्त सदस्य के रूप में एक नई जिम्मेदारी सौंपी गई है।
CBI द्वारा दर्ज की गई यह ताजा FIR उस समय से जुड़ी है, जब संजीव हंस भारत सरकार के उपभोक्ता मामले मंत्रालय के मंत्री दिवंगत राम विलास पासवान के निजी सचिव के पद पर कार्यरत थे। आरोप है कि मुंबई स्थित 'ईस्ट एंड वेस्ट बिल्डर्स' को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) से राहत दिलाने के लिए ₹1 करोड़ की एक डील की गई थी।
CBI के अनुसार, रिश्वत की रकम सीधे तौर पर स्वीकार नहीं की गई थी। इसके बजाय, विपुल बंसल नाम के एक बिचौलिए के जरिए हवाला नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया। इस लेन-देन को आसान बनाने के लिए खास कोडवर्ड का इस्तेमाल किया गया था। रिश्वत के बदले, संजीव हंस ने कथित तौर पर बिल्डर के पक्ष में सुनवाई की तारीखों में हेरफेर किया और कंपनी के डायरेक्टर की गिरफ्तारी को रोकने में मदद की।
CBI द्वारा दर्ज किए गए इस मामले के संबंध में संजीव हंस के वकील ने भी एक बयान जारी किया है। संजीव के वकील, चंगेज़ खान ने CBI द्वारा लगाए गए आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
ED ने पहले खुलासा किया था कि संजीव हंस ने अपने साथियों और पूर्व विधायक गुलाब यादव के साथ मिलकर करोड़ों रुपये की बेनामी (किसी और के नाम पर रखी गई) संपत्ति जमा की थी। उनके ठिकानों पर की गई छापेमारी के दौरान, जांचकर्ताओं ने 11 करोड़ रुपये से ज्यादा की नकदी, कई किलोग्राम वजन के सोने और चांदी के बिस्किट और विदेशों में किए गए निवेश से जुड़े दस्तावेज बरामद किए।