
पाली। अपराधी अक्सर यही सोचकर वारदात करता है कि अंधेरे में उसे कोई देख नहीं रहा। सड़क सुनसान है, आसपास कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है और वारदात के बाद वह किसी दूसरे रास्ते से निकल जाएगा। लेकिन अब अपराध के बाद कहानी इतनी आसानी से खत्म नहीं होती। कहीं घर के बाहर लगा कैमरा, कहीं दुकान का कैमरा, कहीं पेट्रोल पंप की रिकॉर्डिंग तो कहीं चौराहे पर लगा कैमरा अपराधी की वह हरकत दर्ज कर रहा होता है, जिसका उसे खुद अंदाजा नहीं होता। प्रदेश में पुलिस के लिए यही कैमरा अब ‘तीसरी आंख’ बनता जा रहा है।
अपराध की जांच में घटनास्थल, प्रत्यक्षदर्शी और भौतिक साक्ष्य हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं, लेकिन सीसीटीवी ने जांच की दुनिया में एक नया रास्ता खोल दिया है। अपराधी कहां से आया, किस वाहन से आया, किसके साथ था, वारदात के बाद किस दिशा में भागा, पीड़ित के साथ आखिरी बार कौन दिखाई दिया, ऐसे कई सवालों के जवाब अब घटनास्थल से कुछ दूर लगे कैमरे भी दे रहे हैं। पाली, सिरोही, जयपुर और नागौर से सामने आए चार मामले इसकी अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं। कहीं वाहन की चोरी ने पुलिस को कैमरे तक पहुंचाया, कहीं सामान्य मौत समझे जा रहे मामले में फुटेज ने हत्या की कड़ियां जोड़ने में मदद की, कहीं सड़क हादसा समझी गई मौत के पीछे हत्या का राज सामने आया और कहीं एक बुजुर्ग को मंदिर के सामने छोड़कर जाने की पूरी घटना कैमरे में कैद हो गई।
जयपुर के श्याम नगर थाना क्षेत्र में घर के बाहर खड़ी महिंद्रा थार बदमाशों के निशाने पर थी। तड़के का समय था। बदमाश आए और एसयूवी से स्टेपनी और अलॉय व्हील खोलकर ले गए। सुबह वाहन मालिक को चोरी का पता चला तो पुलिस को सूचना दी गई। सामान्य तौर पर ऐसी वारदात में पुलिस के सामने पहला सवाल होता है कि बदमाश कौन थे और किस वाहन से आए थे? जवाब घटनास्थल पर नहीं था। पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग खंगालनी शुरू की। फुटेज में काली छत वाली सफेद स्विफ्ट कार नजर आई। कैमरों की अलग-अलग लोकेशन से मिले फुटेज को जोड़ते हुए पुलिस बदमाशों तक पहुंची और चार आरोपियों को पकड़ने में सफलता मिली। यानी बदमाशों ने जिस वारदात को कुछ मिनट में अंजाम दिया, उसकी कहानी कैमरों ने रिकॉर्ड कर ली।
जयपुर की 14 नंबर पुलिया के पास का मामला सीसीटीवी की भूमिका को और गंभीर बनाता है। 5 अगस्त 2026 को महेश की मौत हुई। शुरुआत में इसे सामान्य बीमारी से हुई मौत माना गया। लेकिन बाद में सामने आया कि मौत के पीछे जहर देने की साजिश थी। पुलिस के अनुसार, पत्नी ने महेश को रास्ते से हटाने के लिए जूस में कीटनाशक मिलाकर पिलाया। जहर पीने के बाद जब महेश की तबीयत बिगड़ी तो उसे तुरंत अस्पताल ले जाने के बजाय समय गंवाया गया। उसे इधर-उधर ले जाया गया और बाद में सड़क किनारे छोड़ दिया गया। परिवार को भी अलग कहानी बताई गई। मामले की सबसे अहम कड़ी घटनास्थल के आसपास लगे कैमरों से मिली। मृतक के पिता ने सीसीटीवी फुटेज खंगाले। रिकॉर्डिंग में सामने आए घटनाक्रम ने संदेह को मजबूत किया और जांच की दिशा बदल दी। यहां कैमरे ने सिर्फ किसी व्यक्ति की पहचान नहीं कराई, बल्कि घटना से पहले, घटना के दौरान और उसके बाद की टाइमलाइन समझने में भी मदद की।
सिरोही के ओडा-कैलाशनगर के पटवारी छगनलाल मेघवाल की मौत को शुरुआत में सड़क हादसा माना जा रहा था। बाइक से गिरने और चोट लगने की स्थिति किसी दुर्घटना की तरफ इशारा कर रही थी। लेकिन पुलिस ने घटनास्थल से जुड़े रास्तों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग खंगाली। फुटेज सामने आने के बाद जांच की दिशा बदल गई। पुलिस के अनुसार, युवती से विवाद के बाद उसके दो भाइयों ने एक दोस्त के साथ मिलकर पटवारी को रास्ते से हटाने की साजिश रची। आरोप है कि पहले बाइक को लात मारकर गिराया गया और बाद में सरिए से हमला कर हत्या कर दी गई। यानी, जो घटना शुरुआत में हादसा दिखाई दे रही थी, उसके पीछे हत्या की कहानी सामने आई। सिरोही पुलिस अधीक्षक पुष्पेन्द्र सिंह राठौड़ के अनुसार, शुरुआत में वारदात को हादसा माना जा रहा था। मौके के साक्ष्यों के आधार पर हादसे के बजाय हत्या की बात सामने आई और प्रकरण के खुलासे में मदद मिली। यह मामला बताता है कि अपराध की जांच में एक तस्वीर पूरी कहानी नहीं बताती, लेकिन कई कैमरों की तस्वीरें मिलकर घटनाक्रम की कड़ी बना सकती हैं।
