
Naxal Rehabilitation: कभी बस्तर के जंगलों में बंदूक थामे संघर्ष की राह पर चलने वाली सुकमा जिले की 9 आत्मसमर्पित नक्सली महिलाएं शुक्रवार को राजधानी रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में जब कोसा सिल्क और पारंपरिक हथकरघा परिधानों में रैंप पर उतरीं तो पूरा माहौल बदलते बस्तर की कहानी कहता नजर आया। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के प्रदेश स्तरीय बुनकर सम्मेलन में इन महिलाओं ने आत्मविश्वास के साथ रैंप वॉक कर पुनर्वास के बाद उनके जीवन में आए बदलाव की प्रेरक तस्वीर पेश की।
रैंप वॉक की तैयारी के लिए मुंबई से आए पेशेवर विशेषज्ञों ने इन महिलाओं को लगातार 7 दिनों तक विशेष प्रशिक्षण दिया। इस दौरान उन्हें रैंप वॉक, वेशभूषा, ग्रूङ्क्षमग और माइक पर बेझिझक अपनी बात रखने का अभ्यास कराया गया। प्रशिक्षण के बाद जब महिलाएं आत्मविश्वास के साथ मंच पर उतरीं तो खूब तालियां बजीं।
आत्मसमर्पण से लेकर मंच की सुर्खियों तक का यह सफर महज फैशन शो नहीं रहा, बल्कि पुनर्वास की मानवीय सोच और मुख्यधारा में लौटने के बाद मिले अवसरों की कहानी बन गया। जिन महिलाओं का अतीत ङ्क्षहसा और भय के साए में बीता, वे आज आत्मविश्वास के साथ पारंपरिक कोसा सिल्क और हथकरघा परिधानों को देश के सामने प्रस्तुत करती नजर आईं। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर आत्मसमर्पित महिलाओं की यह प्रस्तुति ङ्क्षहसा से विकास और बदलाव का प्रतीक बनी।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कार्यक्रम के दौरान इन महिलाओं से आत्मीय संवाद किया और मुख्यधारा में लौटने के उनके फैसले की सराहना करते हुए उनका मनोबल बढ़ाया। पहली बार राजधानी रायपुर पहुंचीं इन महिलाओं के लिए मुख्यमंत्री से मुलाकात और प्रदेश स्तरीय मंच पर प्रस्तुति का अनुभव खास रहा। मुख्यमंत्री के प्रोत्साहन ने उनके भीतर नए भविष्य को लेकर विश्वास और मजबूत किया।
इन महिलाओं की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि यह बदलाव केवल कपड़े या मंच तक सीमित नहीं है। एक समय जिन हाथों में बंदूक थी, उन्हीं हाथों में आज स्वदेशी हथकरघे और कोसा सिल्क की पहचान है। आत्मसमर्पण के बाद पुनर्वास की प्रक्रिया से गुजरते हुए इन महिलाओं ने मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। अब वे अपनी जिंदगी को नए तरीके से संवारने की कोशिश कर रही हैं। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मंच पर उनकी मौजूदगी ने इस बदलाव को प्रतीकात्मक रूप से सामने रखा। बंदूक से हथकरघे तक का सफर बताता है कि सही अवसर, प्रशिक्षण और सम्मान मिले तो हिंसा के रास्ते से लौटकर भी नई जिंदगी की शुरुआत की जा सकती है।
इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा संदेश यही है कि बस्तर सिर्फ नक्सल हिंसा का नाम नहीं है। बस्तर की मिट्टी में कला है, परंपरा है, हथकरघा है और बदलाव की क्षमता है। रायपुर के मंच पर कोसा सिल्क पहने इन 9 महिलाओं की मुस्कान ने इसी बदलते बस्तर की तस्वीर सामने रखी। कभी जिस हाथ में बंदूक थी, आज वही हाथ स्वदेशी और हुनर का दामन थामे आगे बढ़ रहा है। यह रैंप वॉक दरअसल फैशन से कहीं आगे की कहानी थी—यह बंदूक से विकास, हिंसा से शांति और अतीत से बेहतर भविष्य की ओर बढ़ते बस्तर की कहानी थी।
रैंप पर जब पारंपरिक परिधानों में महिलाएं आगे बढ़ीं तो उनके चेहरों पर झिझक की जगह आत्मविश्वास नजर आया। उनके लिए यह किसी फैशन शो से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था। वे उन हजारों लोगों के सामने खड़ी थीं, जिन्होंने बस्तर को अक्सर संघर्ष और नक्सल हिंसा की खबरों के जरिए जाना है। इस बार बस्तर की कहानी अलग थी—कोसा सिल्क, हथकरघा, आत्मनिर्भरता और नए भविष्य की।