
Weird village name : राजस्थान की धरती जितनी अपनी संस्कृति, परंपराओं और रंग-बिरंगे लोकजीवन के लिए मशहूर है, उतनी ही दिलचस्प यहां के गांवों की नामों वाली दुनिया भी है। यहां किसी से कहें कि चलो भगोड़ा देखने चलते हैं, तो जरूरी नहीं कि आप जेल में बंद किसी कैदी को देखने जा रहे हों। कोई कहे कि वह रोजाना शादी में जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह हर दिन किसी विवाह समारोह में शामिल होता है। इसी तरह गंवार देखने की बात सुनकर भी चौंकने की जरूरत नहीं है। ये सब राजस्थान के गांवों के नाम हैं।
कहीं गांव का नाम साली, नाना और कहीं झूंठा जैसे शब्द गांव की पहचान बने हुए हैं। कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें पहली बार सुनकर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। कुछ नामों को बताते समय ग्रामीणों को संकोच महसूस होता है। वहीं, कुछ गांवों के नाम ऐसे भी हैं, जिनके कारण बाहर से आने वाले लोगों को रास्ता पूछने से लेकर सही ठिकाने तक पहुंचने में मशक्कत करनी पड़ती है। यह कहानी केवल अजब-गजब नामों की नहीं, बल्कि उस ग्रामीण जीवन की भी है, जहां पीढ़ियों से चली आ रही पहचान, स्थानीय बोली, सामाजिक रिश्ते और ऐतिहासिक परिस्थितियां आज भी गांवों के नामों में जीवित हैं।
राजस्थान में गांवों के नामों की इस अनोखी दुनिया में पारिवारिक रिश्तों की भी दिलचस्प मौजूदगी है। साली, नाना, देवर और देवरी जैसे शब्द गांवों के नामों में मिलते हैं। आम बोलचाल में इन शब्दों का इस्तेमाल किसी रिश्ते को बताने के लिए किया जाता है, लेकिन गांव के संदर्भ में यही शब्द एक स्थान की पहचान बन जाते हैं।
ऐसे नाम सुनकर बाहर से आने वाले व्यक्ति के मन में सहज ही सवाल उठ सकता है कि आखिर गांव का नाम ऐसा कैसे पड़ा होगा? हालांकि, किसी नाम की उत्पत्ति को लेकर स्थानीय प्रमाण या ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध न हों, तो उसके पीछे कोई खास कहानी मान लेना ठीक नहीं होगा। नाम का वर्तमान रूप और उसके जन्म की कहानी दो अलग बातें हैं। पाली जिले की बात करें तो टुकड़ा, रास, बूसी, डरी, बोया, नाना, आना, मादा, भगोड़ा और झूंठा जैसे नामों वाले गांव मौजूद है। इनमें नाना नाम का गांव केवल अपने नाम के कारण ही नहीं, बल्कि रेलवे स्टेशन के नाम के रूप में भी जाना जाता है। ऐसे नाम यह बताते हैं कि ग्रामीण राजस्थान में स्थानों की पहचान कितनी विविध हो सकती है।
कई गांवों के नाम प्रमुख व्यक्ति के नाम पर भी रखे गए। उदयराम जी का गुढ़ा, गिरधारी सिंह की ढाणी और रामसिंहजी खेड़ा जैसे नाम बताते हैं कि किसी समय किसी व्यक्ति या परिवार का उस इलाके में खास प्रभाव रहा होगा। हालांकि, ऐसे नामों के इतिहास की पुष्टि स्थानीय दस्तावेजों से ही की जा सकती है।
भीलवाड़ा जिले के मांडलगढ़ क्षेत्र में उंदरों का खेड़ा नाम का गांव है। स्थानीय भाषा में चूहे को उंदरा कहा जाता है। नाम सुनते ही किसी को चूहों से भरी जगह का खयाल आ सकता है, लेकिन केवल नाम के आधार पर गांव के इतिहास या वहां की परिस्थितियों के बारे में निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसी क्षेत्र में मीठा, सांड, मोचड़ियों का खेड़ा, गोठ और गोठड़ा जैसे नाम भी हैं।
जहाजपुर क्षेत्र में अड़ीमल का खेड़ा, एकलमेड़ी, उलेला और खाना का खोहला जैसे नाम मिलते हैं। हमीरगढ़ में तगड़िया, फूलिया क्षेत्र में डियांश और करेड़ा में अलगवास तथा उन्हाली का बाड़िया जैसे नाम ग्रामीण भूगोल को और रोचक बनाते हैं। आसींद क्षेत्र में जाली और पांडरु, बदनौर में ठूमिया, बाण की कांकर, मोटी तथा ऊर्जा का खेड़ा जैसे नाम भी इस सूची का हिस्सा हैं। वहीं, सहाड़ा में जादूनगर, जहाजपुर में बिंदी और शृंगार चंवरी तथा बिजौलिया में शिकारगाह, तीखी, आंट और आटी जैसे नाम सुनने वाले की उत्सुकता बढ़ाते हैं। रायपुर के झड़ोल क्षेत्र में डांगड़ा-डांगड़ी नाम भी अलग पहचान रखता है। ये नाम बताते हैं कि राजस्थान के गांवों की पहचान किसी एक तरह के नामकरण तक सीमित नहीं है।
