नीतीश कुमार द्वारा शासन से जुड़े मुद्दों पर बार-बार दिए जा रहे सुझावों से लालू प्रसाद असहज और परेशान होने लगे थे। नीतीश के इस रुख से उनके मन में संदेह भी पैदा होने लगा।
बिहार की राजनीति में पिछले चार दशकों से दो प्रमुख नेताओं नीतीश कुमार और लालू प्रसाद का दबदबा रहा है। मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार के इस्तीफे और लालू प्रसाद यादव के अस्वस्थ होने के कारण अब इस दौर के अंत की चर्चा होने लगी है। अब उनकी अगली पीढ़ी राजनीति में सक्रिय हो चुकी है।
दोनों नेताओं ने जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए आपातकाल-विरोधी आंदोलन के दौरान राजनीति में कदम रखा था। लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री बनाने में नीतीश कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। उन्होंने लालू यादव के मुख्यमंत्री बनने में आने वाली बाधाओं को दूर करने में भी अहम योगदान दिया था।
पत्रकार संकर्षण ठाकुर अपनी किताब बंधु बिहारी में लिखते हैं कि जब उन्होंने नीतीश कुमार से पूछा कि आपने लालू यादव का समर्थन क्यों किया, तो नीतीश कुमार ने जवाब दिया- हम सभी जानते थे कि लालू यादव हमारे लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति नहीं थे, लेकिन राजनीति में कई अन्य कारक भी मायने रखते हैं।
18 मार्च 1990 को मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू प्रसाद ने अपने देहाती अंदाज़ से लोगों से जुड़ना शुरू किया। वे आम लोगों की भाषा में संवाद करते थे और अपनी शैली से उनसे गहरा संपर्क बना लेते थे। मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने और आडवाणी की गिरफ्तारी जैसे कदमों से उनकी लोकप्रियता काफी बढ़ गई। उधर, नीतीश कुमार 1990 में वी. पी. सिंह की सरकार में कृषि राज्य मंत्री बने, हालांकि यह सरकार लगभग 15 महीने ही चल सकी।
1991 के मध्यावधि लोकसभा चुनाव में वे एक बार फिर बाढ़ से सांसद निर्वाचित हुए। समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने हाल ही में नीतीश कुमार के इस्तीफे को लेकर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी। इस दौरान उन्होंने पत्रकार Sankarshan Thakur की किताब का जिक्र करते हुए लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के मिज़ाज और व्यक्तित्व पर चर्चा की। अपने पोस्ट में उन्होंने दोनों नेताओं की दोस्ती और बाद में आई दरार की कहानी भी साझा की।
1992 आते-आते लालू प्रसाद के कामकाज से नीतीश नाराज़ होने लगे थे। इसकी झलक नीतीश कुमार द्वारा लालू प्रसाद को लिखे एक पत्र में भी साफ दिखाई देती है। पत्रकार संकर्षण ठाकुर अपनी किताब में इसका उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि नीतीश कुमार ने पत्र में लिखा कि अब आपसे आगे बातचीत संभव नहीं है, क्योंकि मेरा मानना है कि आप गंभीर या महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करने को लेकर संजीदा नहीं हैं।
उन्होंने आगे लिखा कि पार्टी, सरकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति आपका रवैया और आपकी मौजूदा संगति ऐसी है कि सार्थक बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं बची है। नीतीश कुमार ने यह भी लिखा कि यह सरकार अनगिनत नेताओं और हजारों कार्यकर्ताओं के वर्षों के संघर्ष का परिणाम है। हम सभी उस संघर्ष का हिस्सा रहे हैं, जिसकी बदौलत आप सत्ता तक पहुंच सके हैं।
