
Padma Shri Anup Ranjan Pandey:ताबीर हुसैन. छत्तीसगढ़ की लोक और आदिवासी कलाओं को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने वाले पद्मश्री अनूप रंजन पांडे को वर्ष 2025 के प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया है। बस्तर बैंड की स्थापना कर उन्होंने न केवल हजारों आदिवासी कलाकारों को एकजुट किया, बल्कि उन पारंपरिक कला रूपों और वाद्यों को भी नई पहचान दिलाई जो समय के साथ हाशिए पर चले गए थे। पत्रिका से विशेष बातचीत में उन्होंने इस सम्मान के महत्व, अपने संघर्षपूर्ण सफर, हबीब तनवीर से मिली प्रेरणा, बस्तर की सांस्कृतिक यात्रा और युवाओं के लिए अपने संदेश पर खुलकर बात की।
हर सम्मान की अपनी अलग महत्ता होती है, चाहे वह गांव का हो, नगर का हो, राज्य का हो या पद्मश्री जैसा राष्ट्रीय सम्मान। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार इसलिए विशेष है क्योंकि यह कलाकारों द्वारा कलाकारों के काम का मूल्यांकन है। अकादमी एक स्वायत्त संस्था है, जहां देशभर के वरिष्ठ कलाकार और विशेषज्ञ परिषद में शामिल होते हैं। जब आपके कला योगदान को देश के प्रतिष्ठित कलाकार मान्यता देते हैं, तो उसका महत्व और बढ़ जाता है। प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में यह सर्वोच्च सम्मानों में से एक है और इसकी गौरवशाली परंपरा रही है।
मेरी कला यात्रा बचपन से ही शुरू हो गई थी। नाचा, गम्मत और रहस ने मुझे बहुत प्रभावित किया। स्कूल और महाविद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेता था। बाद में रंगमंच से जुड़ाव बढ़ा और फिर हबीब तनवीरजी से मुलाकात ने मेरी सोच बदल दी। उन्होंने मुझे रंगमंच को नए दृष्टिकोण से समझना सिखाया। इसके बाद मेरा सफर बस्तर की ओर बढ़ा, जहां आदिवासी कलाकारों के साथ मिलकर बस्तर बैंड की स्थापना हुई।
वह दौर संघर्षों से भरा हुआ था। बस्तर में सामाजिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां थीं। ऐसे समय में जब बंदूक और बारूद की आवाजें अधिक सुनाई देती थीं, तब ढोल और मांदर की मधुर ध्वनि को बचाए रखना बड़ी चुनौती थी। हमने अलग-अलग आदिवासी समुदायों के कलाकारों और उनके पारंपरिक वाद्यों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया। परिणाम यह हुआ कि बिखर चुके 70-80 से अधिक कला समूह फिर से सक्रिय हुए और लगभग 15 हजार कलाकार दोबारा संगठित हुए। कई पारंपरिक वाद्यों और कला रूपों का पुनर्जागरण हुआ।
इस यात्रा में अनगिनत लोगों का योगदान है। मेरी मां स्वर्गीय मनोरमा पांडे ने घर में सांस्कृतिक वातावरण बनाया। पिता राधेश्याम पांडे ने प्रदर्शनकारी कलाओं की शुरुआती समझ दी। अभिनय की शिक्षा में मेरे भाई आलोक रंजन पांडे का बड़ा योगदान रहा। पत्नी अस्मिता पांडे और बेटी अनन्या पांडे हमेशा साथ खड़ी रहीं। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका बस्तर के आदिवासी कलाकारों और बस्तर बैंड के साथियों की रही, जिनके बिना यह सफर संभव नहीं था।
बिल्कुल नहीं। यह केवल मेरा सम्मान नहीं है। यह छत्तीसगढ़ की लोक कलाओं, आदिवासी परंपराओं और उन तमाम कलाकारों का सम्मान है जो लगातार नए प्रयोग कर रहे हैं और अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए हैं। प्रदेश के कलाकार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं। यह सम्मान उन सभी की सामूहिक उपलब्धि है।
आज की युवा पीढ़ी बेहद संवेदनशील, समझदार और जागरूक है। उनके सामने आधुनिकता भी है और परंपरा की आवाज भी। जरूरत इस बात की है कि लोक कलाओं को उनके करीब लाया जाए। स्कूलों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और गांवों में लोक कलाओं के प्रदर्शन, कार्यशालाएं और प्रशिक्षण नियमित होने चाहिए। लोक कलाओं को केवल पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं, बल्कि व्यवहारिक शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। अपनी बोली, भाषा, लोकगीत, लोकनृत्य और परंपराओं को जानना युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ेगा।
अपनी जड़ों को जानिए। अपने गांव, पहाड़, नदियां, जंगल, बोली और लोक परंपराओं को समझिए। अपनी दादी-नानी और बुजुर्गों से संवाद कीजिए। हजारों वर्षों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत हमारे पास है। जब हम अपनी जड़ों को गहराई से समझेंगे, तभी दुनिया में विशिष्ट पहचान बना पाएंगे। अपनी लोक और आदिवासी कलाओं को जानना ही भविष्य की सबसे बड़ी सांस्कृतिक ताकत है।
हम लगातार सक्रिय हैं और यह सम्मान हमें नई ऊर्जा देता है। हम प्रदर्शनकारी कलाओं के अनेक नए प्रयोगों पर काम कर रहे हैं। पारंपरिक वाद्यों, लोक कलाओं, अनुष्ठानों, गीतों और शिल्प परंपराओं को समकालीन संदर्भों के साथ जोडऩे का प्रयास जारी है। बस्तर और छत्तीसगढ़ के अनेक धरोहर कलाकार हमारे साथ जुड़े हैं। हम उनसे लगातार सीख रहे हैं और मिलकर काम कर रहे हैं।