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70% ब्लाइंड… किसी ने नहीं दी नौकरी… प्यून बनने मजदूरी कर जमा किए थे पैसे आज हैं असिस्टेंट प्रोफेसर

Success Story: जन्म से दृष्टिबाधित प्रह्लाद यादव… जिन्हें किसी ने नौकरी के लायक नहीं समझा, कितने आवेदन किए, सरकारी पोर्टल तक पहुंचे, लेकिन हर तरफ सिर्फ खामोशी..सन्नाटा.. और फिर एक दिन बदल गई तकदीर...patrika.com पर पढ़ें 70 फीसदी तक दृष्टिबाधित प्रह्लाद के संघर्षों से सफलता का सफर तय करती खास पेशकश…

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Jan 15, 2026
Success Story Prahalad Yadav: प्रह्लाद यादव की सफलता की कहानी खुद उनकी जबानी... हंसते हुए क्यों रो पड़े असिस्टेंट प्रोफेसर (photo: patrika)

Success Story: 'फासलों को तकल्लुफ है हमसे अगर…हम भी बेबस नहीं, बेसहारा नहीं...' ये पंक्ति प्रह्लाद यादव की जिंदगी पर लिखी गई एक ऐसी इबारत है… जहां अंधेरा जन्म से था, लेकिन उनके हौसले की रोशनी कभी बुझी ही नहीं। ये पंक्ति अकेल प्रह्लाद यादव के लिए नहीं बल्कि हर इंसान के लिए ऐसा सबक है कि, 'अगर हम खुद को कमजोर, लाचार, अकेला नहीं मानते तो जिंदगी की हर रुकावट, हर बाधा भी हमें रोकने से हिचकिचाती है।'

प्रह्लाद यादव जन्म से ही आंखों की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। दुनिया को देखने का उनका दायरा सीमित रहा, लेकिन सोच और समझ की दुनिया हमेशा से दूरदर्शी रही। पढ़ाई उनके लिए केवल डिग्री हासिल करने का जरिया भर नहीं थी बल्कि, आत्मसम्मान से जीने की लड़ाई थी, कुछ कर दिखाने की लड़ाई थी।

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2018 ने दिया कभी न मिटने वाला जख्म

साल 2018 प्रह्लाद के जीवन का सबसे दर्दनाक अध्याय बनकर आया और कभी न मिटने वाला दर्द दे गया। इस साल ने उनके परिवार को ही उजाड़ कर रख दिया था। दरअसल इस साल उनके पिता का देहांत हो गया। इस पल को याद करते ही प्रह्लाद का दर्द ऐसा निकला कि वो खुद को संभाल नहीं पाए और भावुक हो गए। पिता को याद कर उनकी आंखें भर आईं। गला रूंध गया और आवाज कांपती मद्धम होकर टूट गई।

'पापा आज होते, तो मेरी हर उपलब्धि पर सबसे पहले वही गर्व करते।' पिता के जाने के बाद जिंदगी और कठिन हो गई। आर्थिक दबाव, सामाजिक नजरें और एक अदृश्य भेदभाव-सब एक साथ सामने खड़े थे। लेकिन ये प्रह्लाद का हौसला ही था कि उन्होंने कभी भी ऐसा अवसर नहीं समझा जो उनके सपनों की.. ख्वाहिशों की उडा़न रोक दे।

हर जगह किया ट्राय... लेकिन हर जगह पहुंच कर खामोश रही कोशिश

प्रह्लाद बताते हैं कि उन्होंने कई संस्थानों में इंटरव्यू दिए। उनमें योग्यता थी, उनकी पढ़ाई थी, समझ थी…लेकिन, हर बार एक ही नतीजा निकलता था… न कहीं से कॉल आता था और न ही कोई जवाब।

जब स्थापना विभाग में निकली चतुर्थ श्रेणी प्यून की भर्ती

प्रह्लाद कहते हैं कि कई बार उन्हें यह अहसास हुआ कि उनकी आंखों की समस्या उनकी काबिलियत से बड़ी है। 70 फीसदी तक दृष्टिबाधित प्रह्लाद का घर से बाहर आना-जाना भी सीमित था। हालात ने उन्हें उस मोड़ पर ला खड़ा किया, जहां उन्हें पारिवारिक जरूरत को देखते हुए उन्हें फैसला करना पड़ा। वे बताते हैं कि उनकी आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। ये ऐसा दौर था, जब उन्हें कुछ भी काम करके और मां की मजदूरी के पैसों से घर चलाना पड़ता था। तब पता चला कि स्थापना विभाग इंदौर में प्यून के पद पर भर्ती निकली है। इंटरव्यू होगा। वे बताते हैं कि बड़े ही मलाल के साथ उन्होंने प्यून पद के लिए आवेदन किया और ये उनकी खुशनसीबी थी कि इंटरव्यू के लिए उनके पास कॉल आया।

