Patrika Special News

बच्चों की आंखों में ‘सफेद चमक’ या भेंगापन कहीं कैंसर का संकेत तो नहीं? बिलासपुर में बढ़ रहा इस बीमारी का खतरा, समय पर पहचान ही बचाव…

Cancer Symptoms in kids eye: रेटिनोब्लास्टोमा आंख के रेटिना (पुतली के पीछे की परत) में होने वाला कैंसर है। यह बीमारी अक्सर जन्म के बाद शुरुआती वर्षों में विकसित होती है और कई मामलों में आनुवांशिक भी हो सकती है।

3 min read
बच्चों की आंखों में ‘सफेद चमक’ या भेंगापन कहीं कैंसर का संकेत तो नहीं? बिलासपुर में बढ़ रहा इस बीमारी का खतरा, समय पर पहचान ही बचाव...(photo-AI)

Cancer Symptoms in kids eye: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में बच्चों की आंखों में दिखने वाला मामूली भेंगापन या पुतली में नजर आने वाली सफेद चमक अक्सर अभिभावक सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो ये छोटे-छोटे लक्षण एक गंभीर बीमारी- रेटिनोब्लास्टोमा- के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। यह आंखों का कैंसर है, जो तेजी से छोटे बच्चों, खासकर पांच साल से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित कर रहा है।

Cancer Symptoms in kids eye: क्या है रेटिनोब्लास्टोमा?

रेटिनोब्लास्टोमा आंख के रेटिना (पुतली के पीछे की परत) में होने वाला कैंसर है। यह बीमारी अक्सर जन्म के बाद शुरुआती वर्षों में विकसित होती है और कई मामलों में आनुवांशिक भी हो सकती है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि शुरुआती लक्षण बेहद सामान्य नजर आते हैं।

ये लक्षण दिखें तो तुरंत हो जाएं सतर्क

  • आंखों में भेंगापन (Strabismus)
  • पुतली में सफेद चमक (White reflex), खासकर कैमरे की फ्लैश में
  • आंखों में सूजन या लालिमा
  • नजर कमजोर होना या आंख का असामान्य दिखना
  • इन लक्षणों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।

‘सफेद चमक’ क्यों है खतरनाक संकेत?

बच्चों की आंखों में फोटो खींचते समय या फ्लैश लाइट पड़ने पर जो सफेद चमक दिखाई देती है, उसे अक्सर लोग सामान्य मान लेते हैं और इस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह लक्षण बेहद गंभीर हो सकता है, क्योंकि यह आंखों के कैंसर रेटिनोब्लास्टोमा का शुरुआती संकेत हो सकता है। सामान्य स्थिति में फ्लैश पड़ने पर आंखों में लाल रंग की रिफ्लेक्शन दिखती है, लेकिन यदि उसकी जगह सफेद या हल्की पीली चमक नजर आए, तो यह चिंता का विषय है।

इस स्थिति को मेडिकल भाषा में “ल्यूकोकोरिया” कहा जाता है, जो यह संकेत देती है कि आंख के अंदर कोई असामान्य बदलाव हो रहा है। समस्या यह है कि यह लक्षण बिना किसी दर्द के धीरे-धीरे विकसित होता है, इसलिए बच्चे को कोई तकलीफ महसूस नहीं होती और अभिभावक इसे नजरअंदाज कर देते हैं।

यही लापरवाही आगे चलकर गंभीर रूप ले सकती है। ऐसे में जरूरी है कि यदि बच्चे की आंखों में इस तरह की सफेद चमक बार-बार दिखाई दे, तो तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच कराई जाए, क्योंकि समय पर पहचान ही इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

डॉ. चंद्रहास ध्रुव, नेत्र रोग विभागाध्यक्ष, सिम्स के अनुसार “अगर बच्चे की आंखों में भेंगापन, सफेद रिफ्लेक्स या सूजन दिखे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। शुरुआती अवस्था में पहचान होने पर इलाज अधिक प्रभावी होता है।”वे यह भी बताते हैं कि जिन परिवारों में पहले इस बीमारी के केस रहे हैं, उन्हें विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए और बच्चों की नियमित जांच करानी चाहिए।

खामोश लेकिन खतरनाक बीमारी

डॉक्टरों के अनुसार यह बीमारी बिना किसी दर्द के धीरे-धीरे विकसित होती है, इसलिए शुरुआत में इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। अक्सर जब इसके स्पष्ट लक्षण सामने आते हैं, तब तक बीमारी काफी गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी होती है। यही वजह है कि इसे “साइलेंट लेकिन डेंजरस” बीमारी कहा जाता है।

समय पर इलाज से बच सकती है जान

अच्छी बात यह है कि अगर समय रहते इस बीमारी की पहचान हो जाए, तो करीब 90% मामलों में बच्चे की जान और आंखों की रोशनी दोनों बचाई जा सकती है। लेकिन देरी होने पर न सिर्फ आंख की रोशनी जा सकती है, बल्कि यह जानलेवा भी हो सकती है।

जागरूकता की कमी बन रही बड़ी वजह

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बीमारी के बढ़ते मामलों के पीछे सबसे बड़ी वजह जागरूकता की कमी है। अधिकांश माता-पिता बच्चों की आंखों में दिखने वाले शुरुआती लक्षणों जैसे हल्का भेंगापन, सफेद चमक या मामूली सूजन को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। कई बार उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि ये संकेत किसी गंभीर बीमारी की शुरुआत हो सकते हैं। इसी लापरवाही के कारण बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती रहती है और जब तक स्पष्ट लक्षण सामने आते हैं, तब तक स्थिति काफी गंभीर हो चुकी होती है।

ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में जानकारी और नियमित जांच की कमी इस समस्या को और बढ़ा देती है। अगर समय रहते इन लक्षणों को पहचान लिया जाए और तुरंत डॉक्टर से संपर्क किया जाए, तो न केवल बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है, बल्कि बच्चे की आंखों की रोशनी और जीवन दोनों को सुरक्षित रखा जा सकता है। इसलिए जरूरी है कि अभिभावक सतर्क रहें और बच्चों की आंखों में किसी भी असामान्यता को हल्के में न लें।

क्या करें अभिभावक?

जन्म के बाद बच्चों की आंखों की नियमित जांच कराएं
किसी भी असामान्यता को हल्के में न लें
समय-समय पर विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लें
पारिवारिक इतिहास होने पर विशेष सावधानी बरतें

Updated on:
03 Apr 2026 11:39 am
Published on:
03 Apr 2026 11:22 am
Also Read
View All

अगली खबर