Bangladesh Politics 2026: बांग्लादेश में बीएनपी ने आम चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया। हालांकि, न्याय और समानता की लड़ाई के आधार पर चुनाव जीतने वाले तारिक रहमान ने सरकार के गठन में महिलाओं की उपेक्षा की है। उन्होंने 49 सदस्यीय कैबिनेट में सिर्फ 3 महिलाओं को जगह दी है। अब तारिक रहमान पर सवाल उठ रहे हैं। आइए जानते हैं कि वे उन आरोपों का जवाब कैसे दे सकते हैं।
Bangladesh Politics 2026: बांग्लादेश में हाल ही में संपन्न हुआ आम चुनाव देश के इतिहास में सबसे ऐतिहासिक चुनावों में से एक बताया जा रहा है। यह कई कारणों से उल्लेखनीय है। यह जुलाई 2024 में हुए छात्रों के नेतृत्व में हुए एक खूनी जनविद्रोह का प्रत्यक्ष परिणाम था। इसने अवामी लीग को पूरी तरह संसद से बाहर कर दिया। अवामी लीग की प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को भी देश छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी।
Bangladesh Government Gender Gap : वर्ष 1971 की अनसुलझी विरासत ढोने वाली जमात-ए-इस्लामी को मुख्य विपक्ष के रूप में उभरने का अवसर दिया और बीएनपी को दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में वापसी कराई। इससे तारिक रहमान (Tarique Rahman) को यह साबित करने का मौका मिला है कि वे देश को स्थिरता और प्रगति की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए सही नेता हैं। लेकिन, 49 सदस्यों वाले कैबिनेट में सिर्फ 3 महिलाओं को शामिल कर वह आलोचना के शिकार हो रहे हैं। इस दाग को वह कैसे मिटा सकते हैं, जानिए।
हालांकि, इन सबके बावजूद यह चुनाव महिलाओं के लिए एक सम्मानजनक स्तर पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं कर सका। कुल 85 महिलाओं ने चुनाव लड़ा, जिसमें से 66 ने पार्टी टिकट पर और 19 ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में। अंततः केवल सात महिलाएं संसद पहुंच सकीं, जिनमें छह बीएनपी से और एक पूर्व में बीएनपी से जुड़ी रही हैं। तारिक रहमान के नेतृत्व में बने नए बांग्लादेशी मंत्रिमंडल 49 सदस्यीय कैबिनेट में सिर्फ तीन महिलाएं शामिल हैं। तीनों ही महिलाएं पहली बार सांसद चुनी गई हैं। अफरोजा खानम रीता, शमा औबेद इस्लाम और फरजाना शार्मिन को मंत्री बनाया गया है। अब बांग्लादेश में चार और महिलाओं को सरकार में शामिल करने के पक्ष में आवाजें उठनी शुरू हो चुकी हैं। आइए बताते हैं कि वो चार महिलाएं कौन हैं?
बांग्लादेश में न्याय और समानता के नाम पर जन्मा आंदोलन अंततः ऐसी संसद में परिणत हुआ, जो आधी आबादी का पहले से भी कम प्रतिनिधित्व करती है। दुखद यह भी है कि अंतरिम सरकार जो भेदभाव-विरोधी आंदोलन की उपज थी, महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के प्रश्न पर स्वयं भेदभाव करती नजर आई। उसने उन दलों को अत्यधिक महत्व दिया जो शासन में महिलाओं की भूमिका या सार्वजनिक जीवन में उनके समान अधिकारों के विरोधी रहे हैं। राजनीतिक दलों ने जुलाई राष्ट्रीय चार्टर पर हस्ताक्षर करने के बावजूद न्यूनतम 5 प्रतिशत प्रतिनिधित्व का वादा भी नहीं निभाया।
बांग्लादेश में संसद में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ाने की अब एक ही सूरत बन सकती है। सत्ताधारी पार्टी अब अपने ऊपर लग रहे महिला विरोधी होने के दाग को अभी भी मिटा सकती है। आरक्षित महिला सीटों के जरिए संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ाई जा सकती है। आदर्श रूप से महिला मामलों के सुधार आयोग की सिफारिशों के अनुसार, प्रत्यक्ष जनादेश के माध्यम से महिलाओं का प्रतिनिधित्व अधिक मजबूत होता। चूंकि ऐसा नहीं हुआ इसलिए अब एक अधिक तार्किक कदम उठाया जा सकता है- पार्टी निष्ठावानों की पत्नियों, बेटियों या रिश्तेदारों को 'पुरस्कार' देने की परंपरा छोड़कर राजनीति में सक्रिय और सक्षम महिलाओं को आरक्षित सीटों पर नियुक्त किया जाए।
बीएनपी अपने संसदीय बहुमत के कारण, अन्य दलों की तुलना में अधिक महिलाओं को चुनने की स्थिति में है। यदि वह ईमानदार, योग्य और जनसेवा के प्रति प्रतिबद्ध महिलाओं को अवसर देती है तो यह एक मजबूत संदेश होगा कि नई शासन व्यवस्था में योग्यता, न कि पक्षपात, प्राथमिकता होगी। इसी तरह, जमात-ए-इस्लामी भी यदि पेशेवर और योग्य महिलाओं को चुनती है तो यह देशहित में सकारात्मक कदम होगा।
संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ाने के लिए सिर्फ आरक्षित सीटें देना पर्याप्त नहीं है। महिला सांसदों को संसाधन और अपने निर्वाचन क्षेत्रों में निर्णयों को प्रभावित करने का अधिकार मिलना चाहिए। आमतौर पर आरक्षित सीटों से संसद में पहुंची महिला सांसदों के प्रति बांग्लादेश में उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाया जाता है। इस सोच पर लगाम लगाने की दरकार है। नई सरकार को यह लक्ष्य लेना चाहिए कि उन्हें कम से कम 50 महिला सांसदों को सशक्त बनाने की दिशा में कार्य करना चाहिए। इससे संसद कमजोर नहीं, बल्कि अधिक प्रभावी हो जाएगा।
तारिक रहमान ने महिलाओं के लिए अवसर सृजित करने की बात कही है। उन्होंने कई मौकों पर अपने जीवन में अपनी मां खालिदा जिया, अपनी पत्नी और बेटी के सकारात्मक प्रभाव पड़ने की बात कही है। खालिदा जिया बांग्लादेश की दो बार प्रधानमंत्री रह चुकी हैं। उनको इस कथन को जीवन व्यवहार में उतारने का वक्त आ गया है। उन्हें महिलाओं को संसद और मंत्रिमंडल में शामिल करना रणनीतिक के तौर पर एक समझदारी भरा कदम होगा।
रुमीन फरहाना लंबे समय से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सक्रिय और मुखर नेता रही हैं। हालांकि, रूमीन ने बीएनपी से टिकट न मिलने पर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। इसके बाद उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। ब्राह्मणबारिया-2 से रूमीन फरहाना ने चुनाव में जीत हासिल की। वे कठिन परिस्थितियों में भी स्पष्ट रूप से अपनी बात रखने के लिए जानी जाती हैं। वे पेशे से बैरिस्टर हैं। वह कानून की गहरी समझ रखती हैं, इसलिए उन्हें कानून, न्याय, महिला एवं बाल विकास या संसदीय मामलों में से कोई भी मंत्रालय का भार दिया जा सकता है। रूमीन फरहाना एक राजनीतिक परिवार से आती हैं। उनके पिता ओली अहमद एक प्रसिद्ध भाषा आंदोलनकार और राजनेता के तौर पर देश में काफी लोकप्रिय हैं। बीएनपी को एक बार उनसे बैठकर मतभेद दूर करके उन्हें सरकार में शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए।
तसनीम जारा (Tasneem zahra) पेशे से चिकित्सक हैं। उन्होंने अपने चुनाव अभियान के लिए क्राउडफंडिंग का सहारा लिया और वित्तीय पारदर्शिता पर जोर दिया। उन्होंने क्राउडफंडिंग का सहारा लेकर पारंपरिक धनबल आधारित राजनीति से अलग मॉडल प्रस्तुत किया, जो उनकी विजनरी होने का पर्याप्त प्रमाण पेश करती है। स्वास्थ्य क्षेत्र की जमीनी समझ उन्हें सार्वजनिक स्वास्थ्य, चिकित्सा अवसंरचना, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और नीतिगत सुधार जैसे क्षेत्रों में सार्थक योगदान देने में सक्षम बनाती है। इसके साथ ही वह शिक्षित और युवा हैं। सरकार में उनकी भागीदारी युवा मतदाताओं को सकारात्मक संदेश दे सकती है कि राजनीति में योग्यता और ईमानदारी का महत्व है।
मनीषा चक्रवर्ती ने छोटे-छोटे जनदान के माध्यम से संसाधन इकट्ठा किए और 'लूट, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता की राजनीति' के विरुद्ध जनसमर्थन हासिल किया। मनीषा चक्रवर्ती पेशे से चिकित्सक हैं। स्वास्थ्य सेवाओं, जनस्वास्थ्य ढांचे और आम नागरिकों की वास्तविक समस्याओं की उनकी समझ देश के लिए नीति निर्माण में व्यावहारिक दृष्टिकोण ला सकती है। विकासशील देशों में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की भागीदारी सरकार को अधिक प्रभावी बनाती है। युवाओं, मध्यम वर्ग और श्रमिक वर्ग के बीच उनकी अपील यह दर्शाती है कि वे व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने की क्षमता रखती हैं।
तसलीमा अख्तर ने पारदर्शिता और जवाबदेही पर आधारित अभियान चलाया और नागरिक परिषद की वकालत की। वह एक जानी-मानी श्रमिक अधिकार कार्यकर्ता, फोटोग्राफर और सामाजिक न्याय की आवाज़ रही हैं। तसलीमा अख्तर लंबे समय से परिधान (गारमेंट्स) उद्योग के श्रमिकों के अधिकारों के लिए काम करती रही हैं। वह श्रमिकों की सुरक्षा, उचित वेतन और कार्यस्थल गरिमा के मुद्दों पर मुखर रही हैं। ऐसे देश में जहां निर्यात का बड़ा हिस्सा गारमेंट उद्योग से आता है, श्रमिक हितों की समझ रखने वाली नेता नीति-निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।