Success Stroy prahlad yadav(photo: patrika)

इंदौर जाने दो दिन करनी पड़ी मजदूरी

प्रह्लाद के मुताबिक जब उन्हें इंदौर से इंटरव्यू के लिए कॉल आया, तब उन्हें लगा कि अब कैसे जाएंगे। उन्होंने इंदौर जाने के लिए दो दिन किसी के यहां काम किया। इस दो दिन की मजदूरी से उन्हें जो पैसे मिले उसी से वो इंदौर के लिए रवाना हो पाए। उन्होंने बताया कि इस दौरान पूरे रास्ते उन्हें मन में मलाल जरूर रहा, लेकिन ये एक पल को भी नहीं लगा कि वो एक छोटी सी नौकरी के लिए जा रहे हैं या ऐसा कोई डर उनके मन में नहीं आया कि उन्हें ये नौकरी मिलेगी भी या नहीं।

किसी को नहीं बताया, क्योंकि खिलानी पड़ती मिठाई

जब देवी अहिल्या युनिवर्सिटी के स्थापना विभाग से प्रह्लाद के पास कॉल आया तो उनके मन में एक बात जरूर आ गई कि वो किसी को नहीं बताएंगे। उन्हें लगा कि अगर बताया तो सभी को मिठाई खिलानी पड़ेगी। और अभी उनकी कोई सैलरी नहीं थी। जो पैसा वो इधर-उधर काम करके कमाते थे वो महीने का अंत होने से पहले ही खत्म हो जाते थे। यहां तक कि उन्हें अपने दोस्तों से हर महीने आर्थिक सहायता लेकर काम चलाना पड़ता था।

प्यून की काबिलियत ने किया हैरान

विभाग की डिप्टी रजिस्ट्रार सुश्री रचना ठाकुर बताती हैं कि जब उनके यहां चतुर्थ श्रेणी प्यून के पद पर साक्षात्कार किए गए थे। जिसके लिए 140 आवेदन आए थे। इनमें से एक थे प्रह्लाद यादव। उनका Resume और अन्य सर्टिफिकेट्स देखकर उनकी योग्यता ने उनके साथ पूरी कमेटी को हैरान कर दिया। चूंकि उन्होंने प्यून पद के लिए आवेदन किया था। तो कमेटी ने और रचना ने उनका चयन कर लिया। इस तरह उन्हें प्यून पद पर नौकरी मिली।

प्यून रहते हुए नजर आया उत्साह

डिप्टी रजिस्ट्रार कहती हैं कि उन्होंने देखा, प्रह्लाद जहां अपना कर्त्व्य पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं और उनमें उच्च पद पर जाने को लेकर भी बड़ा उत्साह है। जबकि ऐसी स्थिति में जब कई लोगों के सपने टूट जाते हैं, लोग हताश होकर उम्मीद छोड़ देते हैं… लेकिन प्रह्लाद के लिए ये निराशा नहीं बल्कि, जिंदगी की नई शुरुआत थी। कार्यालय में उनका काम, उनका व्यवहार और उनकी समझ अधिकारियों के सामने आते देर न लगी। फाइलें फिर उठाई गईं और समझी भी गईं। कमेटी समझ गई कि ये व्यक्ति पद से कहीं बड़ा है। और यहीं से वे अपने सपनों का सफर तय करने एक सीढ़ी और ऊपर चढ़ गए।

