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Dharm V/S Kala : पब्लिसिटी या नफरत? ‘महाभारत’ से ‘रामायण’, खिलजी से कृष्ण तक… इन पर बवाल क्यों मचता है?

Dharm V/S Kala : संगीतकार एआर रहमान नितेश तिवारी निर्देशित ‘रामायण’ फिल्म (AR Rahman Ramayana) के लिए डॉ. कुमार विश्वास के साथ मिलकर म्यूजिक कंपोज कर रहे हैं। इसको लेकर कुछ अलग प्रकार की चर्चाएं भी चल रही हैं। आइए, फिल्म इंडस्ट्री के एक्सपर्ट से समझते हैं कि धार्मिक फिल्मों को लेकर विवाद क्यों खड़ा होता है।

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Jan 17, 2026
प्रतीकात्मक तस्वीर | Photo - Patrika

Dharm V/S Kala : वर्ल्ड फेमस ऑस्कर विनर संगीतकार एआर रहमान नितेश तिवारी निर्देशित ‘रामायण’ फिल्म (AR Rahman Ramayana) के लिए डॉ. कुमार विश्वास के साथ मिलकर म्यूजिक कंपोज कर रहे हैं। वहीं, अभी हमने "तेरे इश्क में" मुहम्मद जीशान अयूब को काशी पंडित के विकराल अवतार में देखा। जब आमिर खान ने महाभारत में भगवान कृष्ण का किरदार निभाने की इच्छा जाहिर की तो उस समय भी खूब बवाल मचा था। अक्सर ये देखा जाता है कि जब भी मुस्लिम कलाकार किसी हिंदू कैरेक्टर को प्ले करता है या इसके विपरित भी कोई कलाकार रोल निभाए, तो कुछ कथित धर्म के ठेकेदार नफरत फैलाना शुरू कर देते हैं। ये कोई आज की बात नहीं है।

राही मासूम रजा को भी बीआर चोपड़ा के टीवी धारावाहिक महाभारत (1988-1990) की पटकथा और संवाद लिखने से पहले कट्टरपंथियों का सामना करना पड़ा था। तब उन्होंने साफ तौर पर कहा था, "मैं मां गंगा का बेटा हूं…", कहकर बिना डरे महाभारत लिख डाली थी।

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इतना ही नहीं ऐसे कई कलाकारों ने किया है, जरा एक नजर में देखिए, फिर हम एक्सपर्ट्स से समझेंगे कि ये पब्लिसिटी है या नफरत?

  • नौशाद, शकील और रफी: "मन तड़पत हरी दर्शन को आज"

फिल्म 'बैजू बावरा' (1952) का यह भजन भक्ति संगीत की पराकाष्ठा माना जाता है। इसे संगीतकार नौशाद अली ने कंपोज किया, शकील बदायूंनी ने लिखा और मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज़ दी। इन तीनों मुस्लिम कलाकारों की जुगलबंदी ने भगवान हरि की भक्ति का जो जादू पैदा किया, वह आज 70 साल बाद भी मंदिरों में गूंजता है।

  • उस्ताद बिस्मिल्लाह खान: काशी के मंदिर और गूंजती शहनाई

शहनाई के जादूगर बिस्मिल्लाह खान साहब गंगा किनारे नमाज और रियाज करते थे। उनकी शहनाई की सबसे पवित्र तान काशी विश्वनाथ मंदिर की चौखट पर बजती थी। वह अक्सर कहते थे कि उन्हें संगीत और शांति के दर्शन मां सरस्वती की कृपा और बाबा विश्वनाथ की नगरी में ही होते हैं।

  • जावेद अख्तर: "ओ पालनहारे"

खुद को नास्तिक कहने वाले जावेद साब ने 'लगान' फिल्म के लिए जब "ओ पालनहारे, निर्गुण और न्यारे" जैसे शब्दों के जरिए उन्होंने हर भक्त के हृदय की पुकार को कागज पर उतार दिया।

  • रणवीर सिंह ने संजय लीला भंसाली की फिल्म "पद्मावत" (2018) में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी का किरदार निभाया था।

ये तो हमने कुछ उदाहरण दिए हैं जिन्होंने धर्म-नफरत की दीवार को गिराकर कला के दम पर नया इतिहास रचा। पर आखिर इन चीजों को लेकर बवाल क्यों मचता है, इस बात को समझिए-

वरिष्ठ फिल्म समीक्षक की राय

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वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ने पत्रिका के रवि कुमार गुप्ता को बताया, "मैं राही मासूम रजा का इंटरव्यू किया था। वो इस बात को डंके की चोट पर कहते थे कि कोई मुझे कुछ लिखने से रोक नहीं सकता। मेरे धर्म से कुछ तय नहीं होता है। मैं भारतीय हूं, मेरे घर में महाभारत-रामायण की कहानियां सुनाई जाती हैं। मैंने राम, कृष्ण जैसे भगवानों के बारे में जानता हूं। मैं कोई विदेश से नहीं आया जिससे अपनी कला-संस्कृति के बारे में नहीं पता।"

