पटना

आइडिया चोरी केस में प्रशांत किशोर को राहत, हाई कोर्ट ने रद्द की FIR

Prashant Kishor: पटना हाई कोर्ट ने प्रशांत किशोर के खिलाफ साल 2020 से चल रहे एक धोखाधड़ी और आइडिया चोरी के मामले को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि राजनीतिक नारे या अभियान पर कॉपीराइट का दावा नहीं हो सकता।
2 min read
May 19, 2026
Prashant Kishor
प्रशांत किशोर (ANI Photo)

Prashant Kishor: चुनावी रणनीतिकार और जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। पटना हाई कोर्ट ने प्रशांत किशोर के खिलाफ दर्ज उस एफआईआर को रद्द कर दिया है, जिसमें उन पर 'बात बिहार की' कैंपेन का आइडिया और कंटेंट चोरी करने का संगीन आरोप लगाया गया था। इस मामले की सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने साफ कर दिया कि किसी भी राजनीतिक अभियान की कॉन्सेप्ट, रणनीति या नारे पर कोई भी व्यक्ति कॉपीराइट का दावा नहीं कर सकता है। कोर्ट के इस फैसले के बाद पिछले 6 सालों से प्रशांत किशोर पर लटकी कानूनी तलवार अब हट गई है।

क्या था पूरा मामला और क्यों दर्ज हुई थी FIR?

इस पूरे विवाद की शुरुआत साल 2020 में हुई थी, जब शाश्वत गौतम नाम के एक व्यक्ति ने प्रशांत किशोर पर बेहद गंभीर आरोप लगाए थे। शाश्वत गौतम का दावा था कि वह बिहार के विकास को लेकर एक विशेष राजनीतिक कैंपेन और स्लोगन पर काम कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके एक पूर्व सहयोगी के माध्यम से यह पूरा आइडिया और कंटेंट लीक होकर प्रशांत किशोर तक पहुंच गया। इसके बाद प्रशांत किशोर ने कथित तौर पर उसी कॉन्सेप्ट का इस्तेमाल करते हुए ‘बात बिहार की’ नाम से अपना एक बड़ा अभियान लॉन्च कर दिया।

शाश्वत गौतम की शिकायत के बाद पटना के पाटलिपुत्र थाने में प्रशांत किशोर के खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात जैसी गंभीर धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। उस दौरान प्रशांत किशोर ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे महज सस्ती लोकप्रियता और पब्लिसिटी पाने का स्टंट करार दिया था।

राजनीतिक अभियान पर कॉपीराइट का दावा नहीं

मामले की सुनवाई के बाद पटना हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता के दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि कोई भी राजनीतिक प्रचार अभियान, चुनावी नारा या रणनीतिक आइडिया किसी साहित्यिक, कलात्मक या मौलिक रचना की श्रेणी में नहीं आता है। इसलिए, कॉपीराइट कानून के तहत इस तरह के वैचारिक अभियानों पर किसी का भी एकाधिकार नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि राजनीति में अभियान और नारों की समानता एक आम बात है और इसे बौद्धिक संपदा की चोरी का आधार नहीं बनाया जा सकता।

आपराधिक मामला नहीं बनता, अदालत ने कार्रवाई को बताया अनुचित

हाईकोर्ट ने पुलिस की प्राथमिकी और लगाए गए आरोपों की समीक्षा करते हुए कहा कि एफआईआर में प्रशांत किशोर के खिलाफ जो भी आरोप लगाए गए हैं, वे प्रथम दृष्टया में कोई आपराधिक मामला नहीं बनाते हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि दो अलग-अलग अभियानों के नाम, विचार या नारों में कुछ समानताएं मिल भी जाती हैं, तो उसे सीधे तौर पर कोई आपराधिक कृत्य या धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता। ऐसे वैचारिक मतभेदों या समानताओं को लेकर किसी नागरिक के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करना कानूनन पूरी तरह से अनुचित है। इसी आधार पर न्यायालय ने पाटलिपुत्र थाने में दर्ज पूरी कानूनी प्रक्रिया और एफआईआर को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया।

Updated on:
19 May 2026 03:29 pm
Published on:
19 May 2026 03:29 pm
Also Read
View All