योग्यता ने दिखाया नया रास्ता

रचना कहती हैं, उनके अकादमिक प्रमाण और उनकी आगे बढ़ने की ललक ने हमें प्रेरित किया कि हम उसे एक और मौका दें। नतीजा ये हुआ कि कमेटी ने निर्णय लेते हुए उन्हें तृतीय श्रेणी एलडीसी पद पर प्रमोट किया। ये सिर्फ एक प्रमोशन नहीं बल्कि एक ऐसी स्वीकारोक्ति थी जिसे विभाग ने पहले सोचकर नजर अंदाज किया होगा। इस पद पर कार्य करने के लिए पहले उन्हें ट्रेनिंग दी गई। उन्होंने बड़ी दक्षता से अपना कार्यभार संभाला। यहां तक कि वे सभी तृतीय श्रेणी अपने सहयोगियों को भी उनके काम में हेल्प करने लगे।

उनकी परफॉर्मेंस के हिसाब से ये कम लगा... तो बना दिया असिस्टेंट प्रोफेसर
रचना कहती हैं कि वे अपने हर पद पर पूरी दक्षता के साथ आगे बढ़ते दिखे। यही काबिलियत उन्हें असिस्टेंट प्रोफेसर पद तक ले आई।

'मेरी मां मेरी सबसे बड़ी ताकत…'

प्रह्लाद अपनी सफलता का सारा श्रेय अपनी मां को देते हैं। वे कहते हैं कि 'जब दुनिया ने मेरी सीमाएं गिनाईं होंगी, तब मां ने मेरा भविष्य देखा होगा... सपनों की एक नींव मुझमें डाली होगी, एक यकीन मुझे दिया होगा। 'मां का ये भरोसा ही उनका सहारा बना, वही उनकी ढाल भी रही। वे कहते हैं...

'मेरे पिता के बाद मां को मैं उनके रूप में भी देखता हूं। वो मेरी जिंदगी की लाठी हैं, जिसने हर पल मुझे हौसला दिया।'

अगले 10 साल में खुद को कहां देखते हैं प्रह्लाद

प्रह्लाद भविष्य में खुद को एक बेहतरीन शिक्षक के रूप में देखना चाहते हैं, जिसे हर स्टूडेंट याद रखे, एक ऐसा शिक्षक जो विषय की पढ़ाई के साथ जिंदगी को सहजता से जीना भी सिखाएंगे। उनका कहना है कि यदि संघर्षों से ईमादारी से लड़ा जाए तो मंजिलें खुद-ब-खुद सामने आ जाती हैं। फांसले चाहे जितने हों आप उन्हें हंसते-हंसते पार कर लेंगे।

Success Story Of Prahalad Yadav Indore (photo:patrika)

यहां पढ़ें प्रह्लाद यादव की सक्सेस स्टोरी... पत्रिका के साथ खास बातचीत

Q. MSC फर्स्ट क्लास और NET pass out होने के बावजूद आपको प्यून के पद पर नौकरी करनी पड़ी, क्या आपको कभी लगा ये क्या कर रहा हूं मैं…

-एक मलाल तो था, लेकिन मेरी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि मैं कुछ भी काम करने को मजबूर था। मैं यहां इंटरव्यू देने के लिए आया तो इससे पहले मैंने दो दिन किसी के यहां मजदूरी की। कुछ पैसा मिला तब इंदौर पहुंचा। यहां प्यून के पद पर मेरा सलेक्शन हो गया।

'वो कहते हैं कि मेरे मन में कभी ये विचार नहीं आया कि मैं इतना पढ़ा-लिखा होने के बावजूद छोटे से पद पर काम कर रहा हूं।'

Q. क्या…? आपके पास इंदौर आने के भी पैसे नहीं थे, आपको डर नहीं लगा कि नौकरी नहीं मिली तो…

मैं यहां आया तो कई कैंडिडेट्स और दिव्यांग थे। उन्हें देखकर लग रहा था कि कहीं न कहीं किसी का सलेक्शन तो होगा… मुझे ये सोचकर ही खुशी थी कि मेरा नहीं तो किसी और मित्र-भाई का सही। रास्ते में मुझे बिल्कुल कुछ नहीं लगा… मैं विचार शून्य हो गया था।

Q. विचार शून्य! विचार शून्य होने का कारण क्या है?

-हताशा!.. जब आप कहीं भी प्रयास करेंगे और वहां सफलता न मिले तो आपको हताशा घेरने लगती है।

Q. आपने क्या-क्या कोशिश की थी इससे पहले?

-मैंने कई कंपनियों में आवेदन किया था। क्योंकि मैं कहीं आने-जाने के लिए इतना योग्य नहीं हूं, इसलिए ऑनलाइन ही आवेदन करता था। भारत सरकार के दिव्यांगों के लिए एक पोर्टल पर भी नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन कहीं से भी कोई जवाब नहीं आया।