उन्होंने आगे लिखा कि विपक्ष के नेता से लेकर आपको मुख्यमंत्री बनने तक मैं आपके साथ चट्टान की तरह खड़ा रहा। मैंने लगातार आपकी सरकार का बचाव किया, लेकिन इस सरकार ने हमारी सभी उम्मीदों को तोड़ दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार आपके इर्द-गिर्द सत्ता-लोलुप गुटों का खेल का मैदान बन गई है। जब हमने आपको नेतृत्व के लिए चुना था, तब हमें भरोसा था कि आप कांग्रेस शासनकाल में पनपे भ्रष्टाचार और कुशासन का अंत करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
पत्र में यह भी कहा गया कि सरकारी धन का खुलकर दुरुपयोग हो रहा है, वित्तीय अनुशासन की कमी है और शासन की रफ्तार ठहर गई है। आपने अपने वरिष्ठ नेताओं का अपमान करना शुरू कर दिया है और खुद को चाटुकारों से घेर लिया है।अंत में उन्होंने लिखा कि जब हमने आपको सत्ता दिलाने का फैसला किया था, तब यह कल्पना भी नहीं की थी कि आप इस तरह का व्यवहार करेंगे।
नीतीश कुमार द्वारा शासन से जुड़े मुद्दों पर बार-बार दिए जा रहे सुझावों से लालू प्रसाद असहज और परेशान होने लगे थे। नीतीश के इस रुख से उनके मन में संदेह भी पैदा होने लगा। पत्रकार संकर्षण ठाकुर अपनी पुस्तक में इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि लालू प्रसाद के मन में यह शंका उभरने लगी...“का नीतीशवा सरकार हथियाना चाहता है?” (क्या नीतीश सरकार हथियाना चाहते हैं?) राजनीति के जानकारों के अनुसार, यही वह दौर था जब लालू और नीतीश के बीच विश्वास की जगह अविश्वास पनपने लगा और उनकी दोस्ती में दरार की शुरुआत हुई।
शिवानंद तिवारी इस चिट्टी की चर्चा करते हुए अपने पोस्ट में लिखते हैं कि 1990 में वी.पी. सिंह की सरकार में नीतीश कुमार कृषि और सहकारिता राज्य मंत्री बने, हालांकि यह सरकार केवल लगभग 15 महीने ही चल सकी। 1991 के मध्यावधि चुनाव में वृष्णि पटेल भीस सीवान संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। बिहार भवन में उन्हें एक कमरा मिला था। उन दिनों दिल्ली में मेरा ठिकाना नीतीश कुमार का ही घर हुआ करता था। नीतीश कुमार, ललन , वृष्णि पटेल और मैं पटेल साहब के कमरे में टेलीविजन पर एक फिल्म देख रहे थे। फिल्म खत्म होने के बाद जब हम बाहर निकले, तो पता चला कि लालू प्रसाद यादव भी दिल्ली आ चुके हैं और नीचे मुख्यमंत्री कक्ष में मौजूद हैं। इसके बाद नीतीश कुमार ने कहा कि चलिए, मुख्यमंत्री से मिल लिया जाए। हालांकि, ललन सिंह किसी कारणवश वहां जाने के इच्छुक नहीं थे। नीतीश ने कहा कि 'अरे चलिए, ऐसा क्या है' लेकिन तब भी ललन सिंह जाने में संकोच कर रहे थे। तब मैंने ललन सिंह से कहा कि जब नेता कह रहा है तो चलो , क्या हर्ज है। (मैंने नीतीश के लिए नेता शब्द का इस्तेमाल किया है) हम लोग नीतीश को ही अपनी जमात का नेता मानते थे। यह जयप्रकाश आंदोलन और लोहिया विचार मंच के जमाने से ही था।
हम लोग मुख्यमंत्री कक्ष के ड्राइंग रूम में पहुँचे। वहाँ देखा कि तीन लोगों के बैठने वाले लंबे सोफे पर बीच में लालू प्रसाद यादव बैठे हुए थे। सामने एक लंबी टेबल थी, जिस पर एक खुली फाइल रखी थी। फाइल में केवल एक पन्ना दिखाई दे रहा था और उनके हाथ में खुली हुई कलम थी। उनकी नज़र फाइल पर ही टिकी थी, उन्होंने हमारी ओर देखा भी नहीं। हम लोग अंदर गए और जिसे जहाँ जगह मिली, वहीं बैठ गए या खड़े हो गए। एक दूसरा लंबा सोफा था, जिस पर नीतीश कुमार और पटेल साहब बैठ गए। सामने रखी एक गोदरेज टेबल से टेक लगाकर ललन सिंह खड़े हो गए, जबकि मैं लालू यादव के बगल में रखी कुर्सी पर बैठ गया।
लालू प्रसाद यादव ने बिना कुछ बोले अपनी कलम बंद की, फाइल को एक तरफ रखा और सीधे ललन सिंह की ओर देखा। उंगली के इशारे से उन्होंने उन्हें कमरे से बाहर जाने का रास्ता दिखाया। यह देखकर सब लोग हतप्रभ रह गए। ललन सिंह ने पहले इस इशारे को समझा नहीं, लेकिन जब लालू ने दोबारा इशारा किया, तो वे चुपचाप सिर झुकाकर बाहर निकल गए।
