Jallikattu News : जल्लीकट्टू में इंसानों द्वारा बैलों पर काबू करने के खेल पर कई बार प्रतिबंध लगाए और हटाए जा चुके हैं। बैन के बाद कुछ संशोधनों के बाद यह खेल जारी है। इस खेल पर कब-कब प्रतिबंध लगाए गए और कब बैन हटाए गए। आइए विस्तार से पढ़ते हैं।
Jallikattu 2026 : तमिलनाडु के मदुरै जिले में पलामेडु जल्लीकट्टू में लगभग 1,100 और लगभग 600 काबू करने वाले लोग भाग ले रहे हैं। इस क्षेत्र में बैलों पर काबू करने का इस सीजन का दूसरा सबसे बड़ा आयोजन है। इस पारंपरिक खेल की प्रसिद्धि मलेशिया तक पहुंच चुकी है और अब इस वर्ष से जल्लीकट्टू का आयोजन वहां भी शुरू हो जाएगा । मलेशिया में इसका आयोजन मार्च के अंतिम सप्ताह या अप्रैल के पहले सप्ताह में हो सकता है। आइए जानते हैं कि इस खेल को लेकर कब-कब रोक लगी और क्या हुए बदलाव?
तमिलनाडु के उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने शुक्रवार की सुबह इस कार्यक्रम का उद्घाटन किया। पालमेडु कार्यक्रम अवनियापुरम में आयोजित उद्घाटन जल्लीकट्टू के बाद हो रहा है और शनिवार को अलंगनल्लूर में होने वाले अंतिम कार्यक्रम से पहले आयोजित किया जाएगा।
इस कार्यक्रम से जुड़े अधिकारियों ने मीडिया बताया कि पलामेडु प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए लगभग 1,100 बैल और 600 प्रशिक्षकों ने ऑनलाइन पंजीकरण कराया। प्रशिक्षकों और बैलों के बीच की लड़ाई में जीत हासिल करने वाले व्यक्ति को पुरस्कार के बतौर कार, बाइक और अन्य पुरस्कार मिलेंगे।
सुरक्षा व्यवस्था में 2,200 से अधिक पुलिसकर्मी शामिल हैं, जबकि दर्शकों के लिए दो दर्जन गैलरी बनाई गई हैं। प्रत्येक दौर के लिए लाइव स्कोरकार्ड, बैलों का विवरण और सांडों को प्रशिक्षित करने वालों के बारे में जानकारी प्रदर्शित करने के लिए एक बड़ी एलईडी स्क्रीन लगाई गई है।
मदुरै जल्लीकट्टू कार्यक्रम के अनुसार, पहला आयोजन अवनियापुरम में हुआ, जिसके बाद 16 जनवरी को पलामेडु में इसका आयोजन हुआ। 17 जनवरी को अलंगनल्लूर में होने वाले समापन जल्लीकट्टू का उद्घाटन मुख्यमंत्री एमके स्टालिन करेंगे।
जल्लीकट्टू पर वर्ष 2006 से बार-बार प्रतिबंध लगाया जाता रहा है। इस साल खेल के दौरान एक युवक दौरान एक युवा दर्शक की मौत के बाद मद्रास उच्च न्यायालय ने जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद 2009 में तमिलनाडु जल्लीकट्टू विनियमन अधिनियम 2009 के तहत जल्लीकट्टू इसपर से प्रतिबंध हटा लिया गया।
Supreme Court on Jallikattu : सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु जल्लीकट्टू विनियमन अधिनियम 2009 को निरस्त कर 2014 में जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने पशु क्रूरता के आधार पर जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगा दिया था। याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया था यह खेल जानवरों के लिए हानिकारक है और इसमें इंसानों को भी जान का खतरा बना रहता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताते हुए इस क्रूर प्रथा पर रोक लगाई थी।
जस्टिस राधाकृष्णन के अगुवाई में बनी बेंच ने पीपल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ ऐनिमल (पेटा) और जीव-जंतुओं के लिए काम करने वाले अन्य संगठनों द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए मई 2014 में जलीकट्टू पर बैन लगाया था। इस फैसले के बाद राधाकृष्णन को पेटा ने 2015 में 'मैन ऑफ द ईयर' का पुरस्कार भी दिया था।
तमिलनाडु के किसान सलाई चक्रपाणी ने जज राधाकृष्णन के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट में पीआईएल दायर कर दिया था। सलाई ने अपने पीआईएल में अनुरोध करते हुए कहा था कि कोई भी जज अपने फैसले के लिए किसी से कोई पुरस्कार नहीं ले सकते। मद्रास हाईकोर्ट ने राधाकृष्णन को नोटिस भेज दिया था।
जलीकट्टू पर बार-बार प्रतिबंध लगाए और हटाए जाने का खेल जारी रहा। वर्ष 2016 में तमिलनाडु में चुनाव से पहले केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने एक बार अधिसूचना जारी कर प्रतिबंध हटा दिया। पर्यावरण मंत्रालय के इस अधिसूचना के खिलाफ भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (AWBI) और PETA ने सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया था। सुप्रीम कोर्ट ने अधिसूचना पर रोक लगा दी थी। हालांकि इस मामले की सुनवाई अभी भी चल रही है और कोर्ट ने अभी तक अपना अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
तमिलनाडु के राज्यपाल ने 21 जनवरी 2017 को नया अध्यादेश जारी किया और जल्लीकट्टू के आयोजनों को जारी रखने की अनुमति दी गई। इस अध्यादेश में केंद्रीय अधिनियम 'पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (1960)' में तमिलनाडु में राज्य के स्तर पर एक संशोधन किया गया। इसके तहत इस परंपरा को जारी रखने की अनुमति मिल गई।
तमिलनाडु विधानसभा ने 23 जनवरी 2017 को राष्ट्रपति की सहमति से एक द्विदलीय विधेयक पारित किया। इसके अन्तर्गत जल्लीकट्टू को पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 से छूट दी गई। पशु क्रूरता निवारण (तमिलनाडु संशोधन) अधिनियम 2017, राज्य के उन कानूनों से अलग नहीं है, जिन्हें 2009 में सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था।
वर्ष 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र द्वारा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 में किए गए संशोधनों को बरकरार रखा था, ताकि जल्लीकट्टू, कंबाला (कर्नाटक) और बैलगाड़ी दौड़ जैसे पारंपरिक बैल-नियंत्रण खेलों की अनुमति दी जा सके।
पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (PCA Act) भारत में जानवरों के साथ क्रूरता को रोकने और उन्हें अनावश्यक पीड़ा से बचाने के लिए बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून है। इसके तहत जानवरों को छोड़ने, चोट पहुंचाने या अमानवीय तरीके से मारने पर जुर्माना और सजा का प्रावधान है। पशु क्रूरता निवारण अधिनियम की धारा 11 के अनुसार, जानवरों के प्रति क्रूरता के लिए न्यूनतम जुर्माना (जैसे ₹10 से ₹50 तक) और कारावास का प्रावधान है।
PETA जैसी संस्थाएं इसके जुर्माने को कम और धारा 28 (पशु बलि की छूट) में बदलाव लाकर इसके सख्त बनाने की मांग करती हैं।
पर्यावरण मंत्रालय ने 1991 में भालू, बंदर, बाघ, तेंदुआ और कुत्तों के प्रशिक्षण और प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया था। भारतीय सर्कस संगठन ने इसे दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी, लेकिन न्यायालय ने अधिसूचना को बरकरार रखा।