Q. NET करने के बाद क्या आपने किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में ट्राय किया?

-इस सवाल पर भावुक होते दिखे प्रह्लाद ने कहा… मैंने कई कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में ट्राय किया। लेकिन हर तरफ से खामोशी… कोई रिप्लाय नहीं आया किसी का।

Q. घर में कौन-कौन है आपके?

-मेरे घर में मेरी मां हैं, पत्नी और मैं हूं।

Q. पत्नी क्या करती हैं?

फिलहाल पत्नी घर पर ही हैं। पहले वो भी जॉब करती थीं। लेकिन मेरी यूनिवर्सिटी में नौकरी लगने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ी अब वो हाउस वाइफ हैं।

Q. और आपकी मम्मी?

-मम्मी पहले मजदूरी करती थीं। अब वो भी घर पर ही रहती हैं।

Q. आपको मम्मी और पत्नी का कितना सपोर्ट रहा?

-मैं सारा श्रेय मेरी मां को देना चाहूंगा। दूसरा श्रेय अपने ग्रामीणजन और आसपास जन को देना चाहूंगा, जिन्होंने मुझे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सपोर्ट किया। मेरे शिक्षकगण और यहां के विभागीय लोग भी मेरे सपोर्ट में रहे, इन्होंने कभी मुझे दिव्यांगता का अहसास नहीं होने दिया।

Q. आपको कबसे आंखों की दिक्कत है?

-ये समस्या मुझे बचपन से ही है, जन्म से…। लेकिन मैंने कभी भी खुद को दिव्यांग नहीं माना।

Q. ये बड़ी बात है…क्या आप फिल्में देखते हैं? श्रीकांत फिल्म अगर आपने देखी हो तो..

-मैंने कुछ रील्स देखी हैं। श्रीकांत के बारे में मुझे बस इतना ही पता है कि उन्होंने भी अपने जीवन में काफी संघर्ष किया था। वो बहुत लड़े थे, तब जाकर उन्हें उपलब्धि प्राप्त हुई थी।

Q. आपको दिव्यांगता के कारण लोगों के ताने सुने? आपको लगा हो कि यह कितना गलत है? जिसका आपको दुख हुआ हो…

-ऐसे अवसर तो उत्पन्न हुए थे लेकिन वो मेरे लिए नहीं थे।

Q. क्या आप उन यादों को शेयर करना चाहेंगे?

-नहीं…नहीं सर… जहां तक मुझे याद है तो मैं ऐसी कोई बात याद ही नहीं रख पाता, जो मेरी सफलता में मुझे आगे बढ़ने से रोक दे…।

Q. सफलता की खबर आपने सबसे पहले किसे बताई, मां या पत्नी को?

-मैंने सबसे पहले मां को बताया। मैं फूल और माला साथ लेकर घर गया। जैसे ही दरवाजा खुला मां सामने थी। मैंने मां के चरण स्पर्श किए और उन्हें माला पहनाई फिर फूल दिए। मैंने मां से कहा… आपकी मेहनत सार्थक हो गई मां।

Q. क्या आपकी मां को पता है प्रोफेसर क्या होता है?

-नहीं.. वो तो इलिटरेट हैं। वो नहीं जानतीं।

Q. तब आपने उनको कैसे समझाया?

-अरे मां तो खुश होती हैं… बोलती हैं…मेरा बेटा तो अफसर बन गया।

Q. आपकी सफलता पर पत्नी का क्या रिएक्शन था?

-पत्नी भी बहुत खुश थीं। वो शायद 12वीं पास आउट हैं। और मैंने उनसे कई बार कहा कि आगे पढ़ाई करें। लेकिन वो कहती हैं…कि फिर आपका ध्यान कौन रखेगा?

Q. आपने बताया था कि मैं लोगों को नहीं बताना चाहता, क्योंकि सभी को मिठाई खिलानी पडे़गी!

-आपकी बात सच है… क्योंकि मैं अक्सर अपने मित्र राजू भारती और दिनेश रघुवंशी सर से आर्थिक सहायता लेता रहता हूं। अभी तक हर महीने मेरा वेतन खत्म हो जाता था। इसलिए मैं ऐसा सोच रहा था।

Q.क्या आपके जीवन में ऐसा कोई मोड़ आया, जब आपको लगा मैं हार गया…?

