
अरकूघाटी (आंध्र प्रदेश). प्रदेश के आदिवासी इलाकों में अब कॉफी की खुशबू सिर्फ कप तक नहीं, बल्कि पर्यटकों को बागानों तक खींचने लगी है। पहाड़ियों के बीच कॉफी के पौधों के साथ घूमना, आदिवासी जीवनशैली को करीब से देखना, स्थानीय स्वाद और संस्कृति का अनुभव करना और उसी बागान की कॉफी का स्वाद मिल रहा है।
आंध्र प्रदेश में कॉफी खेती को पर्यटन से जोड़कर नया मॉडल तैयार किया है। कॉफी बागान इको-टूरिज्म का नया ठिकाना बन रहे हैं। केन्द्र सरकार के कॉफी बोर्ड ने वर्ष 2047 तक उत्पादन 15 हजार से बढ़ाकर 50 हजार मीट्रिक टन करने का खाका तैयार किया है।
पत्रिका संवाददाता ने शनिवार को अल्लुरीसीतारामाराजू जिले की अरकू घाटी के काॅफी के बागानों का जायजा लिया और किसानों से बात की। किसान मानसा ने कहा, तकनीकी सहायता और बाजार उपलब्ध होने से आय में बढ़ोतरी हुई है।
कॉफी बोर्ड के अनुसार वर्ष 2025-26 में करीब 95 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में 15 हजार मीट्रिक टन कॉफी का उत्पादन हुआ। दो लाख उत्पादक इससे जुड़े हैं। वर्ष 2030-31 तक उत्पादकों की संख्या ढाई लाख, क्षेत्रफल एक लाख 41 हजार हेक्टेयर और उत्पादन 30 हजार मीट्रिक टन करने का लक्ष्य है। वर्ष 2046-47 तक तीन लाख उत्पादकों के साथ एक लाख 70 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में 50 हजार मीट्रिक टन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। उत्पादकता 160 से बढ़ाकर 300 किलो प्रति हेक्टेयर करने की योजना है।
आंध्र प्रदेश में वर्ष 1976 में करीब चार हजार हेक्टेयर से शुरू हुआ कॉफी क्षेत्र वर्ष 2026 तक करीब एक लाख 12 हजार हेक्टेयर पहुंच गया। इस दौरान उत्पादन भी करीब 250 से बढ़कर 15 हजार मीट्रिक टन हो गया।
स्थानीय स्तर पर वैल्यू एडिशन के लिए कम्युनिटी कॉफी वैल्यू एडिशन एंड क्वालिटी सेंटर, रोस्टिंग-ग्राइंडिंग यूनिट और क्यूरिंग वर्क्स को बढ़ावा दिया जाएगा। आदिवासी उत्पादकों और एफपीओ को अपने ब्रांड विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। युवाओं और महिलाओं को रोस्टिंग, क्वालिटी, कपिंग और सेंसेरी स्किल्स का प्रशिक्षण मिलेगा। कॉफी के उप-उत्पादों से पर्यावरण अनुकूल उत्पाद बनाने पर भी काम होगा।
भारत सरकार के कॉफी बोर्ड के वरिष्ठ संपर्क अधिकारी सामला रमेश ने बताया कि कॉफी बागानों में फलदार पौधों, मसालों तथा औषधीय और सुगंधित पौधों को शामिल किया गया है। इससे साल में करीब आठ महीने आय का आधार तैयार करने की योजना है। मिट्टी जांच, चूना व पोषक तत्वों की आपूर्ति, कवर क्रॉप और खेत के अवशेषों से कंपोस्ट बनाने पर जोर रहेगा।
किसानों को कॉफी के पौधों की देखरेख, विभिन्न प्रजातियों की खेती और कच्चे बीन्स से लेकर फाइनल कॉफी प्रोडक्ट (तैयार उत्पाद) तैयार करने की पूरी वैज्ञानिक व तकनीकी प्रक्रिया का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यहां एक ‘कॉफी म्यूजियम’ भी बनाया गया है। इसमें अरकू कॉफी के ऐतिहासिक सफर और इसकी वैश्विक ब्रांडिंग की यात्रा को प्रदर्शित किया गया है।