पटना

स्कूली बच्चियों का लैब रैट की तरह किया इस्तेमाल! RJD सांसद का आरोप- विदेशी फाउंडेशन ने किया अवैध ट्रायल

Bihar News: राजद सांसद सांसद सुधाकर सिंह ने आरोप लगाया है कि बिहार में विदेशी निजी संस्थाओं ने स्कूली बच्चियों पर अवैध रूप से HPV वैक्सीन का ट्रायल किया है। उन्होंने कहा कि इन संस्थाओं की पहुंच ब्लॉक स्तर तक है और ये सरकारी विभागों को नियंत्रित कर रही हैं। 

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Feb 24, 2026
सुधाकर सिंह राजद सांसद (फोटोःIANS)

Bihar News: बिहार की की राजनीति में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के काम करने के तरीके और हेल्थ सेफ्टी को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। RJD सांसद सुधाकर सिंह ने गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि विदेशी फाउंडेशन की मदद से भारत में स्कूली लड़कियों पर HPV वैक्सीन का ट्रायल किया गया और बिहार भी इससे अछूता नहीं रहा। 2013 की राज्यसभा स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि गुजरात और आंध्र प्रदेश में इन ट्रायल के दौरान लड़कियों की मौत के मामले सामने आए थे।

सुधाकर सिंह ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन (BMGF) जैसे विदेशी ऑर्गनाइज़ेशन ने बिहार में मासूम स्कूली लड़कियों पर HPV (सर्वाइकल कैंसर) वैक्सीन का गलत तरीके से ट्रायल किया। MP ने इसे भारतीय कानून का उल्लंघन बताया और इनफर्टिलिटी और यहां तक ​​कि मौत का खतरा बताया।

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क्या है पूरा आरोप?

सुधाकर सिंह ने कहा कि उन्होंने एक साल पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चेतावनी दी थी कि बिहार में काम कर रहे विदेशी और प्राइवेट ऑर्गनाइजेशन के रोल की जांच होनी चाहिए। उनका आरोप है कि कुछ संगठन ब्लॉक और जिला लेवल पर एक्टिव हैं और पॉलिसी के फैसलों पर असर डाल रहे हैं। उन्होंने खास तौर पर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन का नाम लेते हुए कहा कि इस संगठन ने भारत में HPV वैक्सीन की टेस्टिंग में भूमिका निभाई। MP ने आरोप लगाया कि वैक्सीन का टेस्ट सरकारी स्कूलों में 9 से 12 साल की लड़कियों पर किया गया।

टीचरों से सहमति ली गई, माता-पिता से नहीं

सुधाकर सिंह ने आरोप लगाया कि भारतीय कानून के मुताबिक, माता-पिता की लिखित सहमति के बिना कोई भी दवा का ट्रायल नहीं किया जा सकता। लेकिन, बिहार में इन संगठनों ने सरकारी मशीनरी का गलत इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा, "यह एक्सपेरिमेंट बिहार के सरकारी स्कूलों में 9 से 12 साल की लड़कियों पर किया गया। सरकारी कर्मचारियों (टीचरों) पर कागज़ों पर साइन करने का दबाव डाला गया, माता-पिता को अंधेरे में रखा गया और लड़कियों को 'लैब रैट' (एक्सपेरिमेंट का एक जरिया) बनाया गया।"

सांसद ने आरोप लगाया कि लड़कियों की सेहत खतरे में थी और यह मामला बहुत गंभीर है। सांसद ने कहा कि अगर सरकार ट्रांसपेरेंट है, तो उसे पूरे मामले की हाई-लेवल जांच करानी चाहिए और संबंधित कागज़ात पब्लिक करने चाहिए।

2013 की रिपोर्ट का रेफरेंस

सांसद ने अपनी बात को साबित करने के लिए 2013 की पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट का हवाला दिया। उन्होंने दावा किया कि आंध्र प्रदेश और गुजरात में लड़कियों की मौत इसी ट्रायल के दौरान हुई। उन्होंने ट्रायल प्रोसेस में गड़बड़ियों की ओर इशारा किया। उन्होंने दावा किया कि कमेटी को ट्रायल के दौरान माता-पिता से इन्फॉर्म्ड कंसेंट लेने के प्रोसेस में कमियां मिलीं। सुधाकर सिंह ने सवाल किया कि जब यह पूरा मामला इतना कॉन्ट्रोवर्शियल रहा है, तो इन संस्थाओं को बिहार में "खुले सांड" की तरह काम करने की इजाजत क्यों दी गई है?

प्रखंड लेवल तक विदेशी संस्थाओं का कब्जा

सुधाकर सिंह ने दावा किया कि ये विदेशी संस्थाएं सिर्फ सचिवालय तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि ब्लॉक लेवल तक घुस चुके हैं। जीविका, स्वास्थ्य और कृषि विभाग को इन्हीं संस्थाओं द्वारा नियंत्रित और डिजाइन किया जा रहा है। ये निजी संस्थाएं गरीबों का उपयोग अपनी दवाओं के परीक्षण और बाजार तैयार करने के लिए कर रही हैं।

WHO और निजी संस्थाओं में बताया अंतर

सांसद ने साफ किया कि उन्हें WHO (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन) जैसे डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूशन से कोई एतराज़ नहीं है क्योंकि उन्हें दुनिया भर की सरकारों ने बनाया है। लेकिन, गेट्स फाउंडेशन या CARE जैसे संगठन प्राइवेट फायदे के लिए काम कर रहे हैं और उन्हें बिहार से तुरंत हटा देना चाहिए।

HPV वैक्सीन क्या है?

HPV (ह्यूमन पैपिलोमावायरस) एक वायरस है जिसे महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर का मुख्य कारण माना जाता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) और भारत सरकार समेत कई संगठन HPV वैक्सीन को कैंसर से बचाव का एक जरूरी तरीका मानते हैं।

भारत में नेशनल वैक्सीनेशन प्रोग्राम में HPV वैक्सीन को शामिल करने पर भी चर्चा हुई है। हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि वैक्सीन को काफी हद तक सुरक्षित माना जाता है, लेकिन किसी भी क्लिनिकल ट्रायल के लिए सख्त कानूनी और नैतिक प्रक्रिया जरूरी हैं।

ट्रायल के लिए सहमति जरूरी

भारत में क्लिनिकल ट्रायल ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट और ICMR गाइडलाइंस के तहत होते हैं। इनके लिए प्रतिभागियों या उनके अभिभावकों से जानकारी के साथ सहमति लेना जरूरी है। इन नियमों का उल्लंघन करने पर संबंधित संगठन और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।

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Updated on:
24 Feb 2026 05:54 pm
Published on:
24 Feb 2026 05:30 pm
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