
International Co-operative Day 2026: एक समय था जब सहकारिता का अर्थ केवल बचत और ऋण की व्यवस्था तक सीमित माना जाता था, लेकिन आज यह अवधारणा पूरी तरह बदल चुकी है। छत्तीसगढ़ में सहकारिता अब महिला सशक्तीकरण, ग्रामीण उद्यमिता और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का प्रभावी माध्यम बनकर उभरी है। प्रदेश की हजारों महिलाएं स्व-सहायता समूहों और महिला सहकारी समितियों के माध्यम से न केवल अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं, बल्कि गांवों की अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे रही हैं।
हर वर्ष जुलाई के पहले शनिवार को मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस के अवसर पर छत्तीसगढ़ का यह मॉडल देश के सामने एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आया है। सामूहिक प्रयासों के बल पर महिलाओं ने उत्पादन, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और विपणन का ऐसा सफल मॉडल विकसित किया है, जिसने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर पैदा किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं द्वारा विकसित यह ‘पिंक मॉडल’ सहकारिता की नई परिभाषा गढ़ रहा है और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी मजबूती प्रदान कर रहा है।
छत्तीसगढ़ में महिला सहकारिता की सबसे बड़ी प्रेरणादायक मिसाल पद्मश्री फुलबासन बाई यादव के नेतृत्व में संचालित मां बम्लेश्वरी महिला स्व-सहायता समूह है। इस समूह की शुरुआत बेहद छोटी बचत से हुई थी, लेकिन आज यह हजारों महिलाओं के जीवन में आर्थिक और सामाजिक बदलाव का आधार बन चुका है।
यह समूह केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक सुधारों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बाल विवाह रोकने, नशामुक्ति अभियान चलाने, जल संरक्षण को बढ़ावा देने और सामाजिक जागरूकता फैलाने जैसे कई कार्यों में समूह की सक्रिय भागीदारी रही है। यही कारण है कि यह मॉडल पूरे प्रदेश में महिला नेतृत्व और सामूहिक विकास की मिसाल माना जाता है।
सहकारिता के माध्यम से स्वरोजगार को बढ़ावा देने में भी छत्तीसगढ़ की महिला समूहों ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। रायपुर जिले के आरंग और अभनपुर क्षेत्र में महिला समूह कड़कनाथ पालन और पोल्ट्री व्यवसाय के जरिए सफल स्वरोजगार मॉडल तैयार कर चुके हैं। सामूहिक उत्पादन, बेहतर प्रबंधन और सीधे बाजार से जुड़ने की रणनीति के कारण इन समूहों की आय में लगातार वृद्धि हुई है। इससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और ग्रामीण परिवारों की आय के नए स्रोत भी विकसित हुए हैं।
बस्तर और धमतरी जैसे वनांचल क्षेत्रों में भी महिला समूहों ने सहकारिता के माध्यम से नई पहचान बनाई है। यहां महिलाएं महुआ, इमली, चिरौंजी सहित विभिन्न लघु वनोपज का संग्रहण, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन कर उन्हें बाजार तक पहुंचा रही हैं। पहले जिन उत्पादों की बिक्री केवल स्थानीय स्तर तक सीमित रहती थी, अब वही उत्पाद बेहतर पैकेजिंग और ब्रांडिंग के साथ बड़े बाजारों तक पहुंच रहे हैं। इससे महिलाओं की आय बढ़ने के साथ-साथ स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग भी सुनिश्चित हुआ है।
छत्तीसगढ़ का जशपुर जिला आज सहकारिता आधारित महिला उद्यमिता का मजबूत केंद्र बनकर उभरा है। लगभग 62 प्रतिशत जनजातीय आबादी वाले इस जिले में 12 हजार से अधिक स्व-सहायता समूह सक्रिय हैं। बिहान योजना के तहत गठित किसान उत्पादक संगठनों से हजारों महिला किसान जुड़ी हुई हैं। ये महिलाएं कृषि उपज के संग्रहण, ग्रेडिंग, प्रसंस्करण और सामूहिक विपणन के माध्यम से बेहतर आमदनी प्राप्त कर रही हैं। सहकारिता मॉडल ने उन्हें बिचौलियों पर निर्भर रहने के बजाय सीधे बाजार से जुड़ने का अवसर दिया है।
जशपुर में स्थानीय उत्पादों को 'जशप्योर' और 'जशक्रॉफ्ट' जैसे ब्रांडों के माध्यम से नई पहचान मिली है। इन ब्रांडों के तहत महुआ से तैयार विभिन्न उत्पाद, रागी और टाऊ की कुकीज, ढेंकी कूटा चावल तथा विभिन्न प्रकार की हर्बल और स्थानीय चाय बाजार में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। इन उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे महिला समूहों को बेहतर मूल्य मिलने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस 2026 की आधिकारिक थीम "शांतिपूर्ण दुनिया के लिए सहकारी समितियाँ!" घोषित की गई है। यह थीम दुनिया भर में सहकारी संस्थाओं की उस भूमिका को रेखांकित करती है, जिसके माध्यम से सामाजिक न्याय, समावेश, समान अवसर और सामुदायिक एकजुटता को बढ़ावा दिया जा रहा है।
वर्ष 2026 में यह दिवस 4 जुलाई को मनाया जाएगा। हर साल जुलाई के पहले शनिवार को आयोजित होने वाला यह दिवस दुनिया भर के सहकारी संगठनों, सरकारों और सहयोगी संस्थाओं को एक साझा मंच पर लाता है। इसका उद्देश्य सहकारिता के माध्यम से सतत विकास को बढ़ावा देना तथा संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय सहकारी आंदोलन के बीच सहयोग को और मजबूत करना है।
सहकारिता का मूल उद्देश्य लोगों, समुदायों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सामूहिक प्रयासों के माध्यम से सशक्त बनाना है। भारत में भी "सहकार से समृद्धि" के संकल्प के साथ सहकारी मॉडल को ग्रामीण विकास, रोजगार सृजन और सामाजिक भागीदारी का प्रभावी माध्यम बनाया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस का आयोजन वर्ष 1923 से अंतरराष्ट्रीय सहकारी गठबंधन (ICA) द्वारा किया जा रहा है। बाद में वर्ष 1995 में संयुक्त राष्ट्र ने भी इसे आधिकारिक मान्यता प्रदान की। तब से यह दिवस वैश्विक स्तर पर सहकारिता आंदोलन की उपलब्धियों, सामाजिक योगदान और आर्थिक विकास में इसकी भूमिका को रेखांकित करने के लिए मनाया जाता है।
छत्तीसगढ़ में महिला समूहों द्वारा विकसित सहकारिता का 'पिंक मॉडल' इस बात का प्रमाण है कि सामूहिक प्रयास, आत्मविश्वास और सही दिशा मिलने पर महिलाएं न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे समाज और प्रदेश की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती हैं।