मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सीधे-सीधे कठघरे में इसलिए हैं, क्योंकि पुलिस बल अर्थात गृह विभाग उनके ही अधीन काम करता है।
पटना । मुजफ्फरपुर बालिका गृह शोषण कांड की लापरवाह जांच पर सुप्रीम कोर्ट ने बहुत बुरी तरह से बिहार सरकार को फटकारा है। हालांकि इस मामले में सितंबर महीने से ही सुप्रीम कोर्ट की फटकार बिहार सरकार पर पड़ रही है, लेकिन ताजा फटकार ऐतिहासिक है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सीधे-सीधे कठघरे में इसलिए हैं, क्योंकि पुलिस बल अर्थात गृह विभाग उनके ही अधीन काम करता है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मदन बी. लोकुर, जस्टिस अब्दुल नजीर और जस्टिस दीपक गुप्ता की अदालत में साफ कह दिया गया कि बिहार पुलिस अपना काम नहीं कर रही है। 34 लड़कियों के संगठित यौन शोषण जैसे गंभीर अपराध को बहुत हल्के ढंग से निपटाया जा रहा है और अपराधियों को बचाने की साजिशें होती दिख रही हैं।
बिहार पुलिस पर ये हैं गंभीर आरोप
1 - मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर जेल से ही जांच को प्रभावित कर रहा है।
2 - बिहार सरकार की पूर्व मंत्री मंजू वर्मा के प्रति नरमी बरती जा रही है।
3 - सीबीआई के जांच अधिकारियों को बार-बार बदला जा रहा है।
4 - आरोपियों के हित में बहुत हल्की धाराओं में एफआईआर दर्ज हुई है।
5 - सरकार जांच में पूरी लापरवाही बरत रही है, जवाब नहीं दे पा रही है।
6 - लापरवाही बरतने वाले विभाग के मुखिया मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं।
विपक्ष को मिला बड़ा मौका
बिहार सरकार को सुप्रीम कोर्ट से मिली फटकार के बाद विपक्ष को विरोध का नया कारण मिल गया है। बिहार विधानसभा के चालू सत्र में मंगलवार को खूब हुगामा हुआ। इसी मामले में विपक्ष नीतीश कुमार से इस्तीफे की मांग करता रहा है, लेकिन अब यह मांग और तेज हो गई है।
बिहार पुलिस की नाकामी
बिहार की पुलिस को स्वयं नीतीश कुमार भी फटकारते रहे हैं, पिछले हफ्ते ही उन्होंने पुलिस के बड़े अफसरों को कहा था कि अवैध शराब के बड़े कारोबारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है। मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड में भी नीतीश ने कड़ी कार्रवाई के बयान दिए थे, लेकिन ढीली कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट ने ही उधेड़ कर रख दिया है।
बिहार पुलिस का हाल
देश की बदहाल पुलिस में बिहार पुलिस की गिनती होती है। सुविधाओं, संसाधनों का तो अकाल-सा है है। अनुशासनहीनता और अमानवीयता इस कदर हावी है कि पिछले महीने तो पटना में पुलिस विद्रोह की स्थिति बन गई थी। पुलिस और जनता अनुपात के मामले में भी बिहार 33वें नंबर पर आता है। प्रति 839 लोगों पर एक पुलिसकर्मी है। जबकि बिहार से ही अलग होने वाले झारखंड ने अपनी स्थिति को सुधार लिया है, झारखंड में यह अनुपात प्रति 436 लोगों पर एक पुलिसकर्मी का है।
बिहार पुलिस एक बड़ी चुनौती
ऐसे अनेक मामले हैं, जब बिहार पुलिस को रसूखदारों की सेवा करते देखा गया है। बिहार में कुख्यात निजी सेनाओं के दौर में भी पुलिसकर्मी अपनी-अपनी जाति व प्रभाव के हिसाब से उनकी मदद किया करते थे और हिंसा को बढ़ावा देते थे। पुलिस का शर्मनाक और सामंती व्यवहार नीतीश कुमार के गृह मंत्री या मुख्यमंत्री रहते भी नहीं सुधरा है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की बार-बार की फटकार यही साबित कर रही है।