राजस्थान में केवल अजीब नाम ही नहीं, बल्कि एक ही नाम वाले कई गांव भी लोगों के लिए परेशानी पैदा करते हैं। बूंदी जिले में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां एक नाम के तीन से चार गांव होने के कारण मेहमान, रिश्तेदार और काम से आने वाले लोग गलत जगह पहुंच गए। बूंदी जिले के बुजुर्ग नंदलाल शर्मा ने एक दिलचस्प किस्सा सुनाया। करीब एक दशक पहले परिवार के साथ बालापुरा बालाजी में भोग लगाने का कार्यक्रम था। भोजन तैयार करने के लिए लाखेरी के निकट से पंडित को बुलाया गया और रिश्तेदारों को भी आमंत्रित किया गया। तय समय पर आयोजक परिवार मंदिर पहुंच गया, लेकिन पंडित और रिश्तेदार वहां नहीं पहुंचे।
बाद में पता चला कि पंडित नैनवां क्षेत्र के एक बालापुरा में चला गया, जबकि रिश्तेदार दूसरे बालापुरा पहुंच गए। मेजबान मंदिर में इंतजार करते रहे और मेहमान व पंडित अपने-अपने स्थान पर आयोजकों को तलाशते रहे। उस समय मोबाइल फोन का चलन आज जैसा नहीं था, इसलिए तत्काल संपर्क कर सही जगह की जानकारी देना भी आसान नहीं था। बाद में जब सभी मिले, तो यह घटना परिवार के लिए एक यादगार किस्सा बन गई। बूंदी जिले में बालापुरा नाम के कई गांव हैं। इसी तरह हीरापुर, मानपुरा, देवपुरा और नयागांव जैसे नाम भी एक से अधिक स्थानों पर मिलते हैं। ऐसे में स्थानीय लोग कई बार गांव के नाम के साथ पास की ग्राम पंचायत या किसी दूसरे गांव का नाम जोड़कर अपनी पहचान स्पष्ट करते हैं।
नामों की इस गफलत का असर केवल निजी कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहा। बूंदी जिले में बालापुरा ग्राम पंचायत के लिए करीब तीन दशक पहले आठवीं तक के विद्यालय की स्वीकृति मिलने का किस्सा भी बताया जाता है। लेकिन स्कूल बालापुरा-सिसोला में शुरू हो गया। बाद में पड़ताल के दौरान स्थिति स्पष्ट हुई। एक अन्य प्रसंग में भवानीमंडी से आए रिश्तेदार नोताड़ा में देवी-देवताओं को भोग लगाने पहुंचे, लेकिन वे जिस स्थान पर जाना चाहते थे, वहां के बजाय दूसरे नोताड़ा पहुंच गए। पूरे गांव में मंदिर तलाशने के बाद जब उन्होंने स्थानीय लोगों से पूछा, तब उन्हें सही जगह की जानकारी मिली। भोजन बनाने के लिए बुलाए गए पंडित के साथ भी इसी तरह की गफलत हुई। बस से यात्रा करते हुए वे एक दूसरे नोताड़ा पहुंच गए। बाद में सही स्थान का पता चलने पर उन्हें वहां जाना पड़ा। बूंदी जिले में नोताड़ा नाम के कई गांव होने से ऐसी स्थिति पैदा होती है। स्थानीय पहचान स्पष्ट करने के लिए कहीं नोताड़ा-भोपत, कहीं बीरज का नोताड़ा और कहीं नोताड़ा-धरावन जैसे नाम इस्तेमाल किए जाते हैं। पास के कोटा जिले में भी नोताड़ा नाम का गांव है, जिसे मालियों का नोताड़ा कहा जाता है।
राजस्थान के गांवों के ये नाम पहली नजर में किसी पहेली, मजाक या किस्से का हिस्सा लग सकते हैं। कहीं लड़की, कहीं रेल, कहीं कांदा, कहीं उंदरों का खेड़ा और कहीं झूठों की ढाणी। कहीं रिश्तों के नाम हैं, तो कहीं प्रकृति, खानपान और स्थानीय बोली की झलक।
ब्यावर-पिंडवाड़ा फोरलेन से सटे रायपुर उपखंड के निकट स्थित झूठा (झूंठा) आज भी अपने नाम को लेकर चर्चा में है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 1957 में पंचायत राज व्यवस्था लागू होने के दौरान ग्राम पंचायत मुख्यालय का दर्जा मिलने पर सरकारी रिकॉर्ड में लिपिकीय त्रुटि के कारण गांव का मूल नाम 'जूट' की जगह 'झूठा' दर्ज हो गया। तब से यही नाम सरकारी अभिलेखों में चला आ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्तमान नाम के कारण उन्हें कई बार सामाजिक स्तर पर उपहास का सामना करना पड़ता है। इसलिए वर्षों से गांव का नाम बदलकर 'सत्यपुर' करने की मांग उठती रही है।
एक ही जिले में एक नाम के कई गांव हों तो गफलत सिर्फ मेहमानों को नहीं, आधुनिक तकनीक को भी हो जाती है। मोबाइल पर गूगल मैप में गांव का नाम डालते ही लोकेशन तो मिल जाती है, लेकिन कई बार वह मंजिल किसी दूसरे गांव में निकलती है। इधर, मेजबान इंतजार करता रहता है और मेहमान दूसरे गांव की गलियों में रास्ता पूछता फिरता है। कभी हलवाई गलत गांव पहुंच जाता है, तो कभी रिश्तेदार मंदिर तलाशते रह जाते हैं। यानी गांवों के हमनाम होने की उलझन में अब गूगल भी ऐसा उलझा है कि रास्ता दिखाता है, लेकिन सही ठिकाने की गारंटी नहीं देता!