
मोकामा के बाहुबली - अनंत सिंह, सूरजभान सिंह, विवेका पहलवान, दुलारचंद यादव और सोनू-मोनू
Bahubalis of Mokama: बिहार की राजनीति और संगठित अपराध की दुनिया में मोकामा सिर्फ एक जगह का नाम नहीं है। बल्कि यह एक ऐसी किताब है जिसमें बाहुबल, गैंगवार, AK-47 की गोलियों की तड़तड़ाहट और राजनीतिक दबदबे की कहानियां दर्ज हैं। गंगा नदी के किनारे पटना से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थित मोकामा का टाल इलाका दशकों से सत्ता और बंदूक के मेल का केंद्र रहा है।
यहां हाल ही में, कुख्यात सोनू-मोनू गैंग के घर पर छापा मारने गई एक पुलिस टीम को अपराधियों के गुर्गों के सामने लाइन में लगकर अपनी तलाशी देनी पड़ी। जिसके बाद पटना के एसएसपी ने दो थानों के प्रभारी को निलंबित कर दिया। इस घटना ने एक बार फिर मोकामा के पुराने जख्मों और गैंगवार के इतिहास को जिंदा कर दिया है। आइए जानते हैं मोकामा के इतिहास से लेकर वर्तमान तक के उन बड़े बाहुबलियों और गैंगस्टर्स के बारे में, जिन्होंने सिर्फ मोकामा ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार को दहलाया।
जब भी मोकामा के बाहुबलियों की बात होती है, तो यह नाम हमेशा सबसे ऊपर आता है। मोकामा के लदमा गांव के रहने वाले अनंत सिंह को इस इलाके में 'छोटे सरकार' के नाम से जाना जाता है। अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह, 1990 के दशक में मोकामा की एक कद्दावर हस्ती थे और लालू यादव के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री भी रहे थे।
दिलीप सिंह के निधन के बाद, अनंत सिंह ने मोकामा की राजनीतिक कमान संभाल ली। अनंत सिंह का दबदबा इतना ज्यादा था कि वे लगातार मोकामा से विधायक (MLA) चुने जाते रहे, उन्होंने जदयू, राजद और यहां तक कि एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर भी चुनाव जीता। वे अभी जदयू के विधायक हैं, हालांकि उन्होंने घोषणा की है कि अब वे चुनाव नहीं लड़ेंगे।
अनंत सिंह अपनी घोड़ा-गाड़ी (बग्गी) की सवारी, अजगर आदि पालने के शौक और अपने बेबाक, दबंग अंदाज के लिए जाने जाते हैं। साल 2019 में उनके पैतृक घर लदमा में पुलिस ने छापेमारी कर एक एके-47 (AK-47) राइफल और हैंड ग्रेनेड बरामद किया था, जिसके बाद इन्हें सजा हुई और इनकी विधायकी चली गई। हालांकि, अगस्त 2024 में मामले की सुनवाई करते हुए पटना हाई कोर्ट ने अनंत सिंह को सबूतों के अभाव में बड़ी कर दिया था। इसके बाद दुलारचंद यादव हत्याकांड के आरोप में जेल में रहते हुए अनंत सिंह ने 2025 विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की थी। फिलाहल वो जमानत पर जेल से बाहर हैं।
अगर मोकामा में अनंत सिंह के साम्राज्य को किसी ने तीन दशकों तक सबसे कड़ी चुनौती दी, तो वह थे विवेका पहलवान (विवेकानंद सिंह)। दिलचस्प बात यह है कि विवेका पहलवान भी उसी लदमा गांव के रहने वाले थे, जहां के अनंत सिंह हैं। 90 के दशक में भाई की हत्या का बदला लेने के लिए विवेका ने हथियार उठाए और अनंत सिंह के धुर विरोधी बन गए।
विवेका पहलवान ने सूरजभान सिंह के साथ हाथ मिलाया और अनंत सिंह गुट पर कई घातक हमले किए। साल 2004-05 में बाढ़ के नदवां गांव में अनंत सिंह के काफिले पर हुए एके-47 के सबसे बड़े हमले के मास्टरमाइंड विवेका पहलवान ही थे, इस हमले में अनंत सिंह के पीठ में गोली लगी थी और सिने से बाहर निकाल गई थी, हमले के बाद अनंत सिंह को 6 दिन तक अस्पताल में रहना पड़ा था। साल 2019 में अनंत सिंह के घर से जो AK-47 मिली थी, माना जाता है कि उसकी गुप्त सूचना पुलिस को विवेका पहलवान ने ही दी थी। बाद के दिनों में बीमारी के कारण अस्पताल में उनका निधन हो गया।
90 के दशक के आखिर और साल 2000 की शुरुआत में मोकामा-बेगूसराय बेल्ट में सूरजभान सिंह का नाम खौफ का दूसरा पर्याय था। मोकामा में रेलवे के ठेकों, स्क्रैप के धंधे और गंगा नदी के रास्ते होने वाली रंगदारी पर कब्जे को लेकर सूरजभान सिंह और अनंत सिंह के बीच सालों तक भीषण गैंगवार चला। दोनों तरफ से एके-47 से सैंकड़ों राउंड गोलियां चलती थीं और टाल इलाका लाशों से पट जाता था।