वो आगे कहते हैं, "कोई भी सिनेमाप्रेमी जात-धर्म देखकर फिल्म देखने नहीं जाता। शकील बदायूंनी, नौशाद, जावेद अख्तर से लेकर ना जाने कितने मुस्लिम कलाकार हैं जिन्होंने हिंदू धर्म के गाने-भजन लिख डाले। उनको सब सुनते हैं। ये तो कुछ नफरती गिरोह हैं जिसको टाइटल खोजने और धर्म तलाशने में दिलचस्पी है बाकी सिनेमा-संगीत की चाहत रखने वालों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।"

फिल्म पब्लिसिस्ट की राय

कई बार ऐसा भी कहा जाता है कि फिल्म को चर्चा में लाने के लिए कई बार ऐसा जान-बूझकर कराया जाता है। इसके पीछे की सच्चाई को समझने के लिए हमारी बात फिल्म पब्लिसिस्ट अहमद से हुई।

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वो कहते हैं, फिल्म प्रचार-प्रसार करने के लिए ऐसा नहीं किया जाता है। इसकी जरुरत उनको है जिनको अपनी राजनीति चमकानी है। कलाकार की पहचान काफी होती है पब्लिसिटी के लिए। हां, कई बार कोई कलाकार प्रमोशन के दौरान अपना अनुभव बयां कर देता है। इसी कारण लोगों को लगता है कि ऐसा जानबूझकर किया जा रहा है। जैसे- अभी एआर रहमान ने अपने इंटरव्यू में बताया है कि वो ब्राह्मण स्कूल में पढ़े लिखे हैं। उनके स्कूल में रामायण-महाभारत पढ़ाई जाती थी। मौके को देखते हुए उन्होंने अपना अनुभव शेयर किया है।

आगे उन्होंने बतौर मुस्लिम अपना व्यक्तिगत अनुभव बताया, कलाकारों को धर्म से लगाव नहीं होता है। कला प्रेमी को भी धर्म जाति से मतलब नहीं है। मैं मुस्लिम हूं पर मेरे घर पर रामायण-महाभारत देखी जाती थी। मेरे बड़े पापा भजन गाते थे। ये हमारी व्यक्तिगत चॉइस है। इसको लेकर अगर मेरे धर्म के लोग भी कुछ फालतू बात कहते हैं तो वो किसी धर्म के खिलाफ सिवाए नफरत के कुछ भी नहीं।

बात सिर्फ मुस्लिम कलाकार तक नहीं, हिंदू कलाकार को भी किसी मुस्लिम किरदार में देखना भी कुछ लोगों को पसंद नहीं। जैसे- रणवीर सिंह ने खिलजी का किरदार निभाया था, उस दौरान भी कुछ लोगों को ये बात चुभी थी कि एक हिंदू कलाकर कैसे क्रूर मुस्लिम के किरदार को निभा रहा है।

फिल्म निर्माता और निर्देशक की राय

फिल्म निर्माता और निर्देशक कमलेश ए मिश्रा कहते हैं, इस बात को समझना इतना आसान नहीं है। दरअसल, भारत की धरती सनातनी संस्कृति से भरी है। यहां पर विविधता है। हमें स्वीकार करना बताया जाता है। अमीर खुसरो की रचना में कृष्ण प्रेम और ऐसे ना जाने कितने उदाहरण देखने को मिल जाएंगे। जिससे ये बात साफ होती है कि कला किसी धर्म या जाति में बंधी नहीं है। साथ ही फिल्म इंडस्ट्री भी इस आधार पर नहीं चलती है।

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कुछ लोग भले ही फिल्म या कलाकारों की आड़ में जात-धर्म को लेकर नफरत फैलाने का काम करते हैं। जबकि, उनको ये समझने की जरुरत है कि आज भी रजा साहब लिखा महाभारत हर भारतीय को इतना प्रिय क्यों है। क्योंकि, उन्होंने धर्म से परे होकर बतौर लेखक उसमें जान डाली। मेरी फिल्म आजमगढ़ में पंकज त्रिपाठी को मौलवी का किरदार दिया गया था। हम धर्म या जाति देखकर रोल थोड़ी देते हैं। हम लोग किसी भी रोल के लिए उस कलाकार का चयन करते हैं जो किरदार को अपना ले और उसमें पूरी तरह ढल जाए।

अंत में वो कहते हैं, "यही कलाकार का धर्म है और इसका पालन होता है। और हां, इसकी आड़ नफरत या किसी तरह का प्रोपेगेंडा फैलाने वाला एक्सपोज भी हो ही जाता है।"

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