-ऐसी कोई परिस्थिति मैं मानता ही नहीं कि जो हमें सिखाती नहीं। मैं मानता हूं कि जीवन की हर परिस्थिति हमें एक पाठ पढ़ाती है। रही बात नौकरी की तो इसे समय की मांग कह सकता हूं, वो संघर्ष का एक हिस्सा रही मेरे लिए। हताश हुआ लेकिन कभी टूटा नहीं और मजबूती से आगे बढ़ने के प्रयास किए।

Q. क्या आपके पापा बचपन से ही नहीं हैं?

-नहीं… वो 2018 में हमको छोड़कर चले गए थे। वो बुजुर्ग हो गए थे..

Q. क्या आज लगता है कि पापा साथ होते तो…

-(इस सवाल को सुनते ही प्रह्लाद भावुक हो गए और खुद को संभाल नहीं पाए। उनकी आंखों से पिता के साथ न होने का दर्द आंसुओं के रूप में बह निकला) नम आंखों और रुंधे गले से प्रह्लाद ने कहा…प्रह्लाद के आंसुओं में छलके दर्द को महसूस करने के लिए बस उनकी यही बात काफी है कि...

बहुत याद आती है उनकी तो…उनकी आवाज टूट गई…कुछ सैकंड की चुप्पी के बाद बोले… मैं घर वालों या किसी के भी साथ मन की बात शेयर नहीं कर पाता हूं। और कोई शब्द भी नहीं जो उनके दर्द को बयां कर पाऊं। पिता जो सहारा होता है…वो.. कोई… कुछ नहीं… पिता सर्वस्व हैं.. लेकिन पिता के जाने के बाद मेरी मां को मैं उनके रूप में देखता हूं। वो मेरी लाठी है… मेरा सम्पूर्ण जीवन।

Q. जब आपकी शादी हुई तो क्या आपको कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ा या फिर आपने लव मैरिज की

-नहीं मेरी शादी मेरी मां ने की है। मेरी मां के साथ बहन और भाई (कजिन) ने लड़की पसंद की। मुझे पता चला कि वे मुझे हर रूप में स्वीकार कर रही हैं। तब हमारी शादी हुई। लव नहीं अरेंज मैरिज।

Q. आगे राज्य प्रशासनिक सेवा या सरकारी नौकरी की कोशिश करेंगे… अफसर बनना तो हर किसी का सपना होता है।

-अभी तो मेरा लगाव केवल शिक्षण के प्रति रुझान ही है। मैं जीवन इसी क्षेत्र में समर्पित करना चाहूंगा।

Prahalad Yadav Success Story Indore Assistant Professor

Q. क्या आप दिव्यांगों को कोई मैसेज देना चाहेंगे?

-बिल्कुल, मेरे मित्रों के लिए यही संदेश देना चाहूंगा कि लगातार मेहनत करते रहें, सफलता न मिले तो हारें नहीं… जब समय अपने साथ नहीं चले तब आपको उसके साथ चल देना चाहिए। हमारा हर एक मिनट कीमती होना चाहिए…कुछ न कुछ हमेशा सीखते रहें।

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सुश्री रचना ठाकुर, डिप्टी रजिस्ट्रार, स्थापना विभाग, देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी से पत्रिका ने की बात…

Q. मैडम… बताएं प्रह्लाद का काम कैसा है? आपने उसके इस सफर में आपने कैसे सपोर्ट किया?

हमारे यहां चतुर्थ श्रेणी प्यून पद के लिए साक्षात्कार हुए थे। 140 आवेदनों में से एक आवेदन प्रह्लाद यादव का भी था। तब कमेटी ने पाया कि प्रह्लाद बेहद योग्य है। उसने Msc फर्स्ट क्लास पास किया था। NET परीक्षा भी पास है। उनकी योग्यता को देखते हुए कमेटी ने उन्हें इस पद पर नियुक्त किया था। इस दौरान उनके कार्यों ने और आगे बढ़ने के उत्साह को देखकर कमेटी ने उन्हें पहले एलडीसी और अब असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर अपॉइंट किया है।

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Updated on:
15 Jan 2026 03:34 pm
Published on:
15 Jan 2026 03:23 pm
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