नागौर के बुटाटी धाम का मामला अपराध के पारंपरिक अर्थ से अलग है, लेकिन यहां भी सीसीटीवी ने वही काम किया—जो आंखों के सामने हुआ, उसे रिकॉर्ड कर लिया। फालना से बुटाटी धाम जाने वाली रोडवेज बस में पाली बस स्टैंड से एक व्यक्ति बीमार बुजुर्ग को साथ लेकर चढ़ा। पूरे सफर में वह बुजुर्ग के साथ रहा। लेकिन बुटाटी धाम पहुंचते ही बुजुर्ग को बस से नीचे उतारा और मंदिर के सामने अकेला छोड़कर चला गया। रात में असहाय हालत में पड़े बुजुर्ग को देखकर श्रद्धालुओं को संदेह हुआ। मंदिर समिति को सूचना दी गई। समिति के कर्मचारियों ने सीसीटीवी फुटेज खंगाला तो पूरी घटना सामने आ गई। कैमरे ने बताया कि बुजुर्ग वहां अचानक नहीं पहुंचा था। वह किसी के साथ आया था और उसी व्यक्ति ने उसे वहां छोड़ दिया था। यहां कैमरा पुलिस के लिए अपराधी पकड़ने का माध्यम भर नहीं था। वह एक असहाय व्यक्ति की कहानी का गवाह बन गया।
इन चारों घटनाओं को एक साथ देखें तो एक तस्वीर साफ दिखाई देती है।
चोरी हुई तो कैमरा बोला।
मौत को दूसरा रूप दिया गया तो कैमरा बोला।
हादसा समझी गई घटना में हत्या की कड़ी मिली तो कैमरा बोला।
बेसहारा बुजुर्ग को छोड़कर जाने वाला भी कैमरे से नहीं बच पाया।
सीसीटीवी की सबसे दिलचस्प बात यही है कि यह किसी से पूछताछ नहीं करता। न कोई बयान लेता है, न किसी से सवाल करता है। लेकिन सही जगह लगा कैमरा यह रिकॉर्ड कर सकता है कि कोई व्यक्ति वहां था या नहीं।
जांच में ऐसे सवाल अहम होते हैं -
इन सवालों के जवाब अकेले सीसीटीवी से हर बार नहीं मिलते, लेकिन फुटेज दूसरे साक्ष्यों के साथ जुड़कर जांच की दिशा तय करने में मदद कर सकता है।
कुछ साल पहले तक अपराधी वारदात के बाद यह मानकर निकल सकता था कि अंधेरे में उसे किसी ने नहीं देखा। अब स्थिति बदल रही है। शहर के चौराहों, बाजारों, पेट्रोल पंपों, बैंकों, दुकानों, मकानों, अस्पतालों, स्कूलों, सोसायटियों और सरकारी संस्थानों में कई जगह कैमरे लगे हैं। किसी वारदात के आसपास मौजूद निजी कैमरा भी पुलिस के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। यही वजह है कि सीसीटीवी को पुलिसिंग की ‘तीसरी आंख’ कहा जाने लगा है।
पुलिस के लिए भी प्रमुख चौराहों, बाजारों, शहर के प्रवेश-निकास मार्गों और संवेदनशील स्थानों पर मजबूत सीसीटीवी नेटवर्क उपयोगी हो सकता है। अलग-अलग कैमरों को एक-दूसरे से जोड़कर निगरानी व्यवस्था विकसित होने पर किसी वाहन या संदिग्ध गतिविधि की आवाजाही को समझना आसान हो सकता है। निजी कैमरे भी इस नेटवर्क की अनौपचारिक कड़ी बन सकते हैं। किसी दुकान या मकान के बाहर लगा कैमरा उस सड़क की वह तस्वीर रिकॉर्ड कर सकता है, जहां कोई सरकारी कैमरा मौजूद नहीं है। इसलिए अपराध की जांच में पुलिस और नागरिकों के बीच सहयोग भी महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी घटना के बाद आसपास के कैमरों की रिकॉर्डिंग उपलब्ध होना जांच के लिए उपयोगी हो सकता है।
जयसिंह तंवर, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, अभय कमांड, पाली ने कहा- "सीसीटीवी कैमरे अपराधियों तक पहुंचने में काफी मददगार साबित हुए हैं। हत्या और लूट जैसे मामलों में भी इनसे मदद मिलती है। कैमरों को आपस में जोड़कर अपराधियों तक पहुंचने में मदद मिल रही है। अभय कमांड ने शहर में 231 कैमरे लगा रखे हैं। निजी कैमरों को भी इससे जोड़ने की प्रक्रिया चल रही है। लोगों को सुरक्षा के लिए अधिक से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए भी जागरूक किया जा रहा है।"
जयपुर की थार चोरी से लेकर जहर देकर मौत के मामले तक, सिरोही के पटवारी हत्याकांड से बुटाटी धाम में बुजुर्ग को छोड़ने की घटना तक - इन मामलों में सीसीटीवी ने अलग-अलग तरीके से जांच को सुराग दिए। कैमरा न पुलिस है, न प्रत्यक्षदर्शी। वह सिर्फ तस्वीर रिकॉर्ड करता है। लेकिन जांच अधिकारी जब उन तस्वीरों को समय, स्थान और दूसरे साक्ष्यों से जोड़ता है तो वही तस्वीरें घटनाक्रम की कहानी कहने लगती हैं।