मैंने नीतीश कुमार और पटेल साहब के चेहरे की ओर देखा। ललन के साथ इस व्यवहार को देखकर दोनों का चेहरा गंभीर हो गया। गौरतलब है कि ललन अपनी मर्जी से लालू के पास नहीं गए थे; एक तरह से उन्हें वहां पहुंचाने के लिए नीतीश कुमार का दबाव था।
इसके बाद लालू प्रसाद यादव ने सरयू राय का नाम लेकर गाली-गलौज करना शुरू कर दिए। हम लोग यह नहीं जानते थे कि लालू सरयू राय को क्यों नाराज़ थे। बाद में पता चला कि सरयू राय ने पटना के नवभारत टाइम्स में एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि लालू सरकार ने बिहार के हित के विपरीत सोन नहर का पानी तत्कालीन केंद्रीय बिजली मंत्री कल्पनाथ राय के क्षेत्र में दे दिया। उस समय विधानसभा का सत्र चल रहा था और विपक्ष ने इस खबर पर जोरदार हंगामा किया था। सरयू राय, नीतीश कुमार के मित्र हैं। इसी पृष्ठभूमि में लालू प्रसाद यादव अत्यंत आक्रोशित थे और सरयू राय के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी की कृपा से राजनीति नहीं कर रहे हैं और मैं जानता हूँ कि यह सब कौन करा रहा है। उनका इशारा सीधे नीतीश कुमार की ओर था।
यह सब सुनकर मेरा धैर्य जवाब दे गया। मैं खड़ा होकर बोला कि आपको यह गलतफहमी है कि बाकी लोग आपकी कृपा से राजनीति कर रहे हैं। मैंने उन्हें उनके पुराने दिनों की याद दिलाई और कहा कि वे मेरे जीप पर पीछे लटकने के लिए बेचैन रहते थे और वह दिन उन्होंने भुला दिया है। मैंने नीतीश कुमार से कहा, “उठो, इस आदमी के साथ बैठना अपना अपमान करवाना है।” गुस्से से मेरी आवाज़ काँप रही थी। इस पर नीतीश कुमार और पटेल साहब उठकर खड़े हो गए। लालू मुझे अपने स्कूल के दिनों से जानते थे। मेरी इस प्रतिक्रिया से स्थिति अचानक बदल गई। लालू यादव तुरंत उठे, मुझे पकड़कर शांत करने लगे और बाहर आवाज लगाई—“अरे कहाँ मर गया सब. जल्दी बाबा के लिए चाय ले आओ. दूसरी ओर नीतीश को कहा, बैठिए नीतीश जी, बाबा चाय पी कर जायेंगे। नीतीश ठस से बैठ गए। चाय आई। अब चाय गले के नीचे उतर रही है! किसी तरह चाय गले से नीचे उतार कर हम लोग वहाँ से बाहर निकले।
बिहार भवन के बिल्कुल नज़दीक ही नीतीश कुमार का सरकारी आवास था। वातावरण गंभीर था। घर पहुंचते ही नीतीश कुमार ने अपने स्टाफ़ को आदेश दिया कि किसी का फोन न लिया जाए और किसी से भी मिलना न हो। उसी दौरान पटना से सरयू राय को फोन किया गया। राय जी को बताया गया कि शाम तक दिल्ली पहुँचें। शाम तक राय जी दिल्ली में हाज़िर हो गए और पूरी घटना पर विस्तार से चर्चा हुई। तय किया गया कि बिहार भवन में हुई घटना के विरोध में लालू प्रसाद यादव को कड़ी चिट्ठी लिखी जाए। राय जी ने दो ढाई पेज का मसौदा तैयार किया। इसके बाद नीतीश कुमार ने राय जी को सुझाव दिया कि इसे थोड़ा संक्षिप्त किया जाए। राय जी ने फिर चिट्ठी को छोटा करने में हाथ लगाया। इसी बीच, नीतीश कुमार ने कहा कि वे शरद जी से मिलकर जाते हैं।
मैंने कहा कि “अगर आप शरद जी से मिलने जाएंगे तो चिट्ठी नहीं जाएगी।” नीतीश कुमार ने झुंझलाकर जवाब दिया कि “शरद जी नेता हैं, उनसे मिलना क्यों नहीं चाहिए।” मैंने कहा, “ज़रूर मिलें, मैं तो केवल उस मुलाक़ात के नतीजे की बात कर रहा हूँ।” नीतीश जी शरद जी से मिलने गए। इस बीच, सरयू राय ने ढाई पेज का मसौदा डेढ़ पेज में संक्षिप्त कर दिया। नीतीश जी ने कहा कि इसे और छोटा कर दें, और यह पटना पहुँचने के बाद लालू प्रसाद यादव को भेजी जाएगी। बाद में पत्रकार श्रीकांत की किताब चिट्ठियों की राजनीति में सामने आया।