बिहार के पूर्व मंत्री बृज बिहारी प्रसाद हत्याकांड और रामी सिंह हत्याकांड में सूरजभान सिंह का नाम प्रमुखता से आया। बाद में सूरजभान सिंह ने अपराध छोड़ राजनीति का रुख किया और लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के टिकट पर सांसद भी बने। हालांकि अब वे सीधे तौर पर सक्रिय नहीं हैं, लेकिन उनका गुट आज भी बैकग्राउंड में एक बड़ी ताकत है। 2025 के विधानसभा चुनाव में सूरजभान सिंह की पत्नी चुनावी मैदान में थी, लेकिन उन्होंने अनंत सिंह के सामने हार का सामना करना पड़ा था।
मोकामा और बाढ़ अनुमंडल में इस वक्त अगर अनंत सिंह के वर्चस्व को कोई गुट सीधे तौर पर और सबसे आक्रामक ढंग से चुनौती दे रहा है, तो वह है सोनू-मोनू गैंग। नौरांगा जलालपुर गांव के रहने वाले दो सगे भाई सोनू सिंह और मोनू सिंह इस गैंग के आका हैं। इनके पिता प्रमोद सिंह पेशे से वकील हैं। पिछले कुछ सालों में इस गैंग ने रंगदारी, ठेकेदारी और जमीनी विवादों में तेजी से पैर पसारे हैं।
सोनू-मोनू गैंग कई बार अनंत सिंह को चुनौती दे चुके हैं। लेकिन जो सबसे चरचोट मामले है, वो है 22 जनवरी 2025 का नौरांगा गोलीकांड। जिसके बाद अनंत सिंह और दोनों गैंगस्टर भाइयों को जेल भी जाना पड़ा था। विवाद की शुरुआत तब हुई जब सोनू-मोनू गैंग ने अपने पूर्व मुंशी मुकेश कुमार के साथ मारपीट कर उनके घर पर ताला जड़ दिया था। जब इस मामले की पंचायती करने और ताला खुलवाने के लिए अनंत सिंह अपने लाव-लश्कर के साथ नौरांगा गांव पहुंचे, तो दोनों गुटों के बीच करीब 100 राउंड ताबड़तोड़ फायरिंग हुई थी।
हाल ही में जेडीयू विधायक अनंत सिंह के करीबी मुकेश सिंह पर इस गैंग ने ताबड़तोड़ फायरिंग की थी। जब पुलिस शनिवार को इस गैंग के घर रेड मारने पहुंची, तो इस गैंग के समर्थकों और महिलाओं ने खाकी वर्दी को मुख्य गेट पर ही रोक दिया और पुलिस वालों की बकायदा तलाशी ली। इसका वीडियो वायरल होने के बाद पूरा पुलिस महकमा शर्मसार है।
मोकामा का गैंगवार सिर्फ ठेकेदारी या रंगदारी की लड़ाई नहीं था, यह ज़मीन और भारी जातिगत वर्चस्व की जंग भी थी। इसी जंग से उपजा था दुलारचंद यादव का नाम। मोकामा के बड़े हिस्से में फैले टाल में सालों से ऊंची जातियों का खासकर भूमिहार का दबदबा रहा है। दुलारचंद यादव ने पिछड़ी और शोषित जातियों को लामबंद किया। हर साल टाल इलाके में फसल की कटनी और जमीन पर कब्जे को लेकर दुलारचंद यादव गुट और दिलीप सिंह/अनंत सिंह गुट के बीच आमने-सामने की खूनी लड़ाई होती थी।
दुलारचंद यादव पर कई हत्याओं और डकैती के मामले दर्ज थे। हाल ही में 2025 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान दिनदहाड़े दुलारचंद यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जिसका आरोप उनके परिवार ने अनंत सिंह और उनके समर्थकों पर लगाया था। दुलारचंद की मौत के बाद भी उनके गुट के लोग टाल इलाके में सक्रिय हैं।
1980 के दशक में जब आज के जमाने के बाहुबली मोकामा में पैदा भी नहीं हुए थे, इस इलाके पर ऐसे गिरोहों का राज था जिन्हें इस इलाके में अपराध का संस्थापक माना जाता था। उस समय नागा सिंह गिरोह, गिरधारी गिरोह और नाटा सिंह गिरोह का मोकामा रेलवे यार्ड और कोयला डिपो पर पूरी तरह से दबदबा था। उनका मुख्य धंधा मोकामा स्टेशन से गुज़रने वाली मालगाड़ियों को लूटना और कोयले की अवैध चोरी करना था।
इनके बीच होने वाले गैंगवार इतने खौफनाक होते थे कि मोकामा रेलवे स्टेशन पर कदम रखने से आम मुसाफिर कांपते थे। बाद के दिनों में बिहार पुलिस के कड़े एनकाउंटर्स और आपसी खूनी रंजिश में ये पुराने गैंगस्टर्स पूरी तरह खत्म हो गए, जिसके बाद मोकामा की कमान नए दौर के बाहुबलियों के हाथ में आ गई।
Published on:
25 May 2026 06:40 pm
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